जियो आईपीओ नाम बड़ा तो सवाल बड़े!

- 52 करोड़ ग्राहकों की ताकत, घटते कर्मचारी जीरो डिविडेंड और एआई के सपने
- निवेशक पैसा लगाने से पहले हिसाब जरूर पूछें
- पैसा भावना से नहीं, हिसाब सवाल पूछकर लगाएं
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। जियो का नाम सुनते ही आपके दिमाग में सबसे पहले क्या आता है? 52 करोड़ से Óयादा ग्राहक? देश का सबसे बड़ा डिजिटल नेटवर्क? मुकेश अंबानी? 5जी? एआई? या फिर वह कंपनी जिसने 2020 में दुनिया के बड़े-बड़े टेक दिग्गजों को अपने दरवाजे तक खींच लिया था। अगर इनमें से कुछ भी आपके दिमाग में आया है तो जरा रुकिए। क्योंकि अब उसी जियो के दरवाजे पर आपका पैसा दस्तक देने वाला है। और इस बार सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जियो कितना बड़ा है।
सवाल यह है कि आपका पैसा जियो के पास क्यों जा रहा है? कहां जाएगा? और उसके बदले आपको मिलेगा क्या? सेबी ने जियो प्लेटफार्मस के प्रस्तावित आईपीओ के लिए रास्ता साफ कर दिया है। प्रस्तावित इश्यू का आकार करीब &7,700 करोड़ तक पहुंच सकता है और यह भारत का सबसे बड़ा आईपीओ बन सकता है। जियो प्लेटफार्मस करीब 27 करोड़ नए शेयर जारी करने की तैयारी में है। लेकिन कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा वह संख्या है जिसे विज्ञापनों की चमक में शायद सबसे पीछे रखा जाए 27, 500 करोड़। यही वह रकम है जिसे कंपनी रिलांयस जियो इंफोकाम के पुराने कर्ज को चुकाने या प्रीपे करने में इस्तेमाल कर सकती है?
सवाल पूछना, सवाल उठाना गुनाह नहीं
सवाल पूछना गुनाह नहीं है सवाल उठाना जुर्म नहीं है अब सवाल यह है कि अगर जियो का भविष्य इतना सुनहरा है अगर एआई, क्लाउड, 5जी और डिजिटल इंडिया की अगली क्रांति जियो के दरवाजे पर खड़ी है अगर कंपनी के पास 52 करोड़ से यादा ग्राहकों का विशाल आधार है तो फिर आईपीओ से जुटाए जाने वाले हजारों करोड़ में इतनी बड़ी रकम पुराने कर्ज को चुकाने में क्यों प्रस्तावित की जा रही है? क्या यह नई छलांग की तैयारी है? क्या यह बैलेंस शीट को और मजबूत करने की रणनीति है? या निवेशक से जुटाए गए पैसे का एक बड़ा हिस्सा पहले से मौजूद वित्तीय बोझ को हल्का करने में जाएगा? जवाब कंपनी के दस्तावेजों में है लेकिन सवाल निवेशक को खुद पूछना होगा। और यहीं से कहानी दिलचस्प होती है क्योंकि आईपीओ कोई भावनात्मक रिश्ता नहीं है। आईपीओ में आप कंपनी का नाम नहीं खरीदते आप उसके भविष्य की कीमत चुकाते हैं। रिलायंस बहुत बड़ा नाम है जियो बहुत बड़ा नाम है ग्राहकों का बेस बहुत बड़ा है नेटवर्क बहुत बड़ा है एआई की महत्वाकांक्षा बहुत बड़ी है तो इन सब के साथ निवेशक का पहला सवाल भी उतना ही बड़ा होना चाहिए कि कंपनी कमाती कितना है और मेरे पैसे का इस्तेमाल कहां और कैसे करेगी?
क्या कर्ज चुकाने में जाएगी बड़ी रकम?
जानकारों के मुताबिक आईपीओ से जुटाई जाने वाली रकम का बड़ा हिस्सा रिलांयस जियो इंफोकाम के कर्ज को चुकाने में इस्तेमाल होने की योजना है। इसका मतलब यह नहीं कि यह गलत है। कर्ज चुकाना कंपनी की वित्तीय स्थिति को मजबूत कर सकता है। लेकिन निवेशक को यह जरूर समझना चाहिए कि वह जिस आईपीओ को नई ग्रोथ में निवेश समझकर देख रहा है उसके क्रियान्वन का बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने/कर्ज घटाने में जाने वाला प्रस्तावित है।
क्या भारतीय निवेशक के हाथ में आयेगा जियो प्लेटफार्मस?
