अमेरिका को ईरान युद्ध में नया झटका, F-15 के बाद एक और प्लेन क्रैश

ट्रंप साहब पिछले एक हफ्ते से कह रहे थे कि— "ईरान अब हमला करने लायक नहीं बचा।" लेकिन आज अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की जो रिपोर्ट लीक हुई है, उसने ट्रंप के दावों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति होने का दम भरने वाला अमेरिका, खाड़ी के दलदल में बुरी तरह धंस चुका है। कल तक जो डोनाल्ड ट्रंप और उनके रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ सीना ठोककर दुनिया को बता रहे थे कि उन्होंने ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता को 90 परसेंट तक जमींदोज़ कर दिया है, आज उनकी अपनी ही जासूसी एजेंसियों ने उनके मुँह पर कालिख पोत दी है।

अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट्स में चेतावनी दी गई है कि ईरान जल्द होर्मुज को खोलने वाला नहीं है, क्योंकि यही अब उसका सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स ने तीन अहम सूत्रों के हवाले से तैयार इन रिपोर्ट्स में साफ़ कहा है कि दुनिया के सबसे अहम तेल मार्ग पर पकड़ बनाकर ईरान, अमेरिका पर भारी दबाव बना रहा है। साथ ही कूटनीति के मोर्चे पर भी ट्रंप को वो ज़ख्म मिला है जो शायद ही कभी भरे। पाकिस्तान में ईरानी अधिकारियों ने अमेरिकी अफसरों से मिलने तक से इनकार कर दिया है। क्या ट्रंप का ‘अजेय’ होने का भ्रम टूट चुका है? क्या नेतन्याहू की ज़िद ने अमेरिका के ‘सुपरपावर’ वाले ढोल को पूरी तरह से फाड़ दिया है?

राजनीति में झूठ बोलना आम बात हो सकती है, लेकिन जंग के मैदान में झूठ बोलना आत्मघाती होता है। ट्रंप साहब पिछले एक हफ्ते से कह रहे थे कि— “ईरान अब हमला करने लायक नहीं बचा।” लेकिन आज अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की जो रिपोर्ट लीक हुई है, उसने ट्रंप के दावों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, लगातार हवाई हमलों, बी-2 बॉम्बर्स की गूंज और बंकर-बस्टर बमों के इस्तेमाल के बावजूद, ईरान के 50 प्रतिशत मिसाइल लॉन्चर आज भी पूरी तरह सुरक्षित और क्रियाशील (Functional) हैं।

यही नहीं, ईरान के पास मौजूद हज़ारों ‘कामिकाज़े ड्रोन्स’ का आधा बेड़ा आज भी हमले के लिए तैयार खड़ा है। आखिर ऐसा कैसे हुआ? हकीकत यह है कि ईरान ने अपने हथियारों को पहाड़ों के नीचे बने उन ‘मिसाइल शहरों’ में छिपा रखा है, जहाँ अमेरिका की सबसे आधुनिक टेक्नोलॉजी भी नाकाम साबित हुई है। ट्रंप साहब, आप जिस 90 प्रतिशत तबाही का दावा कर रहे थे, वो महज़ एक ‘कागज़ी जीत’ थी। हकीकत यह है कि ईरान ने अपने मिसाइल ठिकानों को फिर से सक्रिय (Reactivate) करना शुरू कर दिया है। यानी जिस मलबे को आप जीत समझ रहे थे, वहां से फिर से मिसाइलें निकलने लगी हैं।

रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि अमेरिकी और इज़राइली हमलों के बावजूद ईरान अपने मिसाइल ठिकानों को तेज़ी से दोबारा चालू कर रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स के हवाले से आई अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरानी कर्मी मलबे से भूमिगत मिसाइल बंकर निकालकर कुछ ही घंटों में उन्हें फिर से इस्तेमाल के लिए तैयार कर रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अमेरिका यह पक्के तौर पर नहीं बता पा रहा कि कितने मिसाइल लॉन्चर नष्ट हुए हैं, क्योंकि ईरान ने भ्रम पैदा करने के लिए नकली (Decoy) उपकरण भी तैनात किए हुए हैं, जिन्हें नष्ट करके अमेरिकी और इज़राइली सेना अपनी ‘फर्जी’ जीत का जश्न मना रही है।

