UGC Act के विरोध में उतरे Kumar Vishwas, Modi-Shah पर फूटा गुस्सा!

जहां UGC एक्ट का मुद्दा पहले ही गर्म था...ये मुद्दा और भी ज्यादा आक्रमक तब हो गया...जब कुमार विश्वास मैदान में उतरे और बहस ने बिल्कुल नया मोड़ ले लिया.....जो विरोध अब तक छात्र, शिक्षक और विपक्ष कर रहे थे.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: कहते हैं कि जब राजा अपनी प्रजा की तकलीफों से आँखें मूंद लेता है…तब कवि की लेखनी तलवार बन जाती है…आज देश के सबसे लोकप्रिय कवि डॉ. कुमार विश्वास ने ठीक वही किया है…

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर उनकी एक पोस्ट ने मानों पूरे देश में विरोध की आग लगा दी है…कुमार विश्वास, जो कभी मोदी सरकार के कई फैसलों के करीब देखे जाते थे…आज उसी सरकार की बखिया उधेड़ने में लगे हैं…तो आखिर क्यों भाजपा के विरोध में उतरे कवि कुमार विश्वास और क्या UGC में क्या हुए हैं बवाल..

देश की सियासत में कभी-कभी ऐसा पल आता है…जब एक पोस्ट, एक कविता या एक बयान सत्ता की नींव तक हिला देता है…इस बार ऐसा ही हुआ है UGC के नए कानून को लेकर….जहां UGC एक्ट का मुद्दा पहले ही गर्म था…ये मुद्दा और भी ज्यादा आक्रमक तब हो गया…जब कुमार विश्वास मैदान में उतरे और बहस ने बिल्कुल नया मोड़ ले लिया…..जो विरोध अब तक छात्र, शिक्षक और विपक्ष कर रहे थे…वही विरोध अब सत्ता के अपने माने जाने वाले चेहरे की ज़ुबान से सामने आ गया…या फिर यूं कहें कि कुमार विश्वास का एक पोस्ट… और उस पोस्ट से सत्ता की बखिया उधड़ गई…तो कवि कुमार विश्वास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी एक तस्वीर पोस्ट की…उसके नीचे जो लिखा…उसने सवर्णों और सामान्य वर्ग के युवाओं के जख्मों पर नमक का काम किया….सबसे पहले आप कुमार विश्वास की ओर से की गई ये पोस्ट देखिए…जिसमें कविता लिखी है कि…चाहे तिल लो या ताड़ लो राजा… राई लो या पहाड़ लो राजा… मैं अभागा ‘सवर्ण’ हूँ मेरा, रौंया-रौंया उखाड़ लो राजा…

ये पंक्तियां महज कविता नहीं हैं…बल्कि उस मध्यमवर्गीय और सवर्ण परिवार की चीख है…जिसे लगता है कि मौजूदा सरकार की नीतियों ने उसे हाशिए पर धकेल दिया है…कुमार ने सीधे राजा शब्द का प्रयोग कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा है….उनके द्वारा इस्तेमाल किया गया हैशटैग #UGC_RollBack अब लाखों युवाओं का नारा बन चुका है….

सबसे पहले तो आप ये जान लीजिए कि…आखिर UGC में ऐसा क्या बदल गया कि कुमार विश्वास को इस कदर जिस भाजपा का वो समर्थन करते थे…उसी के विरोध में उतरना पड़ा?….तो आइए इसे आसान शब्दों में समझते हैं कि सरकार शिक्षा के साथ क्या खेल खेल रही है….तो UGC में किए बदलाव से सरकार ने आरक्षण का नया दांव खेला है…जिसके जरिए सरकार ने UGC के नियमों में ऐसा बदलाव प्रस्तावित किया है…जिससे विश्वविद्यालयों में भर्तियों की प्रक्रिया संदिग्ध हो गई है…आरोप है कि केंद्र सरकार पिछले दरवाज़े से आरक्षण व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ कर रही है…जिससे योग्य उम्मीदवारों, विशेषकर सवर्णों और पिछड़ों के हक मारे जा रहे हैं…

13 जनवरी को UGC ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विनिमय 2026 जारी किया…जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थाओं में समानता को बढ़ाना है…ताकि किसी भी वर्ग के छात्र, छात्राओं के साथ भेदभाव को रोका जा सके…इसका उद्देश्य धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान, विकलांगता के आधार पर छात्र-छात्राओं से भेदभाव ना हो और विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों, विकलांगों और इनमें से किसी भी वर्ग के भी सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव ख़त्म किया जा सके…इसके अलावा उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा दिया जा सके…

इसके मुताबिक़ जाति आधारित भेदभाव का अर्थ अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या समुदाय के आधार पर भेदभाव है…विवाद की मेन वजह जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा में OBC को शामिल करना है…इसके पहले, ड्राफ्ट में जातिगत भेदभाव से सुरक्षा के दायरे में केवल SC और ST को रखा गया था…लेकिन अब इसमें ओबीसी को भी शामिल कर लिया गया है…जिसका कई जगह कुछ लोग विरोध कर रहे हैं…

