एनडीए सरकार अब यूपीआई से काटेगी आमजन की जेब!
यूपीआई से लेनदेन पर भी लगा दिया टैक्स

- नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सरकार पर उठाए सवाल
- अंग्रेज़ों की फ्री वाली चाय के इको सिस्टम को फालो करता यूपीआई
- यूपीआई के कुल ट्रांजेक्शन वैल्यू का 65 परसेंट इन्हीं 2 हजार रु पये वालों से आता है
- यूपीआई की फ्री क्रांति से एमडीआर तक का सफर सिर्फ 4PM पर
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। अंग्रेज जब भारत में चाय का बाजार खड़ा कर रहे थे तो उन्होंने सिर्फ चाय नहीं बेची पहले चाय पीने की आदत बेची। मुफ्त में चाय पिलायी गई जगह जगह चाय का स्वाद पहुंचाया गया और धीरे धीरे वह चाय जो कभी भी भारतीयों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा नहीं थी जरूरत बनती चली गयी। फिर बाजार तैयार हुआ और उस आदत के इर्द गिर्द पूरा कारोबार खड़ा हो गया।
अब एमडीआर के बाद यूपीआई की कहानी को भी जनता उसी अंग्रेजों द्वारा बनाये गये आर्थिक नजरिए से देख रही है। पहले सुविधा दी गयी स्कैन करो पैसा भेजो कोई चार्ज नहीं। चाय की उस पहली मुफ्त प्याली की तरह यूपीआई ने भी लोगों को एक नई आदत से परिचित कराया। धीरे धीरे यह सिर्फ एक डिजिटल सुविधा नहीं रही बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी की जरूरत बन गई। सब्जी वाला हो या बड़ा शोरूम रिक्शा हो या रेस्टोरेंट एक सवाल लगभग हर जगह पहुंच गया यूपीआई है।
कैश से ज्यादा मोबाइल नेटवर्क अहम हो गया
नकदी जेब में है या नहीं इससे पहले मोबाइल में नेटवर्क है या नहीं यह ज्यादा अहम हो गया। छुट्टे पैसे का झंझट खत्म हुआ कार्ड मशीन की जरूरत कम हुई और क्यूआर कोड देश की नयी डिजिटल दुकानदारी का बोर्ड बन गया। यानी पहले लोगों को सुविधा का स्वाद मिला फिर सुविधा आदत बनी और अब उस आदत के चारों तरफ एक विशाल इकोसिस्टम के खड़े होने की शुरूआत हो रही है और शुरू हो रही है एमडीआर की कहानी। सरकार एमडीआर को टैक्स नहीं बल्कि मर्चेंट डिस्काउंट रेट कहती है। ग्राहक से सीधे शुल्क नहीं लिया जा रहा लेकिन बड़े मर्चेट ट्रांजेक्शन के लिए पेमेंट इकोसिस्टम में लागत और रेवेन्यू का नया मॉडल सामने आया है। यानी मुफ्त की चाय की तरह यहां भी सवाल सिर्फ उस व्यक्ति का नहीं है जिसने पहली प्याली पी थी सवाल उस पूरे बाजार का है जो आदत पड़ जाने के बाद उसके इर्द गिर्द खड़ा हो रहा है। यूपीआई की सफलता भी यही है कि उसने पहले बाजार को मजबूर नहीं किया बाजार को अपनी तरफ खींच लिया। मुफ्त आसान और तेज भुगतान ने करोड़ों लोगों और कारोबारियों को उस व्यवस्था का हिस्सा बना दिया। अब जब डिजिटल पेमेंट देश की अर्थव्यवस्था की नसों में दौडऩे लगे हैं तो इंफ्रास्ट्रक्चर, बैंक, पेमेंट, कंपनी और बाकी इकोसिस्टम के खर्च तथा कमाई का सवाल भी खड़ा हो गया है और यही से जनता के सवाल भी उठना शुरू हो गये।
जीरो एमडीआर से अमेरिकियों को तकलीफ थी मोदी सरकार ने फिर घुटने टेक दिए : राहुल
राहुल गांधी ने सरकार पर सिर्फ शुल्क लगाने का आरोप नहीं लगाया बल्कि इसके पीछे अमेरिकी दबाव की पूरी कहानी जोड़ दी है। राहुल गांधी का आरोप है कि अमेरिकन कंपनियां लंबे समय से भारत की जीरो एमडीआर व्यवस्था का विरोध कर रही थीं। अब 2,000 रूपये से ऊपर के मर्चेंट यूपीआई ट्रांजेक्शन पर एमडीआर का रास्ता खुलना उन्हें उसी दबाव का नतीजा नजर आ रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अमेरिका के सामने एक बार फिर झुकने का आरोप लगाते हुए इसे हालिया यूएस ट्रेड डील से जोड़ दिया। राहुल के निशाने पर सिर्फ यूपीआई नहीं है। उन्होंने सरकार से पूछा है कि जब भारत में यूपीआई बिना एमडीआर के इतना बड़ा डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम खड़ा कर सकता था तो अब अचानक इसकी कीमत तय करने की जरूरत क्यों पड़ी?
