14 सीटों पर आमने–सामने Mahayuti, एकजुटता के दावे में दरार की इनसाइड स्टोरी!
महाराष्ट्र में 29 महानगरपालिका के चुनावों के लिए नामांकन की प्रक्रिया के आखिरी दिन सत्ताधारी महायुति सरकार में शामिल बीजेपी और डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे की शिवसेना के बीच भारी टूट दिखाई दी...

4पीएम न्यूज नेटवर्क: महाराष्ट्र में 29 महानगरपालिका के चुनावों के लिए नामांकन की प्रक्रिया के आखिरी दिन सत्ताधारी महायुति सरकार में शामिल बीजेपी और डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे की शिवसेना के बीच भारी टूट दिखाई दी…
या यूं कहे कि महानगरपालिका चुनावों से पहले महायुति बिखर गई….भाजपा और शिवसेना (शिंदे गुट) के बीच सीट बंटवारे को लेकर पेंच फंस गया और 1-2 जगह नहीं बल्कि, 14 जगहों पर महायुति गठबंधन टूट गया….एक ओर महायुति में भारी टूट खुलकर सामने आ गई…तो वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार में मौजूदा मंत्री ने सीधा-सीधा बीजेपी पर धोखा देने का गंभीर आरोप लगा दिया……तो आखिर क्यों चुनाव से ठीक पहले महायुति में दिखी भारी टूट और किस मंत्री ने सीधा बीजेपी को लिया आड़े हाथों…
2024 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव तो आपको याद ही होंगे…जहां सीट बंटवारे को लेकर महायुति के भीतर भारी अनबन देखने को मिली थी… अगर नहीं याद हैं तो हम आपको बता दें कि…2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में महायुति में शामिल BJP, एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की NCP गठबंधन में सीट शेयरिंग को लेकर काफी खींचतान और बवाल हुआ था…और ये बवाल मुख्य रूप से तब उभरा था…जब नामांकन की तारीखें नजदीक आ गईं थीं…अब यही सीटों का टकराव महाराष्ट्र में होने वाले महानगरपालिका चुनाव से पहले नामांकर के आखिरी दिन दिखाई दिया…
जिसका नतीजा ये रहा कि महाराष्ट्र की 14 नगर निगमों में भाजपा-शिवसेना का गठबंधन टूट गया और साथ ही भाजपा पर विश्वासघात का आरोप तक लगाया गया…वहीं एकनाथ शिंदे और बीजेपी मिलकर भले ही BMC का चुनाव साथ लड़ रहे हों, लेकिन बाकी के महानगर निगम में महायुति के बीच दरार साफ दिख रही है…सूबे के 29 महानगर निगम में से 14 नगर निगम में शिंदे और बीजेपी आमने-सामने चुनावी मैदान में है…अजित पवार पहले ही महायुति से अलग चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन BMC में सीट न मिलने से रामदास अठावले की पार्टी भी नाराज है….
दरअसल, नामांकन के आख़िरी दिन राजनीति का असली चेहरा सामने आ गया…जिन गठबंधनों को चुनाव से पहले अटूट, मज़बूत और ऐतिहासिक बताया जा रहा था…वही गठबंधन नामांकन की समय-सीमा खत्म होते-होते हिलते नजर आए…इस्तीफे, बगावत, नाराज़गी, खुले मंच से विरोध, कार्यकर्ताओं का हंगामा और बंद कमरों में समझौते…ये सब कुछ एक ही दिन में देखने को मिला…महायुति, जो सत्ता की सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही थी…14 सीटों पर खुद अपने ही घटक दलों के सामने खड़ी दिखी…
सवाल साफ है कि क्या ये सिर्फ सीट बंटवारे की तकरार है या महायुति में टूट की शुरुआत?……क्योंकि, नामांकन का आख़िरी दिन अक्सर राजनीतिक ड्रामे का दिन होता है….लेकिन इस बार जो हुआ, उसने गठबंधनों की अंदरूनी सच्चाई उजागर कर दी…कई जगहों पर उम्मीदवारों ने ऐन वक्त पर नाम वापस लेने से इनकार कर दिया…कहीं पार्टी कार्यालयों के बाहर नारेबाज़ी हुई…तो कहीं समर्थकों ने अपने ही नेताओं के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया…ये साफ हो गया कि ऊपर से दिखने वाली एकता ज़मीन पर उतनी मज़बूत नहीं है, जितनी प्रचार में बताई जा रही थी….
महायुति लंबे समय से खुद को स्थिर, अनुशासित और चुनावी रूप से अजेय बताती रही है…दावा किया गया कि सीट शेयरिंग पर सहमति समय रहते बन गई है और किसी तरह का असंतोष नहीं है…लेकिन नामांकन के आख़िरी दिन 14 सीटों पर महायुति के घटक दलों के उम्मीदवार आमने-सामने खड़े दिखे…ये केवल तकनीकी चूक नहीं थी…बल्कि राजनीतिक संदेश था कि निचले स्तर पर नाराज़गी गहरी है……हर गठबंधन में सीट बंटवारा सबसे संवेदनशील मुद्दा होता है…महायुति में भी यही हुआ…कई पुराने नेताओं को टिकट नहीं मिला….तो कई क्षेत्रों में बाहरी उम्मीदवार थोपे जाने का आरोप लगा…..स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना था कि जमीन पर काम करने वालों को नज़रअंदाज़ कर दिया गया….ये नाराज़गी चुपचाप नहीं रही, बल्कि नामांकन के दिन खुलकर सामने आ गई…
इन बागी उम्मीदवारों को अक्सर अनुशासनहीन कहकर खारिज कर दिया जाता है…लेकिन हकीकत इससे अलग है…कई नेताओं के लिए ये विचारधारा की नहीं….बल्कि राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई थी….सालों से जिस क्षेत्र में मेहनत की….वहां टिकट किसी और को मिल जाना स्वाभाविक रूप से आक्रोश पैदा करता है…महायुति के भीतर यही आक्रोश बगावत का रूप लेता दिखा….कुछ जगहों पर नाराज़ नेताओं ने पार्टी पदों से इस्तीफा देकर दबाव बनाने की कोशिश की…ये संदेश साफ था कि या तो टिकट दो, या खुला विरोध झेलो…….
