मामूली हैसियत वाले गुजराती व्यापारी राजेश मेहता ने कर डाला 15 लाख करोड़ से ज्यादा का घोटाला

- 4PM बिजनेस की पहली खबर से पूंजी बाजार में तहलका
- गुजरात की आरईएल कंपनी ने सेबी से छिपाए अपनी कंपनी की पूंजी की जानकारी
- नियामक संस्था ने कंपनी पर लगाया कारोबार करने पर रोक
- मेहता ने एलआईसी और सार्वजनिक बैंकों का पैसा अपनी निजी खातों में डलवाया
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। भारतीय पूंजी बाजार में एक ऐसा घोटाला सामने आया है जिस कंपनी की हैसियत कुछ करोड़ की है पर उसने ग्लोबल कंपनी के नाम कई छोटे देशों के जीडीपी के बराबर अपनी पूंजी लगभग 15 लाख करोड़ के ऊपर बताकर आम आदमी को ठगा ही नहीं भारत सरकार के सार्वजनिक निगमों जैसे एलआईसी व बैंको का अरबों रुपये ढकार गया। वही सेबी का कहना है कि गुजरात के एक बिजनेसमैन ने भारत में गेटकीपर और रेगुलेटर से 15 लाख करोड़ रुपये की जानकारी छिपा ली। यही नहीं इतने बड़े घोटाले में राजेश मेहता का साथ बड़े रसूखदारों ने भी दिया जिन्होंने उसे भारत की सड़ेगले सिस्टम से लाभ उठाने में मदद की। दरअसल गुजरात के राजेश मेहता से जुड़ा कथित हजारों करोड़ रुपये का वित्तीय घोटाला सामने आने के बाद कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि कंपनी की वास्तविक स्थिति से अलग तस्वीर दिखाने के लिए फर्जी लेन-देन और संदिग्ध वित्तीय प्रविष्टियों के जरिए उसकी वैल्यू बढ़ाई गई। जैसे ही मामला सार्वजनिक हुआ, मुख्यधारा के बड़े मीडिया संस्थानों में इस पर अपेक्षित चर्चा नहीं दिखाई दी, जिससे और भी सवाल पैदा हुए। इतना ही नहीं उसने एलआईसी और सार्वजनिक बैंकों का पैसा अपनी निजी खातों में डलवाया।
राजेश एक्सपोट्र्स लिमिटेड का 99 प्रतिशत रेवेन्यू नकली
सेबी ने राजेश मेहता और आरईएल पर आरोप लगाया है कि उन्होंने वित्त वर्ष 2011-12 और 2014-15 के बीच लगभग 1.12 लाख करोड़ रुपये के रेवेन्यू को गलत तरीके से दिखाया या पेश किया। आसान शब्दों में कहें तो, वित्त वर्ष 11-12 और 14-15 के दौरान कंपनी के बताए गए कुल रेवेन्यू का लगभग 99 प्रतिशत हिस्सा आरईएल और उसकी सब्सिडियरी कंपनियों से जुड़ा था, जो असल में नकली था।
4PM बिजनेस ने पहले एपिसोड में उठाया मामला
4PM बिजनेस ने अपने पहले ही एपिसोड में इस पूरे मामले को प्रमुखता से उठाते हुए राजेश मेहता के कारोबार और उससे जुड़े आरोपों की परतें खोलने का प्रयास किया। यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उस पत्रकारिता की शुरुआत है जो बड़े नामों, बड़ी कंपनियों और सत्ता के करीब माने जाने वाले प्रभावशाली लोगों से जुड़े मामलों पर भी सवाल पूछने का दावा करती है। 4PM बिजनेस की पहली ही रिपोर्ट यह संकेत देती है कि आने वाले समय में चैनल कॉरपोरेट जगत, शेयर बाजार, बैंकिंग, उद्योग और आर्थिक नीतियों से जुड़े उन मुद्दों को भी उठाएगा जिन पर अक्सर खुलकर चर्चा नहीं होती। यदि शुरुआत का यह तेवर बरकरार रहा, तो आने वाले दिनों में कई बड़े खुलासे और महत्वपूर्ण पड़तालें देखने को मिल सकती हैं।
