बांकीपुर में प्रशांत की जीत का Gen-Z कनेक्शन, 1.3 लाख युवा वोटरों ने बनाया गेम?
पटना की बांकीपुर सीट पर प्रशांत किशोर की बड़ी बढ़त ने उपचुनाव को खास बना दिया है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: पटना की बांकीपुर सीट पर प्रशांत किशोर की बड़ी बढ़त ने उपचुनाव को खास बना दिया है.
भाजपा के मजबूत गढ़ में छात्र आंदोलन, शिक्षा, रोजगार और पेपर लीक जैसे मुद्दों के बीच Gen-Z वोटर अहम फैक्टर बनकर उभरे. यह नतीजा बताता है कि युवा मतदाता अब बिहार की चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं.
पटना की हाई प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट पर जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर की जीत तय मानी जा रही है. 25 राउंड की गिनती के बाद प्रशांत 14,953 वोटों की बढ़त बनाए हुए हैं. उन्हें अब तक 50,976 वोट मिल चुके हैं, जबकि भाजपा के नीरज कुमार 36,023 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर हैं.
कुल 31 राउंड की गिनती होनी है. PK की जीत तय मानी जा रही है, लेकिन बांकीपुर का चुनाव सिर्फ एक सीट का मुकाबला नहीं रहा. इस नतीजे से समझते हैं कि प्रशांत की जीत के पीछे क्या Gen-Z फैक्टर था. साथ ही जानेंगे कि बिहार के युवा और Gen-Z वोटर किस ओर जा रहे हैं…
बांकीपुर पटना का शहरी और शिक्षण संस्थानों वाला इलाका है. यहां बड़ी संख्या में छात्र, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले युवा रहते हैं. बांकीपुर विधानसभा में करीब 3.79 लाख वोटर्स हैं. इनमें लगभग 1.2 से 1.35 लाख वोटर्स 18 से 29 आयु वर्ग के हैं, यानी करीब एक तिहाई वोटर युवा हैं.
यही वजह है कि इस सीट पर Gen-Z वोट सबसे बड़ा चुनावी फैक्टर बनकर उभरा. पटना जिले में भी 18 से 29 साल के वोटर्स की औसत हिस्सेदारी करीब 23% है. लेकिन बांकीपुर में यह संख्या ज्यादा है, क्योंकि यहां कई बड़े शिक्षण संस्थान और कोचिंग हब हैं.
छात्र आंदोलन ने बदला चुनावी मुद्दा
बांकीपुर में इस बार चुनाव सिर्फ विकास और पार्टी तक सीमित नहीं रही. देशभर में हुए छात्र आंदोलनों, परीक्षा में गड़बड़ी, पेपर लीक और रोजगार के मुद्दों ने चुनावी बहस को बदल दिया. NEET पेपर लीक विवाद के बाद छात्रों का आंदोलन तेज हुआ था.
दिल्ली के जंतर-मंतर सहित पटना में भी छात्रों ने प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों की पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारी ने सोशल मीडिया पर भी काफी चर्चा बटोरी. पुलिस की लाठी खाने वाले छात्रों ने प्रशांत से मुलाकात भी की थी. इन आंदोलनों ने युवाओं से जुड़े मुद्दों को चुनाव के केंद्र में ला दिया. प्रशांत किशोर लगातार बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता जैसे मुद्दे उठाते रहे. जिसका उन्हें फायदा भी मिला.
BJP के लिए क्यों बड़ी चुनौती?
बांकीपुर लंबे समय से भाजपा का मजबूत किला माना जाता रहा है. भाजपा के नितिन नवीन इस सीट से लगातार 5 बार जीत चुके हैं. साल 2006 में नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा के निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनके बेटे नितिन नबीन पहली बार यहां से विधायक चुने गए.
2008 में परिसीमन के बाद पटना पश्चिम सीट का नाम बदलकर बांकीपुर कर दिया गया था. नबीन 2010, 2015, 2020 और 2025 में भी इस सीट से चुनाव जीते.
2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को यहां करीब 63% वोट मिले थे. नितिन नवीन के भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और राज्यसभा जाने के बाद यह सीट खाली हुई थी.
यही कारण है कि उपचुनाव भाजपा के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई थी. भाजपा ने चुनाव में अपने मजबूत संगठन, विकास कार्यों और पारंपरिक वोट बैंक पर भरोसा किया था. बांकीपुर में व्यापारी वर्ग, मध्यम वर्ग और लंबे समय से भाजपा समर्थक मतदाता पार्टी की बड़ी ताकत माने जाते हैं.
प्रशांत किशोर के लिए क्यों अहम है जीत?
प्रशांत किशोर ने पहली बार खुद चुनावी मैदान में उतरकर भाजपा के मजबूत गढ़ को चुनौती दी. 2025 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई थी.
प्रशांत ने युवाओं के मुद्दों को अपनी राजनीति का केंद्र बनाया. अगर वह किशोर जीतते हैं, तो वह इसे युवाओं के गुस्से और बदलाव की राजनीति की जीत के रूप में पेश कर सकते हैं. इससे बिहार में जनसुराज पार्टी की राजनीतिक पकड़ मजबूत होगी.
क्या Gen-Z ने सच में बदली राजनीति?
सिर्फ आंदोलन और सोशल मीडिया की सक्रियता हमेशा वोट में बदल जाए, यह जरूरी नहीं है. बिहार के चुनावी इतिहास में कई बार देखा गया है कि सड़क पर दिखने वाला गुस्सा मतदान केंद्र तक नहीं पहुंच पाता. बांकीपुर उपचुनाव में मतदान प्रतिशत भी इस सवाल को अहम बनाता है. इलेक्शन कमीशन के मुताबिक, यहां 34.3% मतदान हुआ.
2025 विधानसभा चुनाव में यहां 41.39% वोटिंग हुई थी. कम वोटिंग का मतलब है कि परिणाम पर सक्रिय और प्रतिबद्ध वोटरों का असर ज्यादा हो सकता है. Gen-Z वोटर पारंपरिक वोट बैंक की तरह किसी एक पार्टी से बंधा नहीं माना जाता. यह धड़ा सोशल मीडिया पर सक्रिय है, मुद्दों पर राय रखता है और चुनाव के आखिरी समय में अपना रुख बदल सकता है.
बांकीपुर से क्या संदेश मिला है?
बांकीपुर के नतीजे ने दिखाया है कि छात्र आंदोलन, शिक्षा, रोजगार और पेपर लीक जैसे मुद्दे चुनावी राजनीति में असर डाल सकते हैं. भाजपा के लंबे समय से मजबूत माने जाने वाले गढ़ में प्रशांत किशोर की जीत को नई राजनीतिक ताकत के उभरने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.
हालांकि, सिर्फ इस एक नतीजे के आधार पर पूरे बिहार या देश के युवाओं का रुख तय नहीं किया जा सकता. लेकिन इतना साफ है कि बड़ी युवा आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में Gen-Z वोटर अब चुनावी समीकरण बदलने की क्षमता रखते हैं. यही वजह है कि आने वाले विधानसभा चुनावों में सभी पार्टियों का फोकस Gen-Z वोटर्स के मुद्दों पर और बढ़ सकता है.



