अब… एक्जिट पोल के सहारे नैरेटिव की जंग

- सैंपल, साइंस और सच्चाई सर्वे के तीनों टूल पर उठते सवाल
- ज्यादातर पोल एक तरफा लेकिन मुकाबले में ममता बनर्जी की मजबूत मौजूदगी
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में एक बार फिर एक्जिट पोल के सहारे ऐसे नैरेटिव को सेट करने की कोशिश की जा रही है जो संदेह के घेरे में हैं। नतीजे आए भी नहीं हैं और जीत हार का ऐलान टीवी पर हो चुका है। सवाल सीधा है यह एक्जिट पोल हैं या दिमाग में रिजल्ट फिक्स करने की कोशिश, जी हां एक्जिट पोल का शोर पूरे देश में गूंज रहा है। हर चैनल हर स्क्रीन किसकी सरकार? कौन जीतेगा? कौन हारेगा? के नारे लगाने में व्यस्त है। लेकिन आज हम सवाल पूछेंगे कि टीवी स्क्रीन पर जो आंकड़े दिखाये जा रहे हैं यह सच हैं या फिर सिर्फ एक कहानी जो आपको दिखाई जा रही है? पश्चिम बंगाल के एक्जिट पोल्स को अगर ध्यान से देखा जाए तो तस्वीर उतनी सीधी नहीं है जितनी आपको परोसी जा रही है। कई सर्वे भले ही एक दिशा में इशारा कर रहे हों लेकिन लगभग हर पोल में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी को सीधी टक्कर देते हुए दिखाया गया है। अब बड़ा सवाल यही है कि एक्जिट पोल बनते कैसे हैं? कितने लोगों से इन पोल में बात की गई होती है? और किस इलाके से डाटा लिया गया होता है? सवाल यह भी है कि सर्वेअर ने जिन लोगों से सवाल पूछे हैं तो वोटर ने क्या उन्हें सही जवाब दिया है? इसके अतिरिक्त सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि अगर सर्वे इतने सटीक हैं तो पिछले चुनावों में बार बार गलत कैसे साबित हुए? आप यकीन जानिये यह सिर्फ डाटा नहीं है यह एक नैरेटिव वार है। चुनाव खत्म होते ही टीआरपी की रेस शुरू हो जाती है। विज्ञापन, बहस, ग्राफिक्स सब मिलकर एक माहौल बनाते हैं। और इसी माहौल में एक कहानी गढ़ी जाती है जो जरूरी नहीं कि पूरी सच्चाई हो। एक्जिट पोल की साइंस लंबे समय से कटघरे में है। पिछले कई चुनावों में ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहां ये अनुमान जमीन से पूरी तरह कटे हुए निकले। फिर भी हर चुनाव के बाद इन्हें उसी आत्मविश्वास के साथ परोसा जाता है जैसे यह अंतिम सच हो। और फिर आता है सबसे बड़ा पहलू मार्केट का। चुनाव के बाद का यह दौर टीआरपी विज्ञापन और दर्शकों की दिलचस्पी का चरम होता है। एक्जिट पोल सिर्फ डाटा नहीं रहते वह शो बन जाते हैं जहां आंकड़ों से ज्यादा असर प्रस्तुति का होता है।
बंगाल में आमने-सामने का चुनाव
दूसरा बड़ा कारण है चुनावी प्रतिस्पर्धा का बढऩा। जब मुकाबला कड़ा होता है तो दोनों पक्ष अपने समर्थकों को बूथ तक लाने में पूरी ताकत झोंकते हैं। इससे कुल मतदान प्रतिशत बढ़ता है लेकिन यह जरूरी नहीं कि इसका फायदा सिर्फ विपक्ष को ही मिले। कई बार सत्तारूढ़ दल की संगठनात्मक क्षमता और बेहतर मैनेजमेंट उसे इस बढ़े हुए मतदान का लाभ दिला देते हैं। महिला मतदाताओं और युवा वर्ग की बढ़ती भागीदारी भी इस बदलाव का अहम हिस्सा है। सरकारी योजनाओं सामाजिक सुरक्षा और विकास से जुड़े मुद्दों ने एक बड़े वर्ग को सक्रिय रूप से वोटिंग में शामिल किया है। यह मतदाता केवल असंतोष के आधार पर नहीं बल्कि अपने अनुभव और अपेक्षाओं के आधार पर वोट करते हैं। इसलिए उनका वोट कभी सत्ता विरोध में नहीं जाता। इसके अलावा चुनाव अब सिर्फ स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रह गए हैं। राष्ट्रीय नैरेटिव नेतृत्व की छवि और कल्याणकारी योजनाओं का असर भी मतदान पर पड़ता है। ऐसे में ज्यादा मतदान का अर्थ कई स्तरों पर बंट जाता है कहीं बदलाव की चाह कहीं स्थिरता की उम्मीद और कहीं राजनीतिक पहचान की अभिव्यक्ति। इसलिए आज के दौर में यह कहना कि ज्यादा मतदान सरकार के खिलाफ लहर एक अधूरा और कई बार भ्रामक निष्कर्ष हो सकता है। सच्चाई यह है कि ज्यादा मतदान अब एक संकेत है लेकिन दिशा नहीं बताता। दिशा तय होती है मतदाता के मन से जो हर चुनाव में नया गणित लिखता है।
बदलते चुनावी व्यवहार की नई कहानी
काफी समय से एक धारणा सी चली आ रही है कि अगर मतदान प्रतिशत ज्यादा है तो जनता सत्ता के खिलाफ है और बदलाव चाहती है। लेकिन हाल के वर्षों में यह थ्योरी कई बार टूटती दिखाई दी है। अब अधिक मतदान को सिर्फ एंटी-इंकम्बेंसी यानी सत्ता विरोध के चश्मे से देखना वास्तविकता को अधूरा समझना होगा। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि वोटिंग का बढऩा अपने आप में लोकतंत्र की सेहत का संकेत है लेकिन उसके पीछे का कारण हर बार एक जैसा नहीं होता। कई बार ज्यादा मतदान इसलिए भी होता है क्योंकि सरकार के समर्थक बड़ी संख्या में बाहर निकलते हैं ताकि सत्ता को बरकरार रखा जा सके। यानी उच्च मतदान अब सिर्फ गुस्से का नहीं बल्कि समर्थन का भी संकेत माना जाता है। पिछले कुछ चुनावों ने यह ट्रेंड साफ किया है। कि ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहां भारी मतदान के बावजूद मौजूदा सरकार को दोबारा जनादेश मिला। इसका मतलब यह है कि मतदाता अब ज्यादा सक्रिय हो गया है वह सिर्फ विरोध में नहीं बल्कि समर्थन में भी उतनी ही मजबूती से वोट डाल रहा है।




