राम मंदिर दान चोरी और जेन जी पर लाठियों ने बदला राजनीतिक महौल

उप-चुनाव नतीजे, जनता का मूड बदल रहा है!

  • बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन की सीट पर प्रशांत किशोर की बढ़त
  • दरक रहा है मध्य प्रदेश जैसा मजबूत किला दतिया में कांग्रेस आगे

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। उपचुनाव सरकारें नहीं बदलते अक्सर वह राजनीति की दिशा बदल देते हैं और देश के तीन सीटों पर हुए उपचुनाव के शुरु आत परिणाम कुछ ऐसी ही इबारत लिखते हुए नजर आ रहे हैं। जो नतीजे आ रहे हैं उससे सत्ता की कुर्सी भले न डगमगाए लेकिन सत्ता के आत्मविश्वास की नींव जरूर हिल गयी है। भारतीय जनता पार्टी जिन सीटों को अपनी प्रतिष्ठा का प्रतीक मान रही थी। उन्ही सीटों पर पिछड़ती दिखायी दे रही है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के विधानसभा छोडऩे के बाद खाली हुई सीट पर यदि भाजपा जीत दर्ज नहीं कर पाती है तो यह केवल एक सीट का नुकसान नहीं होगा बल्कि संगठन और नेतृत्व की राजनीतिक पकड़ पर भी बहस तेज होगी।
उधर मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर कांग्रेस की बढ़त ने भी सियासी हलकों में हलचल बढ़ा दी है। भाजपा जिन राज्यों को अपने सबसे मजबूत गढ़ के रूप में पेश करती रही है वहां यदि मतदाता अलग संकेत दे रहे हैं तो आने वाले महीनों की चुनावी रणनीति बदलनी पड़ सकती है। बिहार के बांकीपुर से प्रशांत किशोर की लगातार बढ़त इस मुकाबले को और दिलचस्प बना रही है। यदि यह बढ़त जीत में बदलती है तो बिहार की राजनीति में भी एक नया समीकरण खड़ा हो सकता है।

बांकीपुर नितिन नबीन का पुश्तैनी और अजेय गढ़

बांकीपुर कोई साधारण सीट नहीं है बल्कि बीजेपी के मौजूदा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का वह पुश्तैनी और अजेय गढ़ रहा है जहां 1995 से लेकर अब तक कभी पटना पश्चिम तो कभी बांकीपुर के रूप में भगवा परचम ही लहराता रहा है। खुद नितिन नबीन यहां से लगातार पांच बार विधायक रह चुके हैं और उनके पिता का भी इस क्षेत्र में गहरा राजनीतिक रसूख रहा है। ऐसे में जिस जमीन पर बीजेपी ने अपनी अजेय बादशाहत की इबारत लिखी हो उसी गढ़ के भीतर प्रशांत किशोर का शुरुआती दौर में आगे निकल जाना इस बात का साफ संकेत है कि पीके ने महफिल में वाकई बड़ा खेला कर दिया है। इस सीट पर बीजेपी के नीरज कुमार दूसरे नंबर पर हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक़ बांकीपुर सीट पर कुल 31 राउंड की काउंटिंग होनी है खबर लिखे जाने तक यहां अभी 10 राउंड की गिनती पूरी हुई है जिसमें प्रशांत किशोर 6 हजार से ज्यादा वोटों से अपनी बढ़त बनाए हुए हैं।

रुझानों पर तेजस्वी का प्रतिक्रिया देने से इंकार

बिहार की चर्चित बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव की मतगणना के बीच नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव सोमवार को सोनपुर स्थित प्रसिद्ध बाबा हरिहरनाथ मंदिर पहुंचे। सावन की पहली सोमवारी के अवसर पर उन्होंने भगवान शिव का विधि-विधान से जलाभिषेक किया और राज्य की सुख-शांति व समृद्धि की कामना की। इस दौरान जब मीडिया ने उपचुनाव के शुरुआती रुझानों को लेकर सवाल पूछा, तो तेजस्वी यादव ने चुनावी टिप्पणी करने से साफ इनकार कर दिया। बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव की मतगणना के शुरुआती रुझानों में जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार के आगे रहने और राजद प्रत्याशी के पीछे चलने को लेकर पत्रकारों ने तेजस्वी यादव से प्रतिक्रिया मांगी। इस पर उन्होंने कहा, चुनाव तो आते-जाते रहेंगे। आज सावन की पहली सोमवारी है। हम बाबा हरिहरनाथ के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए आए हैं। आज इसी पर ध्यान देना चाहिए। इस तरह उन्होंने चुनावी नतीजों पर कोई राजनीतिक टिप्पणी करने से परहेज किया।

दतिया ने बढ़ाई भाजपा की चिंता

मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर कांग्रेस की बढ़त ने भाजपा के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है। मध्य प्रदेश भाजपा का मजबूत राज्य माना जाता है। ऐसे में यदि यहां मतदाता विपक्ष की ओर झुकते दिखाई देते हैं तो आने वाले चुनावों के लिए पार्टी को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है। दतिया में कांग्रेस प्रत्याशी की लगभग 700 से अधिक वोटों की बढ़त ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित किया है। हालांकि अंतिम परिणाम ही निर्णायक होंगे लेकिन शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

क्या जनता का मूड बदल रहा है?

यही वह सवाल है जो इन उपचुनावों के बाद सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है। क्या मतदाता वास्तव में भाजपा से दूरी बना रहे हैं या यह केवल स्थानीय परिस्थितियों का असर है? इसका उत्तर अभी स्पष्ट नहीं है। उपचुनावों में मतदान का प्रतिशत स्थानीय उम्मीदवारों की छवि जातीय और क्षेत्रीय समीकरण अक्सर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसलिए केवल इन परिणामों के आधार पर राष्ट्रीय निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। फिर भी राजनीतिक दल ऐसे संकेतों को गंभीरता से लेते हैं क्योंकि वे आने वाले बड़े चुनावों की तैयारी का आधार बनते हैं।

केंद्र सरकार कई राजनीतिक विवादों के घेरे में

इन नतीजों की चर्चा ऐसे समय में हो रही है जब हाल के दिनों में केंद्र सरकार कई राजनीतिक विवादों का सामना कर चुकी है। विपक्ष सरकार को छात्र आंदोलनों कानून-व्यवस्था और अन्य मुद्दों पर लगातार घेर रहा है जबकि भाजपा इन आरोपों को खारिज करते हुए विकास और संगठन की ताकत पर भरोसा जता रही है। ऐसे माहौल में आए उपचुनाव के परिणाम दोनों पक्षों के लिए राजनीतिक संदेश लेकर आए हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह केवल कुछ सीटों का उतार चढ़ाव है या फिर मतदाता वास्तव में अपना रुख बदलने लगे हैं? इसका अंतिम उत्तर अभी भविष्य के बड़े चुनाव देंगे। लेकिन इतना तय है कि इन उपचुनावों ने भारतीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। भाजपा के लिए यह आत्ममंथन का समय हो सकता है जबकि विपक्ष इसे अपने लिए नए अवसर के रूप में देखेगा।

Related Articles

Back to top button