संविधान और न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा की जाए: ममता

- मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत से पश्चिम बंगाल की सीएम ने की अपील
- मामलों के अंतिम निर्णय से पहले मीडिया ट्रायल नहीं हो
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
कोलकाता। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत से संविधान, लोकतंत्र और न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा करने की अपील की, साथ ही उन्होंने जांच एजेंसियों के दुरुपयोग के खिलाफ भी चेतावनी दी। बनर्जी ने मुख्य न्यायाधीश से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि नागरिकों को गलत तरीके से निशाना न बनाया जाए। उन्होंने कहा कि कृपया संविधान, लोकतंत्र, न्यायपालिका, इतिहास और भूगोल के साथ-साथ देश की सीमाओं को भी आपदा से बचाएं। मुख्य न्यायाधीश को संविधान का संरक्षक बताते हुए बनर्जी ने कहा कि न्यायपालिका को पूर्वाग्रह से मुक्त रहना चाहिए।
तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने मीडिया ट्रायल का मुद्दा भी उठाया और तर्क दिया कि अदालतों द्वारा फैसला सुनाए जाने से पहले ही मामलों पर सार्वजनिक रूप से बहस होने लगी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि मामलों के अंतिम निर्णय से पहले मीडिया ट्रायल नहीं होना चाहिए। यह लोगों को बदनाम करने का एक जरिया बन गया है। कृपया सुनिश्चित करें कि एजेंसियां जानबूझकर नागरिकों को बदनाम करने का प्रयास न करें। मैं अपनी ओर से नहीं बोल रहा हूं। मैं यह लोकतंत्र, जनता, न्यायपालिका और संविधान को बचाने के लिए कह रहा हूं। हम आपकी देखरेख में हैं। आपसे ऊपर कोई नहीं है। मुख्यमंत्री की यह टिप्पणी बंगाल में प्रवर्तन निदेशालय और तृणमूल कांग्रेस सरकार के बीच बढ़ते गतिरोध के बीच आई है, जो संघीय एजेंसी द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग जांच के सिलसिले में तृणमूल की राजनीतिक परामर्श फर्म आई-पीएसी सहित 10 स्थानों पर छापेमारी के बाद शुरू हुआ था। बनर्जी ने विधि समुदाय की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कनिष्ठ वकील संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें उनके उचित लाभ नहीं मिल रहे हैं। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश से पेशे में प्रवेश करने वाली नई पीढ़ी का विशेष ध्यान रखने का आग्रह किया।
विवेक ज्ञान से भिन्न होता है : सीजेआई सूर्यकांत
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि विवेक ज्ञान से भिन्न होता है और उनका मानना है कि विवेक का आशय इस बात को जानने से है कि कानून के अक्षरश: पालन पर कब जोर देना है और कब उस उद्देश्य को समझना है जिसकी पूर्ति के लिए वह कानून बनाया गया है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि ज्ञान पुस्तकों, संभवत:कक्षा और प्रशिक्षण से शीघ्रता से प्राप्त किया जा सकता है लेकिन उसके बाद जो कुछ भी होता है वह अनुभव, त्रुटि और निरंतर चिंतन के माध्यम से कहीं अधिक धीरे-धीरे, अक्सर अपूर्ण रूप से आकार लेता है। प्रधान न्यायाधीश इस विवि के कुलाधिपति भी हैं। न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा, विवेक का अर्थ यह जानना है कि कब बोलना है और कब मौन रहना अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने चार साल के अंतराल के बाद आयोजित दीक्षांत समारोह में कहा, यह जानना जरूरी है कि कानून के अक्षरश: पालन पर कब जोर दिया जाए और इसके पीछे के उद्देश्य को समझा जाए। प्रधान न्यायाधीश ने कहा, हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहां तुरंत राय बन जाती है और बिना इंतजार किए प्रतिक्रिया की उम्मीद की जाती है। उन्होंने कहा कि ऐसी दुनिया में विवेकशीलता दुर्लभ हो गई है और इसलिए यह ‘अत्यंत मूल्यवान’ है।