इस नोटिफ़िकेशन का विरोध करने वालों का तर्क है कि ये सामान्य वर्ग के लोगों के ख़िलाफ़ है…क्योंकि इसमें सामान्य वर्ग के छात्र-छात्राओं के ख़िलाफ़ फ़र्जी आरोप लगाए जा सकते हैं…जो उनके करियर के लिए घातक साबित हो सकते हैं…नोटिफ़िकेशन के मुताबिक़ उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव खत्म करने के लिए एक इक्विटी कमेटी यानीकि समता समिति बनाई जाएगी…जिसमें ओबीसी, विकलांग, अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए…ये समिति भेदभाव की शिकायतों की जांच करेगी…विरोध करने वालों का तर्क ये भी है कि इस समिति में सामान्य वर्ग के लोगों के प्रतिनिधित्व की बात क्यों नहीं कही गई है….उनके मुताबिक इक्विटी कमेटी में सामान्य वर्ग का सदस्य नहीं होने से जांच निष्पक्ष नहीं हो सकेगी…

साथ ही नए नियमों के तहत प्रोफेसरों और शिक्षकों की स्थायी भर्ती के बजाय गेस्ट फैकल्टी और शॉर्ट टर्म कॉन्ट्रैक्ट पर जोर दिया जा रहा है….इसका सीधा मतलब है कि अब शिक्षा के मंदिर में गुरुओं को सम्मानजनक नौकरी नहीं…बल्कि दिहाड़ी मजदूरों की तरह रखा जाएगा…साथ बी महंगी शिक्षा का जाल….यानी UGC के नए Autonomy मॉडल के नाम पर सरकारी कॉलेजों को खुद फंड जुटाने के लिए मजबूर किया जा रहा है…इसका परिणाम ये होगा कि कॉलेज अपनी फीस कई गुना बढ़ा देंगे…अब एक गरीब किसान या सवर्ण मध्यमवर्गीय परिवार का बच्चा बड़े कॉलेज में पढ़ने का सपना नहीं देख पाएगा..

कुमार विश्वास का ये विरोध भाजपा के लिए खतरे की सबसे बड़ी घंटी है…क्योंकि वो अकेले नहीं हैं…भाजपा के भीतर भी अब इस्तीफों की झड़ी लगनी शुरू हो गई है…उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में भाजपा के कई जमीनी कार्यकर्ताओं और छोटे स्तर के नेताओं ने अपना इस्तीफा आलाकमान को भेज दिया है…उनका कहना है कि हम किस मुँह से सवर्ण युवाओं के पास वोट मांगने जाएं?…जब सरकार शिक्षा और रोजगार के दरवाजे बंद कर रही है…तो हम जनता को क्या जवाब देंगे?…..भाजपा के पुराने वफादार नेताओं का मानना है कि मोदी-शाह की जोड़ी अब जमीनी हकीकत से कट चुकी है और केवल चंद नौकरशाहों के इशारे पर फैसले ले रही है….

कुमार विश्वास की एक पोस्ट ने उन लाखों छात्रों को आवाज दे दी है जो अब तक डरे हुए थे…दिल्ली की सड़कों से लेकर पटना और प्रयागराज के छात्र छात्रावासों तक…हर जगह बस एक ही चर्चा है कि…अगर कुमार विश्वास जैसा व्यक्ति साथ खड़ा है…तो हमें पीछे नहीं हटना चाहिए…

वहीं जानकारों का मानना है कि ये गुस्सा जल्द ही एक बड़े देशव्यापी जनांदोलन में बदल सकता है…ये आंदोलन किसान आंदोलन से भी बड़ा हो सकता है…क्योंकि इसमें देश का भविष्य यानी युवा शामिल है….जिस सवर्ण वोट बैंक के दम पर भाजपा सत्ता के शिखर तक पहुं ची थी…आज वही सवर्ण समाज कुमार विश्वास के पीछे खड़ा होकर सरकार से हिसाब मांग रहा है…

सरकार कह रही है कि…इससे शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ेगी….भारतीय यूनिवर्सिटी ग्लोबल रैंकिंग में आगे आएंगी…लेकिन सवाल ये है कि अगर सब कुछ इतना अच्छा है…तो विरोध इतना व्यापक क्यों?…क्या ये आंदोलन बड़ा रूप ले सकता है?….तो राजनीतिक जानकार मानते हैं कि…शिक्षा से जुड़ा आंदोलन जल्दी शांत नहीं होता…छात्र, शिक्षक और बुद्धिजीवी मिल जाएं, तो सरकार पर दबाव बढ़ता है…कुमार विश्वास की एंट्री ने इस आंदोलन को भावनात्मक और वैचारिक ताकत दे दी है…

लेकिन, कहानी अभी खत्म नहीं हुई है…आज विरोध कविता में है, पोस्ट में है, धरने में है…कल ये…सड़कों पर भी आ सकता है…चुनावी मुद्दा बन सकता है…अगर सरकार ने समय रहते संवाद नहीं किया…तो UGC का ये मुद्दा मोदी सरकार के लिए सिरदर्द बन सकता है…आख़िरी में सवाल यही है कि क्या सरकार UGC कानून में बदलाव करेगी?…क्या कुमार विश्वास की आवाज़ सत्ता तक पहुंचेगी?..या फिर ये विरोध एक बड़े जनांदोलन में बदल जाएगा?…फिलहाल इतना तो तय है कि UGC के मुद्दे पर देश उबल रहा है…और कुमार विश्वास की कविता ने इस उबाल को शब्द दे दिए हैं…जिससे भाजपा की मुश्किलें बढ़ गई है…या फिर यूं कहें कि UGC एक्ट को लेकर भाजपा के भीतर जारी इस्तीफों से अब भारतीय जनता पार्टी की उलटी गिनती शुरू हो गई है.

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