मीरजापुर: करोड़ों के पौधे राख! ड्रमंडगंज जंगल में फिर लगी भीषण आग
मीरजापुर के ड्रमंडगंज वन रेंज में तीन दिनों से जंगल धधक रहा है। 15 हेक्टेयर क्षेत्र में लगी भीषण आग से पौधरोपण राख हो गया। ग्रामीणों ने वन विभाग पर लापरवाही का आरोप लगाया है। लगातार दूसरी आग की घटना से जंगल और वन्य जीवों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: मीरजापुर के जंगल एक बार फिर आग की लपटों में घिर गए हैं। गर्म हवाओं के बीच धुएं से ढकी पहाड़ियां और राख में बदलते पेड़ अब इलाके के लोगों के लिए डर और चिंता का कारण बन चुके हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हर साल करोड़ों रुपये खर्च कर लगाए जाने वाले पौधे और जंगल इतनी आसानी से आग के हवाले क्यों हो जाते हैं? और जब जंगल लगातार तीन दिनों तक जलता रहे, तब जिम्मेदार महकमा आखिर करता क्या है?
यूपी-मध्य प्रदेश सीमा से सटे ड्रमंडगंज वन रेंज के मूर्तिहवा जंगल में लगी आग बुधवार को तीसरे दिन भी जारी रही। ग्रामीणों का आरोप है कि आग सोमवार दोपहर से लगी हुई है, लेकिन अब तक उस पर पूरी तरह काबू नहीं पाया जा सका। दूर-दूर तक उठता धुआं और जल चुके पौधों के अवशेष इस बात की गवाही दे रहे हैं कि आग ने बड़े इलाके को अपनी चपेट में ले लिया है।
15 हेक्टेयर जंगल में लगी आग, पौधरोपण हुआ तबाह
जानकारी के मुताबिक ड्रमंडगंज वन रेंज के कंपार्टमेंट-8 के पैच नंबर-1 स्थित बबुरारघुनाथ सिंह के मूर्तिहवा जंगल में आग लगी है। ग्रामीणों और स्थानीय सूत्रों का दावा है कि करीब 15 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है। इस इलाके में बड़े स्तर पर पौधरोपण किया गया था, लेकिन आग ने अधिकांश पौधों को जलाकर राख कर दिया। स्थानीय लोगों का कहना है कि बुधवार सुबह तक भी जंगल में कई जगहों पर आग की लपटें दिखाई दे रही थीं। कई हिस्सों से लगातार धुआं उठता रहा, जिससे आसपास के गांवों में भी चिंता का माहौल बना हुआ है।
“तीन दिन से जल रहा जंगल, लेकिन जिम्मेदार गायब”
ग्रामीणों में सबसे ज्यादा नाराजगी वन विभाग की कार्यशैली को लेकर है। लोगों का आरोप है कि आग लगने के बाद संबंधित अधिकारी और रेंजर मौके पर समय से नहीं पहुंचे। कुछ वनकर्मियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि आग ने बड़े हिस्से को नुकसान पहुंचाया है, लेकिन निगरानी और त्वरित कार्रवाई का अभाव साफ दिखाई दे रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि शुरुआती घंटों में प्रभावी तरीके से आग बुझाने की कोशिश होती, तो नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता था। लेकिन तीन दिनों तक जंगल का धधकते रहना विभागीय लापरवाही की ओर इशारा करता है।
एक हफ्ते में दूसरी बड़ी आग की घटना
चौंकाने वाली बात यह है कि ड्रमंडगंज वन रेंज में यह एक सप्ताह के भीतर दूसरी बड़ी आग की घटना है। इससे पहले करनपुर, मड़वा और धनावल के जंगलों में आग लगी थी, जो लगातार तीन दिनों तक जलती रही। उस आग पर भी काफी मशक्कत के बाद काबू पाया जा सका था। अब पांच दिन बाद ही फिर से जंगल में आग लगने की घटना सामने आने से वन विभाग की तैयारियों और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े होने लगे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि हर साल गर्मियों में जंगलों में आग लगती है, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए जाते।
वन्य जीवों और पर्यावरण पर भी बड़ा खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार जंगल में लगने वाली आग सिर्फ पेड़ों और पौधों को ही नुकसान नहीं पहुंचाती, बल्कि इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है। आग की वजह से छोटे वन्य जीव, पक्षी और कई दुर्लभ प्रजातियां प्रभावित होती हैं। इसके अलावा जंगलों का तापमान बढ़ने और हरित क्षेत्र कम होने का असर आसपास के पर्यावरण पर भी पड़ता है। ड्रमंडगंज क्षेत्र का जंगल वन्य जीवों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में लगातार आग लगने की घटनाएं पर्यावरण संरक्षण के दावों पर भी सवाल खड़े कर रही हैं।
हर साल करोड़ों खर्च, फिर भी नहीं रुक रहीं घटनाएं
वन विभाग हर साल पौधरोपण और जंगलों की सुरक्षा के नाम पर बड़े बजट का इस्तेमाल करता है। लेकिन लगातार सामने आ रही आग की घटनाएं यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि आखिर जमीनी स्तर पर सुरक्षा इंतजाम कितने प्रभावी हैं। आमतौर पर आग लगने के बाद अधिकारी यह कहकर जिम्मेदारी से बचते नजर आते हैं कि किसी ने बीड़ी या सिगरेट फेंक दी होगी, जिससे आग फैल गई। कई बार आसपास के ग्रामीणों पर भी लापरवाही का आरोप लगाया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि यदि हर साल ऐसी घटनाएं दोहराई जा रही हैं, तो रोकथाम के लिए स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं बन पा रही?
जवाबदेही तय करने की जरूरत
स्थानीय लोगों का मानना है कि जंगलों में बार-बार लग रही आग को सिर्फ “दुर्घटना” कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जरूरत इस बात की है कि आग लगने के कारणों की निष्पक्ष जांच हो, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए और जंगलों की निगरानी व्यवस्था को मजबूत बनाया जाए। क्योंकि अगर हर साल करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद जंगल राख में बदलते रहेंगे, तो पर्यावरण संरक्षण के दावे सिर्फ फाइलों तक सीमित होकर रह जाएंगे।
रिपोर्ट – संतोष देव गिरी
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