भारतीय होने का दावा हुआ खारिज, 15 दस्तावेजों के बावजूद कोर्ट का बड़ा फैसला

असम में एक शख्स 15 दस्तावेज पेश करने के बावजूद अपनी भारतीय नागरिकता साबित नहीं कर पाया.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: असम में एक शख्स 15 दस्तावेज पेश करने के बावजूद अपनी भारतीय नागरिकता साबित नहीं कर पाया. गुवाहाटी हाई कोर्ट ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखते हुए उसे विदेशी घोषित किया. कोर्ट ने पैन, वोटर आईडी सहित किसी भी दस्तावेज को पर्याप्त क्यों नहीं माना?

असम में नागरिकता साबित करने का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है. खबर है कि एक शख्स ने अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए 15 दस्तावेज पेश किए थे. इसके बावजूद वह अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाया. गुवाहाटी हाई कोर्ट ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखा, जिसने उस शख्स को विदेशी घोषित कर दिया था. गुवाहाटी हाई कोर्ट ने शख्स के उन 15 दस्तावेजों को पर्याप्त नहीं माना. जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस शमीमा जहां की बेंच ने उस की याचिका खारिज कर दी.

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता विदेशी अधिनियम 1946 की धारा 9 के तहत अपनी भारतीय नागरिकता साबित नहीं कर सका. बता दें कि इस धारा के मुताबिक, जिस व्यक्ति पर विदेशी होने का आरोप लगता है, उसे खुद को भारतीय नागरिक साबित करना होता है. याचिकाकर्ता ऐसा करने में असफल रहा. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, याचिकाकर्ता एक दिहाड़ी मजदूर है. वह पिछले कई वर्षों से असम में रह रहा है.

स्कूल सर्टिफिकेट से PAN, EPIC तक सब रिजेक्ट
उसने अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए स्कूल सर्टिफिकेट, पैन कार्ड, वोटर आईडी कार्ड समेत तमाम सबूत पेश किए. मगर कोर्ट ने एक को भी नहीं माना और उसे विदेशी घोषित कर दिया. याचिकाकर्ता के द्वारा जितने भी दस्तावेज पेश किए गए थे, कोर्ट ने सभी को रिजेक्ट कर दिया.

इसके लिए कोर्ट ने तर्क भी दिए कि उस दस्तावेज को क्यों अस्वीकार किया गया. कोर्ट ने उसके (याचिकाकर्ता) पैन कार्ड और वोटर कार्ड को लेकर कहा कि इससे नागरिकता प्रमाणित नहीं होता. कोर्ट ने उसके स्कूल सर्टिफिकेट, जमीन के दस्तावेज, 1951 के एनआरसी दस्तावेज को भी खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि इसमें जो मेंशन किया गया था, वह कानूनन सही नहीं था.

नागरिकता साबित करने के लिए शख्स ने दिए 15 सबूत
याचिकाकर्ता के पिता के 1951 के एनआरसी की कॉपी
याचिकाकर्ता के पिता, दादा-दादी और परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर 1951 के एनआरसी की कॉपी
याचिकाकर्ता के दादा-दादी के नाम पर 1966 की वोटर लिस्ट की कॉपी
याचिकाकर्ता के पिता, दादा-दादी और परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर साल 1970 की वोटर लिस्ट की कॉपी
याचिकाकर्ता के दादा के नाम पर दिनांक 12.09.1973 को जारी मूल भूमि खरीद विलेख
याचिकाकर्ता के माता-पिता, दादा-दादी और परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर साल 1979 की वोटर लिस्ट की कॉपी

याचिकाकर्ता के माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर 1985 की वोटर लिस्ट की कॉपी
याचिकाकर्ता के माता-पिता, चाचा और परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर साल 1989 की वोटर लिस्ट की कॉपी
याचिकाकर्ता के माता-पिता और बड़े भाई के नाम पर साल 1997 की वोटर लिस्ट की कॉपी
याचिकाकर्ता के माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर साल 2005 की वोटर लिस्ट की कॉपी
याचिकाकर्ता के माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर साल 2013 की वोटर लिस्ट की कॉपी
याचिकाकर्ता के माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों के नाम पर साल 2015 की वोटर लिस्ट की कॉपी
2017 का हाश्दोबा आंचलिक हाई स्कूल का सर्टिफिकेट
याचिकाकर्ता का EPIC
याचिकाकर्ता का पैन कार्ड

1988 में असम के घुगुदोबा में हुआ जन्म
 याचिकाकर्ता का जन्म 1 मई 1988 को असम के घुगुदोबा में हुआ था. उनका लालन-पालन भी वहीं हुआ. बाद में वे हाश्दोबा चले गए. उनके परिवार का नाम वोटर लिस्ट में लगातार दर्ज है. दस्तावेजों में उनके पिता, माता और दादा के नाम की स्पेलिंग अलग-अलग लिखी हुई है, लेकिन वे सभी एक ही व्यक्ति को ही इंगित करते हैं इसलिए इससे उनके भारतीय होने के दावे पर कोई डाउट नहीं होना चाहिए.

पिता की गवाही को भी कोर्ट ने नहीं माना
मगर कोर्ट ने याचिकाकर्ता की एक न सुनी. अदालत ने पिता की गवाही को भी नहीं माना. कोर्ट ने कहा कि नागरिकता साबित करने जैसे मामलों में मौखिक गवाही पर भरोसा नहीं किया जा सकता. यह रिकॉर्ड से साबित होना चाहिए. याचिकाकर्ता के कुछ डॉक्यूमेंट में पिता के डेट ऑफ बर्थ में गलती थी तो वहीं उनके कुछ वोटर आईडी कार्ड में उनका नाम सही नहीं था.

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि अलग-अलग दस्तावेजों में उनके पिता और दादा के नामों में कुछ मामूली गलती के कारण कोर्ट ने उन्हें विदेशी घोषित कर दिया जबकि इस तरह की गलतियां आम हैं. मगर नागरिकता से इनकार करने का यह कोई वैध तरीका नहीं है.

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