15.15 लाख करोड़ रुपये की गलत जानकारी दी गई
राजेश ने अपने रसूख से पूरी दुनिया में नाम बना रखा था। पर आज वित्तीय गड़बड़ी के आरोपों ने उस शानदार सफलता की कहानी पर सवालिया निशान लगा दिया है। सेबी ने आरईएल और उसके मालिक राजेश मेहता की जांच से जुड़े एक अंतरिम आदेश में यह निष्कर्ष निकाला है कि पांच वर्षों में कथित तौर पर 15.15 लाख करोड़ रुपये की गलत जानकारी दी गई थी। नतीजतन, सिक्योरिटीज मार्केट रेगुलेटर ने राजेश मेहता को अगले आदेश तक राजेश एक्सपोट्र्स की सिक्योरिटीज खरीदने, बेचने या किसी अन्य तरह का लेन-देन करने से रोक दिया है। आरईएल के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर राजेश मेहता ने 3 जून को कहा, यह एक अंतरिम आदेश है और इसमें कही गई कोई भी बात सच नहीं है। हम जांच के नतीजों को देख रहे हैं और जल्द ही इस पर विस्तृत बयान जारी करेंगे।
जनता को उठानी होगी आवाज
4PM बिजनेस ने इस मामले को उजागर कर देश के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन किया है। चैलन का मानना है कि ये जो भी पैसा घोटालेबाज ले उड़ते हैं वो आम आदमी की गाढ़ी कमाई होती है। जनता को भी इन घोटालेबाजों के साथ सरकार की संस्थाओं ईडी व सेबी के खिलाफ आवाज उठानी होगी ताकि सरकार ऐसे सख्त नियम बनाए जिससे कोई फिर से नीरव मोदी व विजय माल्या जैसे आमजन की गाढ़ी कमाई लूट कर विदेश न भाग जाए।
सेबी ने आरईएल के शेयरों में कारोबार करने से लगाई रोक
राजेश एक्सपोट्र्स लिमिटेड -आरईएल के खिलाफ सेबी के अंतरिम आदेश में हाल के कॉर्पोरेट इतिहास में वित्तीय गड़बड़ी के सबसे बड़े मामलों में से एक का आरोप लगाया गया है। रेगुलेटर ने एक नया फोरेंसिक ऑडिट करने का आदेश दिया है और मेहता को किसी भी तरह से आरईएल के शेयरों में कारोबार करने से रोक दिया है। सेबी का कहना है कि गुजरात के एक बिजनेसमैन ने भारत में गेटकीपर और रेगुलेटर से 15 लाख करोड़ रुपये छिपाए।
सेबी की चिंताएं आंकड़ों से आगे भी
सेबी के आदेश में बार-बार एक बात सामने आई है कि जांच करने वालों और फोरेंसिक ऑडिटर्स को जरूरी सहयोग नहीं मिला। सेबी ने कहा कि आरईएल ग्राहकों, सप्लायर्स, देनदारों, लेनदारों और इन्वेंट्री रिकॉर्ड से जुड़ी अहम जानकारी देने में बार-बार नाकाम रही। जांच करने वालों ने यह भी शिकायत की कि उन्हें एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग सिस्टम और ट्रांजैक्शन की स्वतंत्र रूप से जांच करने के लिए जरूरी मुख्य अकाउंटिंग रिकॉर्ड तक ठीक से पहुंच नहीं दी गई। आदेश के मुताबिक, कंपनी ने विदेशी सब्सिडियरी से जुड़ी जानकारी न देने के लिए स्विस डेटा सुरक्षा कानूनों और गोपनीयता की शर्तों का हवाला दिया। सेबी ने इन तर्कों को खारिज कर दिया और कहा कि विदेशी गोपनीयता के नियम भारतीय सिक्योरिटी