हालांकि शीर्ष नेतृत्व ने कई मामलों में इस्तीफों को औपचारिक बताकर खारिज किया…लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि ये अंदरूनी संकट का संकेत है….क्योंकि, नामांकन केंद्रों के बाहर हुआ हंगामा सिर्फ भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं था….ये उस असंतोष का विस्फोट था…जो लंबे समय से दबाया जा रहा था….कार्यकर्ताओं ने नारे लगाए…जिससे सवाल उठता है कि अगर गठबंधन वाकई मज़बूत होता, तो ये नौबत क्यों आती?….
महायुति के नेता इसे कोऑर्डिनेशन की कमी या तकनीकी गड़बड़ी बता रहे हैं….लेकिन 14 सीटों पर एक साथ ऐसा होना संयोग नहीं माना जा सकता…ये साफ तौर पर असंतुष्ट नेताओं का संदेश है कि वो ऊपर के फैसलों से सहमत नहीं हैं….चुनाव के वक्त ऐसी बगावत छोटी नहीं होती…ये वोटों के बंटवारे का कारण बनती है….सबसे दिलचस्प बात यह रही कि शीर्ष नेतृत्व ने आख़िरी दिन तक कई मामलों में खुला हस्तक्षेप नहीं किया….
कुछ जगहों पर समझौते की कोशिश हुई…लेकिन ज़्यादातर मामलों में समय निकल गया…ये या तो रणनीतिक चुप्पी थी या फिर हालात पर नियंत्रण की कमी…दोनों ही सूरतें महायुति के लिए चिंता का विषय हैं….महायुति में शामिल केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले की RPI भी बेहद नाराज है….अठावले ने सीट बंटवारे को बहुत बड़ा धोखा करार देते हुए कहा कि उनकी पार्टी को सम्मानजनक सीटें नहीं दी गईं….जिसके बाद अठावले ने ऐलान किया है कि उनकी पार्टी मुंबई में 38 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी….
केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने कहा कि बहुत बड़े धोखे को कोशिश बीजेपी की ओर से की गई है……यानी कि कागज़ों पर गठबंधन धर्म निभाया जा रहा है…लेकिन ज़मीनी सियासत अलग कहानी कहती है…स्थानीय नेता अपने क्षेत्र को लेकर समझौता करने को तैयार नहीं दिखे….ये वही टकराव है, जो हर बड़े गठबंधन को कमजोर करता है—ऊपर की सहमति और नीचे की असहमति…महायुति की ये अंदरूनी कलह विपक्ष के लिए किसी तोहफे से कम नहीं….जहां गठबंधन के घटक दल एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़े हैं…..
वहां विपक्ष को अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ेगी…वोटों का बिखराव और भ्रम अपने आप विपक्ष के पक्ष में माहौल बना सकता है…राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 14 सीटों पर सीधा नुकसान तय है…लेकिन इसका मनोवैज्ञानिक असर इससे कहीं ज़्यादा होगा….जब गठबंधन की एकता पर सवाल उठते हैं, तो बाकी सीटों पर भी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है…चुनाव सिर्फ उम्मीदवारों से नहीं, बल्कि संगठन और उत्साह से जीते जाते हैं…
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ये महायुति में टूट की शुरुआत है या फिर आख़िरी समय का झटका, जिसे बाद में संभाल लिया जाएगा?…इतिहास बताता है कि चुनाव के वक्त की बगावत अक्सर लंबे समय तक असर छोड़ती है…कई बार चुनाव बाद समझौते हो जाते हैं, लेकिन नुकसान तब तक हो चुका होता है….एक तरफ मंचों से एकता के नारे लग रहे हैं….दूसरी तरफ ज़मीनी स्तर पर खींचतान साफ दिख रही है…ये विरोधाभास मतदाताओं को भ्रमित करता है…जब मतदाता देखता है कि नेता आपस में ही लड़ रहे हैं, तो वह गठबंधन की स्थिरता पर सवाल उठाता है….
नामांकन का आख़िरी दिन महायुति के लिए चेतावनी बनकर आया है…इस्तीफा, बगावत और हंगामे ने यह साफ कर दिया कि गठबंधन सिर्फ समझौतों से नहीं, विश्वास से चलता है….14 सीटों पर आमने–सामने खड़ा होना कोई छोटी बात नहीं है…आने वाले चुनाव में ये देखना दिलचस्प होगा कि महायुति इस दरार को भर पाती है या यही दरार उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है…ये चुनाव सिर्फ सीटों की नहीं, बल्कि गठबंधन की मजबूती की भी परीक्षा है और नामांकन के आख़िरी दिन ने बता दिया है कि ये परीक्षा आसान नहीं होने वाली….