आज मेर्चेंट से कल आम जनता से
अभी कहानी सिर्फ 2,000 से ऊपर के चुनिंदा मर्चेंट ट्रांजेक्शन की है। सरकार ने साफ किया है कि व्यक्ति से व्यक्ति यानी पीटूपी भुगतान किसी भी रकम का हो मुफ्त रहेगा। सरकार के बदले रवैये से सवाल उठना शुरू हो गये हैं कि आज 2,000 रूपये की सीमा तय हुई है कल यह सीमा बदलेगी नहीं इसकी गारंटी क्या है? आज बड़े मर्चेंट ट्रांजेक्शन पर 0.4 फीसदी एमडीआर है कल अगर पेमेंट इकोसिस्टम की लागत बढ़ी रेवेन्यू की जरूरत बढ़ी या यूपीआई के संचालन का मॉडल बदला तो क्या एमडीआर का दायरा और ट्रांजेक्शन कैटेगरीज बढ़ सकती हैं? यही वह सवाल है जिसने बहस को जन्म दिया है। क्योंकि फीस की शुरुआत हमेशा एक छोटी खिड़की से होती है फिर वही खिड़की कितनी बड़ी होगी असली सवाल यह होता है।
किसी को फ्री, किसी से पैसे?
भारतपे के एक्स को-फाउंडर अशनीर ग्रोवर ने यूपीआई पर लगने वाले एमडीआर को लेकर सवाल उठाते हुये सरकार से पूछा है कि कि अगर कोई व्यक्ति अपने दोस्त को यूपीआई से एक लाख रुपये भेजता है तो कोई शुल्क नहीं लेकिन वही व्यक्ति क्यूआर कोड स्कैन करके किसी दुकानदार को 2,500 या 3,000 रूपये देता है तो उस पर शुल्क क्यों। अशनीर के मुताबिक दोनों ही मामलों में डिजिटल सिस्टम तो वही है फिर लागत का यह फर्क किस तर्क पर है। अशनीर का तर्क है कि यूपीआई के पीछे इंफ्रास्ट्रक्चर चलाने की लागत सिर्फ इसलिए अलग नहीं हो जाती कि पैसा किसी दोस्त के खाते में जा रहा है या किसी दुकानदार के क्यूआर कोड पर। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर डिजिटल ट्रांजेक्शन का मूल इंफ्रास्ट्रक्चर वही है तो फिर मर्चेंट पेमेंट को अलग करके शुल्क लगाने का औचित्य क्या है? अशनीर ने सरकार और सिस्टम से यह भी पूछा है कि अगर यूपीआई इंफ्रास्ट्रक्चर को चलाने में इतना खर्च हो रहा है तो उस खर्च का हिसाब भी तो सामने आना चाहिए। उनका कहना है कि सरकार अक्सर खर्च और लागत की बात करती है लेकिन यह भी बताया जाना चाहिए कि पैसा कहां खर्च हो रहा है और उसकी वास्तविक लागत कितनी है।




