रामलला के दरबार में हिसाब की घड़ी, भरोसे की अग्निपरीक्षा

- महासचिव चंपत राय और सदस्य अनिल मिश्रा के इस्तीफे पर मंथन
- नित्य नये खुलासों से परेशान मंदिर ट्रस्ट, चढ़ावा नकदी और चांदी को लेकर लग रहे हैं गंभीर आरोप
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। अयोध्या आज सिर्फ एक धार्मिक नगरी नहीं बल्कि पूरे देश की नजरों का केंद्र बनी हुई है। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक राम मंदिर आज पूजा अर्चना से ज्यादा जवाबदेही की बहस के कारण चर्चा में है। मंदिर परिसर में दोपहर तीन बजे से होने वाली श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बैठक को लेकर राजनीतिक गलियारों से लेकर धार्मिक संगठनों तक बेचैनी साफ दिखाई दे रही है। वजह सिर्फ बैठक नहीं बल्कि वह आरोप हैं जिन्होंने राम मंदिर के चढ़ावे, नकदी, चांदी और दान के प्रबंधन को लेकर देशव्यापी बहस छेड़ दी है। महासचिव चंपत राय और सदस्य अनिल मिश्रा के इस्तीफों की अटकलों ने इस बैठक को और भी संवेदनशील बना दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी स्थिति बनी कैसे कि रामलला के नाम पर दिए गए दान को लेकर सार्वजनिक जीवन में इतने तीखे आरोप सुनाई देने लगे? विपक्ष लगातार दान चोरी मामले में सवाल उठा रहा है जबकि ट्रस्ट और उससे जुड़े लोग इन आरोपों को सिरे से खारिज कर रहे हैं। विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार ने साफ कहा है कि यदि किसी के पास ठोस सबूत हैं तो वह जांच एजेंसियों को उपलब्ध कराए ताकि दोषियों को सजा मिले। उन्होंने विपक्ष द्वारा लगाए गए 20 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा गायब हैं के आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि हमें मिली जानकारी के मुताबिक इतनी रकम तो मिली ही नहीं थी। यह बयान केवल एक सफाई नहीं बल्कि पूरे विवाद के केंद्र में खड़े सबसे बड़े दावे का प्रतिवाद भी है। अब सवाल यह नहीं रह गया कि आरोप किसने लगाए और जवाब किसने दिया। असली सवाल यह है कि क्या आज की बैठक के बाद वह पारदर्शिता सामने आएगी जिसकी अपेक्षा करोड़ों श्रद्धालु कर रहे हैं? क्योंकि राम मंदिर किसी राजनीतिक दल संगठन या व्यक्ति की निजी विरासत नहीं है बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है। इसलिए यदि आरोप निराधार हैं तो उन्हें तथ्यों के साथ खारिज किया जाना भी उतना ही जरूरी है और यदि कहीं कोई चूक हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच और जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक है। आज अयोध्या में होने वाली यह बैठक केवल एजेंडा और प्रस्तावों की बैठक नहीं है यह उस भरोसे की परीक्षा है जिसे देश ने रामलला के चरणों में समर्पित किया है। फैसले चाहे जो हों लेकिन आज का दिन इस बहस को नई दिशा अवश्य देगा।
सियासत गर्म कांग्रेस का हमला
राम मंदिर से जुड़े विवाद ने राजनीतिक तापमान भी बढ़ा दिया है। कांग्रेस इस मुद्दे को पारदर्शिता और जवाबदेही के सवाल से जोड़ रही है जबकि भाजपा और उससे जुड़े संगठन आरोपों को राजनीतिक अभियान करार दे रहे हैं। इसी बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने महाकाल से अयोध्या तक पदयात्रा और राम मंदिर निर्माण के लिए दिए गए अपने दान के उपयोग का हिसाब मांगने की घोषणा कर बहस को नया आयाम दे दिया है। उनका कहना है कि श्रद्धालुओं को यह जानने का अधिकार है कि उनकी ओर से दिया गया दान किस प्रकार उपयोग में लाया गया।
इतना चढ़ावा मिला ही नहीं जितने के आरोप
राम मंदिर के चढ़ावे और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर छिड़ी बहस अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रह गई है। विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार ने विपक्ष के उन आरोपों पर सीधी प्रतिक्रिया दी है जिनमें दावा किया गया कि 20 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा गायब हैं। आलोक कुमार ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि हमें मिली जानकारी के मुताबिक इतनी रकम तो मिली ही नहीं थी। उन्होंने कहा कि यदि किसी नेता या किसी भी व्यक्ति के पास आरोपों के समर्थन में ठोस साक्ष्य हैं तो उन्हें चल रही जांच में उपलब्ध कराया जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से उन्होंने जांच अधिकारी को पत्र लिखकर उन नेताओं के बयानों की भी जांच करने की मांग की है जिन्होंने सार्वजनिक मंचों से वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं। आलोक कुमार के अनुसार चूंकि यह प्रभावशाली सार्वजनिक पदों पर बैठे लोग हैं इसलिए यदि उन्होंने ऐसे आरोप लगाए हैं तो संभव है कि उनके पास कुछ तथ्य भी हों।
भाजपा और विहिप बोली साक्ष्य लांए
दूसरी ओर भाजपा और विहिप का कहना है कि यदि किसी के पास ठोस साक्ष्य हैं तो उन्हें जांच प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाए न कि केवल राजनीतिक मंचों पर आरोप लगाए जाएं। इसी टकराव ने इस पूरे विवाद को राष्ट्रीय स्तर की बहस बना दिया है। सोशल मीडिया से लेकर टीवी स्टूडियो तक एक ही सवाल गूंज रहा है कि क्या यह केवल राजनीतिक संघर्ष है या पारदर्शिता की वास्तविक मांग। राम मंदिर विश्वभर में करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। इसलिए उससे जुड़ा हर विवाद देश की सीमाओं से बाहर भी चर्चा का विषय बनता है। प्रवासी भारतीय समुदाय अंतरराष्ट्रीय मीडिया और वैश्विक हिंदू संगठनों की भी इस घटनाक्रम पर नजर है। ऐसे में आज की ट्रस्ट बैठक का महत्व केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि प्रतीकात्मक भी है। यह बैठक इस बात का संकेत दे सकती है कि आस्था से जुड़े इतने बड़े संस्थान में उठे सवालों का उत्तर किस तरह दिया जाएगा और भविष्य में भरोसा और पारदर्शिता कैसे मजबूत की जाएगी।