कानूनों के तहत जानकारी देने की बाध्यता से ऊपर नहीं हो सकते। आदेश में सबसे कड़े बयानों में से एक में, रेगुलेटर ने कहा कि भारतीय कैपिटल मार्केट में काम करने वाली कोई लिस्टेड कंपनी कानूनी तौर पर जरूरी जानकारी देने की शर्तों को कमजोर करने या उनसे बचने के लिए निजी गोपनीयता समझौतों या विदेशी डेटा सुरक्षा नियमों का सहारा नहीं ले सकती – और वो भी ऐसे सुरक्षा नियम जो व्यक्तियों के लिए बने हैं, कंपनियों के लिए नहीं।
मार्च 24 में, सेबी को मिली थी शिकायत
मार्च 24 में, सेबी को असामान्य रूप से बड़ी व्यापार प्राप्तियों के बारे में शिकायतें मिलीं, जो दो साल से अधिक समय से बकाया थीं। (प्राप्तियां वे राशियां हैं जो कंपनी को अभी भी ग्राहकों से प्राप्त करनी हैं, जो कुछ हफ्तों या महीनों की सामान्य प्रतीक्षा अवधि है – वर्षों की नहीं।) अत्यधिक विलंबित प्राप्तियां नियामक का ध्यान आकर्षित करती हैं क्योंकि वे वसूली संबंधी समस्याओं, संदिग्ध लेनदेन या लेखांकन अनियमितताओं का संकेत दे सकती हैं। सेबी ने अक्टूबर 24 में एक जांच प्राधिकरण नियुक्त किया और बाद में एक फोरेंसिक ऑडिट शुरू किया। जांचकर्ताओं ने उन विदेशी सहायक कंपनियों की जांच शुरू की जिनके माध्यम से राजेश एक्सपोट्र्स ने दावा किया था कि उसका अधिकांश व्यवसाय संचालित होता है। नियामक ने अंतरिम आदेश में निष्कर्ष निकाला कि राजेश एक्सपोट्र्स के समेकित राजस्व का 97-99 प्रतिश हिस्सा विदेशी सहायक कंपनियों और स्टेप-डाउन सहायक कंपनियों से प्राप्त हुआ था, जिनमें से वैलकैम्बी एसए राजस्व का मुख्य स्रोत थी।
सालों से किया जाता रहा महिमामंडन
सालों से यह कहा जाता रहा है कि राजेश एक्सपोट्र्स दुनिया की एकमात्र ऐसी कंपनी है जिसकी उपस्थिति पूरी गोल्ड वैल्यू चेन में है, रिफाइनिंग से लेकर रिटेलिंग तक और यह दुनिया में सोने की सबसे बड़ी प्रोसेसर है। आरईएल, जैसा कि राजेश एक्सपोट्र्स को जाना जाता है, के बारे में कहा जाता था कि वह दुनिया में उत्पादित सोने का 35 प्रतिशत प्रोसेस करती है। सूत्रों ने कहा कि इसकी बिक्री अब तक आसानी से 45 बिलियन डॉलर से अधिक हो गई होगी। कंपनी वैलकैम्बी की भी मालिक है, जिसे स्विट्जरलैंड के बालेर्ना में दुनिया की सबसे बड़ी गोल्ड रिफाइनरी कहा जाता है। वाल्कैम्बी की मालिक यूरोपियन गोल्ड रिफाइनरीज है, जिसकी मालिक ग्लोबल गोल्ड रिफाइनरीज एजी है। ग्लोबल गोल्ड रिफाइनरीज एजी में 95 प्रतिशत हिस्सेदारी आरईएल सिंगापुर पीटीई लिमिटेड की और 5 प्रतिशत हिस्सेदारी राजेश एक्सपोट्र्स लिमिटेड इंडिया की है। इस तरह, वाल्कैम्बी पर पूरी तरह से (100 प्रतिशत) राजेश एक्सपोट्र्स का कंट्रोल है, जो आरईएल सिंगापुर की पैरेंट कंपनी है। सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) का यह भी कहना है कि कंपनी में कथित गड़बड़ी के कारण शेयरहोल्डर्स की संपत्ति को जो नुकसान हुआ है, वह 12,726 करोड़ रुपये तक हो सकता है।




