अब BJP नहीं, नीतीश के सहारे खड़ी है सत्ता? बिहार की राजनीति में बदला खेल

आखिर नीतीश कुमार विदाई से पहले इतने एक्शन में क्यों हैं? क्या वे खुद को मुख्यमंत्री बनाए रखने का नया बहाना तलाश रहे हैं,

4पीएम न्यूज नेटवर्क: राजनीति में हमेशा ‘पलटी’ मारने के लिए बदनाम नीतीश कुमार ने एक बार फिर बिहार की पॉलिटिक्स में टॉप गियर लगा कर सभी को चौंका दिया है ।

जिसे देखकर न सिर्फ आम जनता हलकान है, बल्कि बिहार की राजनीति की गोटियाँ सेट करने वाले बीजेपी के ‘चाणक्य’ की भी सिट्टी-पिट्टी गुम है। क्योंकि अमित शाह ने पिछले दिनों जिस सीमांचल का दौरा करके घुसपैठियों के नाम पर बड़ा ऐलान किया था,

अब नीतीश उसी इलाके में पहुँचकर अपना ‘फॉर्म’ दिखा रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि आखिर नीतीश कुमार विदाई से पहले इतने एक्शन में क्यों हैं? क्या वे खुद को मुख्यमंत्री बनाए रखने का नया बहाना तलाश रहे हैं, या फिर अपने बेटे निशांत कुमार के लिए ताजपोशी का रास्ता साफ कर रहे हैं?

2020 में जब नीतीश के पास सिर्फ 43 सीटें थीं, तब बीजेपी उन्हें ‘छोटा भाई’ समझकर दबाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन आज कहानी बदल चुकी है। जेडीयू के पास 85 सीटें हैं और बीजेपी के पास उनसे सिर्फ 4 ज्यादा हैं। नीतीश कुमार जानते हैं कि अब वे बीजेपी की बैसाखी नहीं, बल्कि बीजेपी उनकी बैसाखी पर टिकी है। अमित शाह ने दिल्ली में बैठकर जो गणित लगाया था, नीतीश उसे पटना की सड़कों पर फेल कर रहे हैं।

जिस उम्र में लोग रिटायरमेंट की योजना बनाते हैं, उस उम्र में नीतीश कुमार परियोजनाओं का जायजा ले रहे हैं, अफसरों को हड़का रहे हैं और जिलों का दौरा कर रहे हैं। ये किसी राज्यसभा जाने वाले नेता की विदाई यात्रा नहीं लग रही, बल्कि ये तो एक नए मिशन की शुरुआत लग रही है। नीतीश कुमार ने अपने नेताओं से पहले ही साफ कह दिया है कि “घबराओ मत, मैं कहीं नहीं जा रहा, मेरी नजर सब पर रहेगी।” यानी शाह साहब, नीतीश कुमार ने गद्दी छोड़ने का मन बनाया भी है, तो रिमोट अपने हाथ में रखने का पूरा इंतजाम कर लिया है।

पिछले दिनों अमित शाह बिहार आए थे। वे सीमांचल गए, दो दिन कैंप किया और फिर वहाँ पहुँचकर वही पुराना ‘घुसपैठिया’ राग अलापा। सीमांचल को लेकर बीजेपी की कोशिश इस तरह से दिखाई दे रही है कि यहाँ के माहौल को हिंदू-मुस्लिम में बांट दिया जाए और बिहार-बंगाल को काटकर एक नया केंद्र शासित प्रदेश बनाने की अफवाहों को हवा दी जाए। माना जा रहा है कि पूरा मकसद ध्रुवीकरण की राजनीति को लेकर है, क्योंकि सीमांचल में इस बार बीजेपी की दाल बिल्कुल नहीं गल पाई है।

एक बार फिर नीतीश कुमार ने यहाँ अमित शाह की गोटियाँ काट दी हैं। अमित शाह के जाते ही नीतीश ने सीमांचल का दौरा प्लान कर लिया। नीतीश जानते हैं कि अल्पसंख्यक समाज उनका बड़ा वोट बैंक रहा है। वे जानते हैं कि अगर वे अमित शाह की ‘कट्टर हिंदुत्व’ वाली लाइन पर चले, तो उनका वजूद खत्म हो जाएगा। इसलिए, सीमांचल में नीतीश का एक्शन बीजेपी के लिए एक खुली चुनौती है।

क्या नीतीश कुमार वहाँ घुसपैठ पर अमित शाह से अलग स्टैंड लेंगे? बिल्कुल लेंगे! क्योंकि नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ रहते हुए भी कभी मुसलमानों का अहित नहीं होने दिया। 2013 का वो वाकया याद कीजिए जब नरेंद्र मोदी के नाम पर नीतीश ने एनडीए को लात मार दी थी। नीतीश कुमार को पता है कि बिहार में ‘सेकुलर’ छवि ही उन्हें बचा सकती है।

