PC&PNDT एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पुलिस की FIR-जांच पर लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने PC&PNDT एक्ट को लेकर बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट ने कहा कि इस कानून के तहत पुलिस न सीधे FIR कर सकती है, न मुख्य जांच एजेंसी बन सकती है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सुप्रीम कोर्ट ने PC&PNDT एक्ट को लेकर बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट ने कहा कि इस कानून के तहत पुलिस न सीधे FIR कर सकती है, न मुख्य जांच एजेंसी बन सकती है.
देश में लिंग चयन और कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए बने सबसे अहम कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ‘प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स (लिंग चयन पर रोक) एक्ट, 1994’ यानी पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट के तहत होने वाले अपराधों में पुलिस न तो सीधे एफआईआर दर्ज कर सकती है और न ही खुद मुख्य जांच एजेंसी के तौर पर काम कर सकती है.
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने यह फैसला उस मामले में दिया, जिसमें सवाल उठा था कि क्या पुलिस को इस कानून के तहत अपराध की जांच करने और केस दर्ज करने का अधिकार है.
कोर्ट ने धारा 27 और धारा 28 के बीच के संबंध को विस्तार से समझाया और बताया कि इस कानून को बनाते समय क्या मकसद था. सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट मुक्ता गुप्ता ने एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड नितिन सलूजा के साथ मिलकर एमिकस क्यूरी यानी कोर्ट की मदद करने वाले न्याय मित्र के तौर पर सहायता की. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन मामलों पर सीधा असर डाल सकता है,
जहां पुलिस ने पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट के तहत सीधे एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी थी. हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि पुलिस को पूरी तरह इस प्रक्रिया से बाहर नहीं किया गया है. अगर किसी मामले में सामान्य आपराधिक कानून के तहत भी कोई अपराध बनता है, तो पुलिस उस अपराध की अलग से जांच और कार्रवाई कर सकती है.
आखिर कोर्ट के सामने असली सवाल क्या था?
मुख्य सवाल यह था कि जब पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट की धारा 27 इसके तहत आने वाले अपराधों को संज्ञेय, गैर-जमानती और गैर-समझौता-योग्य बताती है, तो क्या पुलिस को खुद एफआईआर दर्ज करने और जांच शुरू करने का अधिकार मिल जाता है? या फिर धारा 28 में बताई गई खास कानूनी प्रक्रिया ही इस एक्ट के तहत कार्रवाई शुरू करने का एकमात्र रास्ता है. सुप्रीम कोर्ट के सामने इसी कानूनी उलझन को दूर करने की जरूरत थी.
तो क्या इसका मतलब है पुलिस पूरी तरह बेअसर हो गई?
बिल्कुल नहीं. कोर्ट ने पुलिस को इस कानून से पूरी तरह बाहर नहीं किया है, बल्कि उसकी भूमिका को सीमित और मदद करने वाली बनाया है. पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट के तहत जांच की मुख्य जिम्मेदारी ‘उचित अथॉरिटी यानी संबंधित प्राधिकरण’ की होगी. अगर इस अथॉरिटी को जांच या कार्रवाई के दौरान पुलिस की जरूरत पड़ती है, तो वह पुलिस की मदद ले सकती है. यानी पुलिस खुद से इस एक्ट के तहत मुख्य जांच शुरू नहीं कर सकती, लेकिन जरूरत पड़ने पर संबंधित प्राधिकरण की सहायता कर सकती है.
क्या एफआईआर दर्ज करना जायज है, क्योंकि अपराध संज्ञेय बताए गए हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ किसी अपराध को संज्ञेय और गैर-जमानती घोषित कर देने से पुलिस को उसकी जांच करने का अधिकार अपने आप नहीं मिल जाता. कोर्ट ने धारा 27 और धारा 28 की भाषा के साथ-साथ एक्ट के दूसरे प्रावधानों, कानून के संवेदनशील मुद्दे और इसमें शामिल मेडिकल व तकनीकी पहलुओं को भी ध्यान में रखा.
कोर्ट ने माना कि पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट में पुलिस को मुख्य जांच एजेंसी की भूमिका नहीं दी गई है. इसलिए पुलिस अगर इस कानून के तहत एफआईआर दर्ज भी कर ले, तो वह उसी एफआईआर के आधार पर इस एक्ट के तहत अपनी जांच आगे नहीं बढ़ा सकती. कानून में बताई गई खास प्रक्रिया का पालन करना जरूरी होगा.
अपराध की जांच आखिर कौन करेगा?
इस सवाल पर कोर्ट ने एक्ट की धारा 17(4) का हवाला दिया. इसमें शिकायतों की जांच की जिम्मेदारी सीधे ‘उचित अथॉरिटी यानी संबंधित प्राधिकरण’ को दी गई है. इसके अलावा कोर्ट ने नियम 18ए(3)(4) का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया है कि जहां तक संभव हो, पुलिस की मदद लेने से बचना चाहिए.
इन्हीं प्रावधानों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस इस कानून के तहत मुख्य जांच अथॉरिटी नहीं हो सकती. उसकी भूमिका जरूरत पड़ने पर संबंधित प्राधिकरण की मदद करने तक सीमित रहेगी. यानी पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट में कार्रवाई का शुरुआती और मुख्य अधिकार संबंधित प्राधिकरण के पास ही रहेगा.
पुलिस जांच पर बनी चार्जशीट से क्या मजिस्ट्रेट संज्ञान ले सकता है?
इस सवाल पर भी सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति साफ कर दी. कोर्ट ने कहा कि धारा 28 खुद ही यह तय करती है कि पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट के तहत किसी अपराध पर कोर्ट किस तरह कार्रवाई शुरू कर सकता है. इस धारा में इसके लिए खास प्रक्रिया और शर्तें दी गई हैं. इसलिए कोई सक्षम मजिस्ट्रेट सिर्फ पुलिस की जांच के बाद दाखिल की गई चार्जशीट के आधार पर पीसी एंड पीएनडीटी एक्ट के तहत अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता.
यानी इस कानून में सिर्फ एफआईआर और पुलिस चार्जशीट की सामान्य प्रक्रिया के जरिए मामला कोर्ट तक नहीं पहुंच सकता. इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित मामले को दोबारा हाई कोर्ट भेज दिया, ताकि वहां कानून में तय प्रक्रिया के मुताबिक आगे फैसला लिया जा सके.



