बैंक खाता तो खुल गया, लेकिन पैसे की समझ कितनी? एक्सपर्ट ने बताई बड़ी जरूरत
बैंक खाता खुलना ही आर्थिक सशक्तीकरण नहीं है। बचत, ऋण, डिजिटल भुगतान और साइबर ठगी से बचाव की समझ जरूरी है। वित्तीय साक्षरता से ग्रामीण और गरीब वर्ग मजबूत हो सकता है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: बैंक खाता खुलना आर्थिक बदलाव की पहली सीढ़ी हो सकता है, लेकिन मंजिल नहीं। कमाई को कैसे बचाया जाए, जरूरत पड़ने पर सुरक्षित ऋण कहां से लिया जाए और मोबाइल से भुगतान करते समय ठगी से कैसे बचें—इन सवालों की समझ आज उतनी ही जरूरी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, वित्तीय समावेशन का वास्तविक फायदा तभी मिलेगा, जब लोगों को बैंकिंग सेवाओं के साथ उनका सुरक्षित इस्तेमाल भी सिखाया जाए।
जनधन से बढ़ा बैंकिंग दायरा, जानकारी अभी चुनौती
केंद्र सरकार की जनधन योजना ने गांवों और गरीब परिवारों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई है। महिलाओं की बैंकिंग भागीदारी भी बढ़ी है। इसके बावजूद ग्रामीण और निम्न आय वर्ग के कई लोगों को एटीएम के सुरक्षित इस्तेमाल, बैंक ऋण की प्रक्रिया और डिजिटल भुगतान की पूरी जानकारी नहीं है।
एमएमएमयूटी के एलुमनाई इंजीनियर तिलक राज मिश्र ने वित्तीय साक्षरता पर विशेषज्ञ के तौर पर अपनी बात रखी। उनका जोर इस बात पर रहा कि बैंक खाता होने के साथ वित्तीय फैसलों की समझ भी जरूरी है।
साहूकार के कर्ज से डिजिटल ठगी तक बड़ी चुनौती
आर्थिक जरूरत के समय ग्रामीण परिवार कई बार स्थानीय साहूकारों से कर्ज लेते हैं, जहां ब्याज का बोझ बढ़ सकता है। बैंकिंग और औपचारिक ऋण व्यवस्था की जानकारी उन्हें बेहतर विकल्प चुनने में मदद कर सकती है।
शहरों में भी रेहड़ी-पटरी वाले, दिहाड़ी मजदूर और घरेलू कामगार जैसे वर्ग वित्तीय योजना की कमी से प्रभावित होते हैं। डिजिटल भुगतान बढ़ने के साथ यूपीआई और मोबाइल फ्रॉड से बचने की जानकारी भी जरूरी हो गई है।
बचत और सुरक्षित लेन-देन से मजबूत होगी नींव
वित्तीय साक्षरता का मतलब केवल बैंक चलाना सीखना नहीं, बल्कि आय का सही प्रबंधन, नियमित बचत, सुरक्षित निवेश और जरूरत के समय उचित ऋण की समझ विकसित करना है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी जानकारी लोगों को आर्थिक संकट से निपटने और ठगी से बचने में मदद कर सकती है। यानी आर्थिक सशक्तीकरण की शुरुआत बैंक खाते से जरूर होती है, लेकिन उसे मजबूती वित्तीय समझ ही देती है।
रिपोर्ट – अमरेंद्र पांडेय, गोरखपुर
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