चीन-पाकिस्तान सीमा पर भारत की तैयारी मजबूत, सेना को मिलेगी बड़ी मदद

दुर्गम सीमाओं पर तैनात भारतीय सैनिकों तक भारी रसद पहुंचाना अब बेहद आसान होने जा रहा है. भारतीय सेना के लिए SABAL-200 बेहद शक्तिशाली और भारी-भरकम (Heavy-Lift) ड्रोन तैयार होगा, जो सीमा पर गेम-चेंजर साबित होगा.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: दुर्गम सीमाओं पर तैनात भारतीय सैनिकों तक भारी रसद पहुंचाना अब बेहद आसान होने जा रहा है. भारतीय सेना के लिए SABAL-200 बेहद शक्तिशाली और भारी-भरकम (Heavy-Lift) ड्रोन तैयार होगा, जो सीमा पर गेम-चेंजर साबित होगा.

लद्दाख, सियाचिन और अरुणाचल प्रदेश जैसी दुर्गम सीमाओं पर तैनात भारतीय सैनिकों तक भारी रसद (सप्लाई) पहुंचाना अब बेहद आसान होने जा रहा है. भारत ने रक्षा क्षेत्र में ‘आत्मनिर्भरता’ की ओर एक और बड़ा कदम बढ़ाया है. ‘EndureAir Systems’ को भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) और टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट बोर्ड (TDB) से 30.01 करोड़ रुपये का बड़ा फंड मिला है. इस रकम के बाद भारतीय सेना के लिए SABAL-200 बेहद शक्तिशाली और भारी-भरकम (Heavy-Lift) ड्रोन तैयार होगा, जो सीमा पर गेम-चेंजर साबित होगा.

फॉरवर्ड पोस्ट्स पर हथियारों और राशन की सप्लाई होगी आसान
अक्सर सर्दियों के मौसम में भारी बर्फबारी के कारण चीन और पाकिस्तान से सटी सीमाओं पर भारतीय सेना के रास्ते बंद हो जाते हैं. ऐसे में अग्रिम चौकियों (Forward Posts) तक रसद, दवाइयां और गोला-बारूद पहुंचाना एक बड़ी चुनौती होता है. SABAL-200 इसी चुनौती को खत्म करने के लिए डिजाइन किया गया है.

200 किलो की भारी क्षमता: यह ड्रोन एक बार में 200 किलोग्राम तक का भारी सैन्य साजो-सामान उठा सकता है.
लंबी दूरी और मारक क्षमता: यह दुश्मन की नजरों से बचते हुए 200 किलोमीटर के दायरे में ऑपरेशन चला सकता है और लगातार 2.5 घंटे तक हवा में रह सकता है. नो रनवे, नो टेंशन (VTOL): इसके लिए किसी रनवे या हेलिपैड की जरूरत नहीं है. यह हेलीकॉप्टर की तरह सीधी उड़ान भर सकता है और किसी भी संकरी पहाड़ी चोटी पर सीधे उतर सकता है.

​तकनीक जो मुश्किल हालातों में देगी सेना का साथ
IIT कानपुर के रिसर्च इकोसिस्टम से निकले इस ड्रोन में टर्बोचार्ज्ड इंटरनल कंबशन इंजन और एडवांस मैकेनिकल पावरट्रेन का इस्तेमाल किया गया है. इसका मतलब यह है कि यह ड्रोन high-altitude (बेहद ऊंचे पहाड़ी इलाकों) और ऑक्सीजन की कमी वाले क्षेत्रों में भी बिना फेल हुए उड़ान भर सकता है.

​इससे पहले इस सीरीज के छोटे ड्रोन्स (SABAL-20 और SABAL-40) पहले ही भारतीय सेना के साथ कठिन इलाकों में अपनी ताकत साबित कर चुके हैं. अब इसका 200 किलो वाला वेरिएंट सेना की लॉजिस्टिक्स (रसद प्रणाली) का पूरा चेहरा बदल देगा.

​राष्ट्रीय सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के लिहाज से क्यों अहम है यह कदम?
डीप-टेक मिलिट्री एयरोस्पेस सिस्टम बनाना एक लंबा और जटिल काम है. इसके लिए कड़े फील्ड ट्रायल्स और टेस्टिंग की जरूरत होती है. सरकारी फंड (RDI) मिलने से इस महा-ड्रोन को एडवांस स्टेज से सीधे बॉर्डर पर तैनात करने लायक ‘फील्ड-रेडी’ प्लेटफॉर्म बनाया जाएगा.

​विदेशी निर्भरता खत्म : अब तक भारत को इस तरह की भारी क्षमता वाले ड्रोन्स या उनके पार्ट्स के लिए विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता था. इस स्वदेशी ड्रोन के आने से देश का पैसा बचेगा और संवेदनशील सैन्य डेटा भी देश के भीतर सुरक्षित रहेगा. ​रणनीतिक बढ़त: युद्ध या आपातकाल की स्थिति में यह ड्रोन बिना किसी मानवीय जान के जोखिम के, घने जंगलों और ऊंचे पहाड़ों में घिरे सैनिकों तक तुरंत मदद पहुंचा सकेगा. यह प्रोजेक्ट न सिर्फ भारत की रक्षा तैयारियों को मजबूत करेगा, बल्कि देश के भीतर ही डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग का एक नया इकोसिस्टम खड़ा करेगा, जिससे छोटे शहरों में भी डिफेंस सेक्टर से जुड़े रोजगार पैदा होंगे.

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