गुरुग्राम तोड़फोड़ विवाद: SC ने हस्तक्षेप से मना किया, HC जाने को कहा
RWA का कहना है कि इससे प्रभावित सेक्टरों में 3 दशकों से अधिक समय से रह रहे करीब 1,500 परिवारों को अब अपनी संपत्तियों के तत्काल ढहाए जाने का खतरा मंडरा रहा है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: RWA का कहना है कि इससे प्रभावित सेक्टरों में 3 दशकों से अधिक समय से रह रहे करीब 1,500 परिवारों को अब अपनी संपत्तियों के तत्काल ढहाए जाने का खतरा मंडरा रहा है.
आरोप है कि अधिकारी बिना किसी को अलग से ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किए या सुनवाई का मौका दिए ही कार्रवाई कर रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने आज सोमवार को गुरुग्राम में चल रही तोड़फोड़ से जुड़े अभियान को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई करने से मना कर दिया, और याचिकाकर्ताओं से इस मामले को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ले जाने का निर्देश दिया. साथ ही याचिकाकर्ताओं को आज ही हाईकोर्ट के सामने इस मामले का तुरंत ज़िक्र करने की भी आजादी दी गई, और सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि वे इस मामले पर दोपहर 1 बजे या लंच ब्रेक के तुरंत बाद सुनवाई करें.
सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच के सामने मौखिक रूप से इस केस का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि गुरुग्राम में तोड़फोड़ का काम चल रहा है, और दावा किया कि यह कार्रवाई बिना किसी अनिवार्य कारण बताओ नोटिस जारी किए बगैर ही की जा रही है. उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने तोड़फोड़ को लेकर कुछ नहीं कहा. आदेश की गलत व्याख्या की जा रही है.
आदेश की गलत व्याख्या कर शुरू हुई तोड़फोड़’
इस पर CJI सूर्यकांत ने पूछा, “लेकिन ये तो अनाधिकृत निर्माण हैं. अगर हाई कोर्ट अपना संवैधानिक कर्तव्य निभा रहा है, तो एक शीर्ष संस्था के तौर पर हम इसमें बाधा क्यों डालें?” शंकरनारायणन ने अपना पक्ष रखते हुए दावा किया कि अधिकारियों ने हाईकोर्ट से पारित एक अंतरिम आदेश की गलत व्याख्या करके तोड़फोड़ की प्रक्रिया शुरू कर दी है. उन्होंने जोर देकर कहा कि ये निर्माण कानूनी हैं. CJI कांत ने इस पर कहा कि यह तर्क हाईकोर्ट के सामने ही उठाया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका गुरुग्राम के सेक्टर-31 (लेन 635 से 937) के निवासियों की ओर से दायर की गई है, जिसमें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के एक अंतरिम आदेश को चुनौती दी गई. इस आदेश ने ‘स्टिल्ट + 4’ (S+4) निर्माण नीति पर पूरे राज्य में रोक लगा दी है. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि अधिकारियों ने इस आदेश का दुरुपयोग करके बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ का अभियान शुरू कर दिया है, जिससे गुरुग्राम में हजारों निवासी प्रभावित हो रहे हैं.
2 अप्रैल के फैसले के खिलाफ SC में याचिका
यह स्पेशल लीव पीटिशन (Special Leave Petition) हाईकोर्ट के 2 अप्रैल के अंतरिम आदेश के खिलाफ दायर की गई है, जो एक लंबित जनहित याचिका (PIL) से जुड़ा हुआ है. याचिकाकर्ताओं का दावा है कि प्रशासनिक अधिकारियों ने इस रोक को एक “हथियार” के तौर पर इस्तेमाल किया, ताकि वे वैधानिक प्रक्रियाओं को दरकिनार कर सकें और बिना किसी लीगल नोटिस या न्यायिक फैसले के पूरे शहर में अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई शुरू कर सकें.
याचिका के अनुसार, S+4 निर्माण नीति पर हाईकोर्ट की रोक के बाद, राज्य के अधिकारियों ने 16 अप्रैल, को एक निर्देश जारी किया. उन्होंने इस आदेश की व्याख्या इस तरह की कि यह कई आवासीय सेक्टरों में चारदीवारी, रैंप और हरे-भरे इलाकों को तुरंत तोड़ने का अधिकार देता है. उनका तर्क है कि हाईकोर्ट ने केवल नीति संबंधी अधिसूचना के कार्यान्वयन पर रोक लगाई थी, और उसने किसी भी तरह की तोड़फोड़ या अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई का निर्देश नहीं दिया था.
RWA की ओर से कहना है कि इससे प्रभावित सेक्टरों में 3 दशकों से अधिक समय से रह रहे करीब 1,500 परिवारों को अब अपनी संपत्तियों के तत्काल ढहाए जाने का खतरा मंडरा रहा है. आरोप है कि अधिकारी बिना किसी को अलग से ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किए या सुनवाई का मौका दिए ही कार्रवाई कर रहे हैं.



