नियमों को ताक पर रखकर पैसों के बल पर चल रहा फहद इलाही का लखनऊ मेट्रोसिटी हॉस्पिटल

  • अफसरों से यारी हॉस्पिटल में मनमानी फहद इलाही के रसूख का राज
  • लखनऊ मेट्रो सिटी हॉस्पिटल पर आरोपों की बारिश

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। आज बात एक ऐसे हॉस्पिटल की जो लखनऊ के पॉश इलाके में हैं। इसके चेयरमैन लखनऊ के एक चर्चित पेज थ्री पर्सनाल्टी वाले व्यक्ति हैं। दूसरों पर भौकाल जमा कर अपने काम निकालने में माहिर है और बहुत सारे व्यापारों में लिंप्त है। जी हां हम बात कर रहे हैं मेट्रो सिटी हॉस्पिटल की जोकि अब लखनऊ मेट्रो सिटी हॉस्पिटल हो गया है। यह हॉस्पिटल मिठाई वाला चौराहा के आसपास है। हॉस्पिटल और फहद दोनों ने पिछले दिनो काफी तरक्की की है। पहले यह सिर्फ हॉस्पिटल था लेकिन अब यहा नर्सिंग के छात्रों की पढ़ाई के साथ-साथ ओल्ड ऐज होम के साथ दूसरी कई चीजें संचालित की जा रही है। यह पूरी सिरीज है जिसमें हम उनके ऊपर के कनेक्शन के साथ दूसरे धंधों पर भी प्रकाश डालेंगे आज की शुरूआत बेसमेंट से… । यूपी की राजधानी लखनऊ में रसूख अगर बड़ा हो तो नियम अक्सर छोटे पड़ जाते हैं? गोमती नगर के लखनऊ मेट्रो सिटी हॉस्पिटल को लेकर उठ रहे सवाल इसी दिशा की ओर इशारा कर रहे हैं। हॉस्पिटल से जुड़े फहद इलाही की ऊंचे अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों के साथ नजदीकियों की तस्वीरें और उनकी सोशल मीडिया मौजूदगी लंबे समय से चर्चा में हैं। महंगे कपड़े लग्जरी यस लाइफ स्टाइल जीने वाले फहद का सोशल नेटवर्क और रसूख उनके कारोबारी साम्राज्य के लिए ऐसा सुरक्षा कवच बन गया है जिसके साये में हॉस्पिटल परिसर में वह गतिविधियां चल रही हैं जिनकी वैधता और सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं?

सहारा श्री के बिजनेस मॉडल की तरफ बढ़ रहे फहद इलाही?

लखनऊ के कारोबारी गलियारों में फहद इलाही का नाम अब सिर्फ अस्पताल और चिकित्सा सेवाओं तक सीमित चर्चा का विषय नहीं रह गया है। उनकी सोशल मीडिया मौजूदगी, प्रभावशाली लोगों के साथ तस्वीरें और हाई प्रोफाइल जीवनशैली ने उनके कारोबारी मॉडल को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या फहद इलाही का कारोबार भी उस दौर के बड़े कारोबारी साम्राज्यों की तर्ज पर अलग-अलग क्षेत्रों में विस्तार की दिशा में बढ़ रहा है जिसकी सबसे चर्चित मिसाल कभी सहारा समूह के संस्थापक सुब्रत रॉय सहारा श्री का कारोबारी मॉडल रहा था? यहां तुलना किसी कानूनी या कारोबारी समानता का दावा नहीं है। सवाल सिर्फ इतना है कि एक ही कारोबारी पहचान के इर्द गिर्द अलग अलग क्षेत्रों में प्रभाव और विस्तार की तस्वीर कैसे बन रही है। सहारा समूह के दौर में रियल एस्टेट से लेकर मीडिया, होटल, मनोरंजन और वित्तीय गतिविधियों तक कारोबार का बड़ा विस्तार दिखाई देता था। फहद इलाही को लेकर भी अब हॉस्पिटल और चिकित्सा शिक्षा से जुड़ी गतिविधियों के साथ उनकी कारोबारी पहुंच और सामाजिक संपर्क चर्चा में हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि इन गतिविधियों का वास्तविक स्वरूप क्या है और इनके पीछे कौन कौन सी कंपनियां संस्थाएं और कारोबारी ढांचे काम कर रहे हैं।

मामला सिर्फ एक बेसमेंट का नहीं है

लखनऊ मेट्रो सिटी हॉस्पिटल के बेसमेंट के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े हैं। जिस शहर ने अस्पतालों, हॉस्टलों और कोचिंग सेंटरों में सुरक्षा की अनदेखी के भयावह नतीजे देखे हैं उसी लखनऊ में अगर किसी हॉस्पिटल के बेसमेंट को लेकर सवाल उठ रहे हैं तो प्रशासन के लिए यह महज एक खबर नहीं एक चेतावनी होनी चाहिए। मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह कोई दूरदराज का छोटा हॉस्पिटल नहीं बल्कि राजधानी के प्रमुख इलाके में स्थित चिकित्सा संस्थान है। हॉस्पिटल में मरीजों की आवाजाही के साथ मेडिकल छात्रों का प्रशिक्षण भी होता है तो भवन सुरक्षा, अग्निशमन व्यवस्था, आपातकालीन निकास और अन्य मानकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

अनियमितता का प्रमाण नहीं है तस्वीरें

सबसे अहम बात यह है कि किसी कारोबारी की अधिकारियों या प्रभावशाली लोगों के साथ तस्वीरें अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं होतीं। कारोबारी और प्रशासनिक संपर्क होना भी अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन जब किसी संस्थान की व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर सवाल सामने आएं तो रसूख नहीं, दस्तावेज जवाब देते हैं। यही वजह है कि अब नजर उन्हीं दस्तावेजों पर होनी चाहिए।

लखनऊ मेट्रो सिटी हॉस्पिटल पर सवाल

लखनऊ मेट्रो सिटी हॉस्पिटल के मामले में अब जांच के कई बिंदु हैं। बेसमेंट का स्वीकृत उपयोग क्या है? वहां कौन सी गतिविधियां चल रही हैं? मेडिकल और नर्सिंग छात्रों के प्रशिक्षण के लिए कौन सी अनुमति है? हॉस्पिटल के पास वैध फायर एनओसी है या नहीं? और मौके पर सुरक्षा के निर्धारित मानक पूरे हो रहे हैं या नहीं? मेट्रो सिटी हॉस्पिटल का स्वीकृत भवन मानचित्र क्या कहता है? बेसमेंट के इस्तेमाल की अनुमति किस उद्देश्य के लिए है? हॉस्पिटल में मेडिकल और नर्सिंग छात्रों से जुड़ी गतिविधियां किस अनुमति के तहत संचालित हैं? फायर सेफ्टी की स्थिति क्या है? संबंधित विभागों ने कब-कब निरीक्षण किया और उनकी रिपोर्ट में क्या दर्ज है? इन सवालों के जवाब मिलते ही यह भी साफ हो जाएगा कि हॉस्पिटल की वास्तविक व्यवस्था कागजों पर दर्ज अनुमति के अनुरूप है या नहीं। फहद इलाही के मामले में भी अब ग्लैमर रसूख और सोशल मीडिया की तस्वीरों से आगे बढ़कर उन कागजों को देखना होगा जो यह बताएंगे कि लखनउ मेट्रो सिटी हॉस्पिटल का कारोबारी और संस्थागत ढांचा वास्तव में कितना बड़ा है और उसकी गतिविधियां किस नियम कायदे के तहत संचालित हो रही हैं।

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