वैसे तो नीतीश कुमार ने अचानक सीएम की कुर्सी छोड़कर राज्यसभा जाने का फैसला लिया है, तो उसके पीछे कोई बड़ा खेल जरूर होगा। क्योंकि नीतीश राजनीति के इतने कमजोर खिलाड़ी तो नहीं हैं कि कोई उनके साथ खेल खेल सके। हालाँकि जदयू की ओर से ही ये आरोप आए हैं कि पार्टी हाईजैक है और नीतीश कुमार कोई फैसला नहीं ले पा रहे हैं, लेकिन राजनीतिक पंडितों का मानना है कि नीतीश ने कोई न कोई बड़ा खेल किया है। अंदाजा यह लगाया जा रहा है कि जिस तरीके से नीतीश कुमार ने अपने बेटे को सियासी मैदान में उतार दिया है, उसमें कहीं न कहीं कुछ न कुछ ‘गोट’ फंसी है। निशांत ने जेडीयू ज्वाइन करते ही जिलों के दौरे का ऐलान कर दिया। वे कह रहे हैं कि वे अपने पिता के काम को जन-जन तक पहुँचाएंगे। लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही है।

सियासी गलियारों में चर्चा है कि नीतीश कुमार अपनी जगह निशांत को डिप्टी सीएम या शायद सीएम की कुर्सी पर बिठाने की गोटियाँ फिट कर रहे हैं। जेडीयू के भीतर से निशांत को मुख्यमंत्री बनाने की मांग उठने लगी है। अमित शाह को लग रहा था कि नीतीश के बाद बिहार उनकी जागीर हो जाएगा, लेकिन नीतीश ने ‘पारिवारिक कार्ड’ खेलकर बीजेपी के अरमानों पर पानी फेर दिया है। निशांत को आगे बढ़ाकर नीतीश कुमार अपनी विरासत को सुरक्षित करना चाहते हैं। अगर निशांत सीएम बनते हैं, तो नीतीश कुमार राज्यसभा में बैठकर भी बिहार की सरकार को उंगलियों पर नचाएंगे।

बीजेपी और अमित शाह को लगता है कि नीतीश कुमार अब उनके साथ ‘फेविकोल’ की तरह चिपक गए हैं। लेकिन नीतीश का इतिहास कुछ और ही कहता है। 2013 में मोदी के नाम पर बगावत, 2010 में कोसी बाढ़ की मदद लौटा देना और मोदी को सालों तक बिहार में घुसने न देना—ये नीतीश कुमार का असली मिजाज है। नीतीश ने मोदी पर अल्पसंख्यक समाज के साथ नाइंसाफी का आरोप लगाया था। आज भी, भले ही वे एनडीए में हों, लेकिन बीजेपी की नफरत की राजनीति और नीतीश की समाजवाद की राजनीति कभी मिल नहीं सकती।

शाह साहब को लग रहा है कि उन्होंने नीतीश को राज्यसभा भेजकर रास्ते से हटा दिया है, लेकिन नीतीश का ‘पेट का दांत’ अभी भी बीजेपी को डराने के लिए काफी है। नीतीश जब चाहें, खेल पलट सकते हैं। ओवैसी की पार्टी के 5 विधायक और कांग्रेस के असंतुष्ट विधायक नीतीश के एक इशारे पर पाला बदल सकते हैं।

वैसे तो नीतीश कुमार अक्सर कहते हैं कि अब कहीं नहीं जाएंगे, लेकिन इस जुमले पर तो खुद बीजेपी के नेता भी यकीन नहीं करते। हर दो साल में पलटी मारना नीतीश की फितरत बन चुकी है। 2013, 2015, 2017, 2022, 2024 की ये तारीखें गवाह हैं कि नीतीश की ‘अंतरात्मा’ कब जाग जाए, कोई नहीं जानता।

इस बार नीतीश के पास 85 विधायकों की ताकत है। वे बीजेपी से महज 4 कदम पीछे हैं। लालू यादव और महागठबंधन का दरवाजा 24 घंटे उनके लिए खुला है। बीजेपी के लिए सबसे बड़ा खतरा यही है कि अगर नीतीश को लगा कि बीजेपी निशांत की राह में रोड़ा अटका रही है, या सीमांचल में सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ रही है, तो नीतीश कुमार 2026 के राज्यसभा चुनाव का इंतजार नहीं करेंगे। वे उससे पहले ही कोई बड़ा ‘गेम’ कर सकते हैं।

वैसे भी नीतीश कुमार बिहार की सियासत के वो जादूगर हैं जिनके पिटारे में कब क्या निकल आए, किसी को नहीं पता। खुद को सीएम बनाए रखने के बहाने तलाशना हो या बेटे की ताजपोशी का रास्ता बनाना, नीतीश ने अपनी बिसात बिछा दी है। अमित शाह को लग रहा है कि वे बिहार फतह कर लेंगे, लेकिन नीतीश की सक्रियता और सीमांचल का ये नया दांव बता रहा है कि लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। बीजेपी जिस घुसपैठ और विभाजन की राजनीति पर बिहार को तोड़ना चाहती है, नीतीश कुमार वहाँ एक बड़ी रुकावट बनकर खड़े हैं।

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