2020 को याद कीजिए उस समय जियो ने आईपीओ नहीं निकाला था। जियो प्लेटफार्म ने ग्लोबल इंवेस्टर से 1.52 लाख करोड़ जुटाए थे। फेसबुक यानी मेटा, गूगल और दुनिया के बड़े निवेशकों ने जियो प्लेटफार्मस में पैसा लगाया। रिलायंस ने इसे अपने डिजिटल कारोबार की ताकत और भविष्य के विश्वास की बड़ी मिसाल के तौर पर पेश किया। अब छह साल बाद कहानी का अगला एपीसोड जनता के पैसों को आईपीओ के जरिये निवेश के तौर पर सामने हाजिर होने वाला है। और यही फर्क बेहद महत्वपूर्ण है। 2020 में रणनीतिक और वित्तीय निवेशक जियो प्लेटफार्मस में हिस्सेदारी खरीद रहे थे। अब खुदरा निवेशक भी जियो के शेयर का मालिक बनने की दौड़ में शामिल होने वाले हैं। यानी जियो की कहानी अब सिर्फ ग्लोबल इंवेस्टर के कमरे में तय नहीं होगी बल्कि उसका एक हिस्सा आम भारतीय निवेशक के हाथ में भी जाएगा।
निवेशक के सामने सबसे बड़ा खतरा इंपल्स बाइंग का है?
इंपल्स बाइंग मतलब जर्बदस्ती खरीदारी। मग के साथ बाल्टी फ्री, मोजे के साथ जूते फ्री इस तरह के ऑफर सुपर मार्केट में देखने को मिलते हैं और ऑफर देखकर खरीदारी करने गया आम परिवार आटा दाल खरीदने क बाजाए बाल्टी और जूते खरीद कर वापस आ जाता है जिसकी उसे जरूरत नहीं । कहीं कुछ ऐसा ही आने वाले दिनो में भारतीय शेयर बाजारों में भी तो देखने को नहीं मिलने वाला जिसकी संभावना 100 फीसदी है। क्योंकि जिस कंपनी के शेयर आने वाले हैं उस कांपनी का मीडिया पर कब्जा है। खुद के दर्जनो चैनल के साथ उसका दखल दूसरे मीडिया संस्थानों में भी है ऐसे में टीवी पर विशेषज्ञों की बहस होगी सोशल मीडिया पर जियो का शेयर नहीं लिया तो क्या लिया जैसा माहौल बनाए जाने की प्रबल संभावना है ऐसा एक्सपर्ट का कहना है।
एक्सपर्ट की नजर में यहीं रुकना चाहिए
पैसा भावना से नहीं हिसाब देखकर लगाया जाता है। क्योंकि आईपीओ के समय कहानी हमेशा भविष्य की होती है। कंपनी बताएगी कि वह अगले पांच साल में क्या करेगी। बाजार बताएगा कि कंपनी कितनी बड़ी है। विशेषज्ञ बताएंगे कि यह ऐतिहासिक मौका है। विज्ञापन आपको बताएंगे कि डिजिटल इंडिया का अगला युग आने वाला है। लेकिन निवेशक को एक छोटा सा सवाल पूछना चाहिए कि आज की कीमत कितनी है? क्योंकि 100 रुपये की चीज अगर 500 रुपये में बेची जा रही है तो सिर्फ इसलिए वह सस्ती नहीं हो जाती कि दुकान पर रिलायंस का बोर्ड लगा है। अभी जियो प्लेटफार्मस के आईपीओ की अंतिम कीमत तय नहीं हुई है। प्रस्तावित इश्यू का मूल्यांकन करीब 9.5 लाख करोड़ तक पहुंचने की चर्चाओं में है और अंतिम कीमत बुक बिल्डिंग के जरिए तय होगी। यानी असली परीक्षा तब होगी जब प्राइस बैंड सामने आएगा।
इसलिए सवाल अभी से तैयार रखिए
क्या जियो की कीमत उसकी कमाई के हिसाब से उचित होगी? या फिर निवेशक से कहा जाएग कि भविष्य देखिए? भविष्य जरूर देखिए लेकिन बैलेंस शीट साथ लेकर और अब आइए उस सवाल पर जिसे सबसे यादा नजरअंदाज नहीं किया जा सकता वह है डिविडेंड। आखिर जियो प्लेटफार्मस ने अपने गठन के बाद से अपने सामान्य शेयरों पर घोषित लाभांश का भुगतान क्यों नहीं किया है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि जियो प्लेटफार्मस खराब कंपनी है या उसका शेयर खरीदना गलत है। ऐसा निष्कर्ष निकालना गैर जिम्मेदाराना होगा। कंपनियां कई बार मुनाफे को कारोबार के विस्तार में लगाती हैं और ?लाभांश नहीं देतीं। लेकिन सवाल पूछना तो बनता है। अगर कंपनी सार्वजनिक बाजार में उतरकर आम निवेशक से पैसा लेने जा रही है तो निवेशक को यह जानने का पूरा अधिकार है कि कंपनी मुनाफे को किस तरह इस्तेमाल करेगी।