वहीं दूसरी ओर, होर्मुज को लेकर भी अमेरिका बुरी तरह फंसा है। रिपोर्ट के मुताबिक, तेहरान इस रास्ते को पूरी तरह बंद नहीं कर रहा, बल्कि इसे ‘थ्रॉटल’ कर रहा है, यानी ज़रूरत के हिसाब से ट्रैफिक को रोक या चालू कर रहा है, ताकि तेल की कीमतें ऊँची बनी रहें और अमेरिका पर दबाव बढ़ता रहे।

ईरान ने अब नाटो देशों के जहाज़ों को छोड़ना शुरू कर दिया है। खबर है कि फ्रांस के साथ शायद ईरान की अंदरखाने कोई डील हो गई है, क्योंकि फ्रांस के कई जहाज़ होर्मुज से बाहर निकलते देखे गए हैं और दूसरी ओर फ्रांस अब यूएन (UN) में ईरान के साथ खड़ा हो गया है। अमेरिकी इंटेलिजेंस की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान ने होर्मुज के लिए ‘दोस्तों और दुश्मनों’ की एक लिस्ट बनाई है और उसी हिसाब से वह जहाज़ों को गुज़रने दे रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार दावा कर रहे हैं कि होर्मुज को खोलना मुश्किल नहीं है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा— “थोड़ा समय और मिले तो हम आसानी से होर्मुज खोल सकते हैं, तेल ले सकते हैं और बड़ा फायदा कमा सकते हैं।” लेकिन रक्षा विशेषज्ञ इस दावे से इत्तेफाक नहीं रखते। इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के ईरान प्रोजेक्ट डायरेक्टर अली वैज ने कहा— “अमेरिका ने ईरान को मास डिस्ट्रक्शन (WMD) के हथियार रोकने की कोशिश में मास डिसरप्शन (सामूहिक व्यवधान) का हथियार दे दिया है।” उन्होंने साफ़ किया कि होर्मुज पर नियंत्रण ईरान के लिए परमाणु हथियार से भी ज़्यादा ताकतवर साबित हो रहा है।

वहीं दूसरी ओर बड़ी खबर यह है कि ईरान ने ‘सुलह-समझौते’ के खेल से पूरी तरह से किनारा कर लिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान में अमेरिकी और ईरानी अधिकारियों के बीच एक ‘बैक-चैनल’ मीटिंग तय की गई थी। ट्रंप चाहते थे कि पर्दे के पीछे से ईरान को डरा-धमकाकर समझौते की मेज़ पर लाया जाए। लेकिन ईरान के राष्ट्रपति पजशकियान और उनके सिपहसालारों ने वो कर दिया जिसकी उम्मीद व्हाइट हाउस को नहीं थी।

ईरानी अधिकारियों ने अमेरिकी डेलिगेशन से मिलने तक से साफ़ इनकार कर दिया। उन्होंने संदेश भिजवाया कि— “हम उन लोगों से बात नहीं करते जो एक हाथ में बम और दूसरे हाथ में समझौते का कागज़ लेकर आते हैं।” यह ट्रंप की ‘ईगो’ पर सबसे करारा तमाचा है। पाकिस्तान, जो इस पूरे मामले में एक पुल का काम करना चाहता था, वह भी इस वक्त अमेरिका की नाकामी पर हैरान है। ट्रंप साहब, दुनिया बदल चुकी है। अब आपकी धौंस और धमकी का सिक्का नहीं चलता। ईरान ने साफ़ कर दिया है कि जब तक ज़मीनी हकीकत पर सीज़फायर नहीं होता, अमेरिका के लिए बातचीत का रास्ता बंद रहेगा।

ट्रंप और नेतन्याहू की जोड़ी ने इस जंग को जिस मोड़ पर पहुँचा दिया है, वहां से पूरी दुनिया के लिए तबाही का रास्ता शुरू होता है। ईरान ने अब होर्मुज के साथ-साथ बाब अल-मंदेब पर भी अपना शिकंजा कसने की धमकी दे दी है। ईरानी संसद के स्पीकर ने आज साफ़ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका ने खाड़ी में अपनी गुंडागर्दी बंद नहीं की, तो ईरान दुनिया के इन दो सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों को ‘नो-गो ज़ोन’ बना देगा।

ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाक़ेर ग़ालिबाफ़ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर सवाल उठाया कि— “बाब अल-मंदेब स्ट्रेट से दुनिया के कितने तेल, एलएनजी, गेहूं और खाद की सप्लाई गुज़रती है और किन कंपनियों का इसमें सबसे ज़्यादा हिस्सा है?” इसे व्यापारिक जहाज़ों के लिए एक खुली चेतावनी माना जा रहा है। हालांकि, बाब अल-मंदेब वैश्विक व्यापार के लिए होर्मुज जितना विशाल नहीं है, फिर भी यह समुद्री व्यापार का एक बेहद अहम रास्ता है। यह स्ट्रेट यमन के पास स्थित है और यहाँ से करीब 14 प्रतिशत वैश्विक व्यापार और लगभग 5 प्रतिशत दुनिया का तेल गुज़रता है।

अगर होर्मुज से तेल के टैंकर रुक गए और बाब अल-मंदेब से व्यापारिक जहाज़ बंद हो गए, तो क्या होगा? पेट्रोल की कीमतें 500 रुपये लीटर पार कर जाएंगी, महामंदी दस्तक देगी और करोड़ों लोग बेरोज़गार हो जाएंगे। नेतन्याहू अपने भ्रष्टाचार के केस दबाने के लिए और ट्रंप अपनी गिरती लोकप्रियता को बचाने के लिए पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को ‘पाषाण युग’ (Stone Age) में ले जाने पर तुले हैं। लेकिन इंटेलिजेंस रिपोर्ट कहती है कि होर्मुज पर आज भी ईरान का ‘डेथ ग्रिप’ कायम है।

अमेरिका वहां अपनी ताकत दिखाने में पूरी तरह नाकाम रहा है। जंग के मोर्चे से अमेरिका के लिए एक और बुरी खबर आई है— कल ही हमने आपको बताया था कि ईरान ने एक एफ-35 के परखच्चे उड़ा दिए थे, और आज खबर आई है कि एफ-15 के बाद अमेरिका का एक और आधुनिक जंगी जहाज़ A-10 ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम का शिकार होकर मलबे में तब्दील हो गया है।

पेंटागन इस खबर को ‘तकनीकी खराबी’ बताकर दबाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन ईरानी न्यूज़ एजेंसियों ने मलबे की तस्वीरें जारी कर दी हैं। यह महज़ विमानों का गिरना नहीं है, यह अमेरिका की मिलिट्री सुपरमैसी (सैन्य सर्वोच्चता) का गिरना है। अरबों डॉलर के ये विमान ईरान के उन स्वदेशी डिफेंस सिस्टमों के सामने कबाड़ साबित हो रहे हैं, जिन्हें ट्रंप साहब पुराना बता रहे थे। एफ-15 के बाद इस नए क्रैश ने साबित कर दिया है कि ईरान के आसमान में अमेरिका के लिए कोई ‘सेफ ज़ोन’ नहीं बचा है।

ऐसे में साफ़ है कि ट्रंप हों या नेतन्याहू, दोनों जंग में बुरी तरह फंस गए हैं। नेतन्याहू ने ‘ग्रेटर इज़राइल’ का जो ख्वाब दिखाया था, वो अब इज़राइल के अस्तित्व के लिए ही खतरा बन गया है। और ट्रंप, जो खुद को बहुत बड़ा ‘डील मेकर’ कहते थे, आज एक ‘वॉर मोंगर’ (युद्ध प्रेमी) बनकर रह गए हैं। इंटेलिजेंस कह रही है कि ईरान हारा नहीं है, बल्कि वो और ज़्यादा घातक होकर उभर रहा है। अब सवाल यह है कि क्या अमेरिका की जनता अपने इस फेलियर राष्ट्रपति को बर्दाश्त करेगी? क्या पुतिन और शी जिनपिंग की खामोशी ट्रंप के लिए किसी बड़े तूफान का संकेत है?

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