मोदी के झूठे वादों से लोगों का टूटा भरोसा, सर्वदलीय बैठक में सरकार की बंपर फजीहत
प्रधानमंत्री मोदी की एक गलत बयानबाज़ी के चलते पैनिक फैल गया और पेट्रोल पंपों पर लंबी लंबी लाइनें लग गईं।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: प्रधानमंत्री मोदी की एक गलत बयानबाज़ी के चलते पैनिक फैल गया और पेट्रोल पंपों पर लंबी लंबी लाइनें लग गईं।
एक तरफ मोदी जी समेत पूरी सरकारी मशीनरी ये दावा कर रही है कि उसके पास कच्चे तेल का पर्याप्त भंडार है और किसी को पैनिक करने की कोई जरूरत नहीं, लेकिन फिर भी देश भर से ऐसी कई तस्वीरें सामने आ रही हैं जिसमें लोग पेट्रोल पंपों पर अपनी अपनी मोटरसाइकिल और कारों को लेकर पेट्रोल पंपों पर लंबी लंबी लाइनों में खड़े नजर आ रहे हैं।
खुद पीएम मोदी के गृह राज्य गुजरात में लोग अपनी गाड़ियों की टंकी फुल कराने के लिए घंटों घंटों इंतज़ार कर रहे हैं। पहले जो पैनिक एलपीजी के लिए दिखाई दे रहा था वही पैनिक अब पेट्रोल पंपों पर क्यों दिखाई दे रहा है। तो क्या लोगों को पीएम मोदी की बातों पर भरोसा नहीं रह गया है? क्या ये लोग विपक्ष के बहकावे में आकर पेट्रोल और डीजल खरीद रहे हैं या फिर देश की संसद में खड़े होकर एक ऐसा बयान दे दिया जिसके चलते पूरे देश में इस वक्त पैनिक फैल गया है।
जब से ईरान-इज़राइल की जंग के बीच होर्मुज़ स्ट्रेट में भारतीय जहाज़ फंसे हैं, भारत में एलपीजी गैस संकट पैदा हो गया। विपक्ष लंबे समय से इसको लेकर सरकार पर दबाव बना रहा था लेकिन सरकार इसे मानने को राज़ी नहीं थी।
एक तरफ लोग लंबी लंबी लाइन लगाकर एलपीजी गैस सिलेंडर खरीदने के लिए खड़े थे, दूसरी तरफ खुद मोदी जी चुनावी रैलियों में कह रहे थे कि विपक्ष पैनिक क्रिएट कर रही है। लेकिन लोगों का सब्र का बांध टूटता देख मोदी जी एक दिन संसद में पहुंचे और उन्होंने इस संकट पर चर्चा की। उन्होंने करीब 25 मिनट तक अपनी स्पीच दी और मेन मुद्दों पर बात करने के बजाय ज़्यादातर अपनी उपलब्धियां गिनाईं। लेकिन इसी स्पीच में उन्होंने एक ऐसी बात बोल दी जिसके बाद पूरे देशभर में ऐसा हाहाकार मचा कि लोग पैनिक मोड में आ गए। लोग अपनी अपनी गाड़ियां लेकर पेट्रोल पंप भागने लगे। जेब में पैसा हो ना हो लेकिन सबको अपनी टंकी फुल करानी थी।
लोग पेट्रोल की एक एक बूंद बचाते हुए तेल की टंकियों पर रेला लगाने लगे। जिसके पास गाड़ी नहीं थी वो ड्रम कनस्तर लेकर पहुंच गए। इस वीडियो को देखिए, एक चाचा अपने एक कंधे पर कनस्तर लिए हैं और दूसरे हाथ में नीला ड्रम और दोनों में इतना पेट्रोल भरकर ले जा रहे हैं जितने के लिए अमेरिका किसी देश पर हमला कर देता है। पेट्रोल के लिए ऐसी मारामारी हुई कि लोग अपनी गाड़ियां छोड़ एक दूसरे पर ही बरस पड़े। बात यहां तक पहुंच गई कि खुद तेल की कंपनियों को आकर कहना पड़ गया कि पैनिक न करिए, हमारे पास पर्याप्त तेल है। लेकिन सोचने वाली बात है कि ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच ये जंग तो काफी लंबे समय से चल रही है। विपक्ष भी काफी समय से सरकार से तेल को लेकर चिंता जता रहा है।
फिर अचानक एक रात में ऐसा क्या हुआ कि लोगों में इतना पैनिक फैल गया कि लोगों का हुजूम पेट्रोल पंप की तरफ दौड़ पड़ा, ये सब मोदी जी के एक बयान के चलते हुआ। दरअसल मोदी ने अपने भाषण के दौरान अपनी सरकार की पीठ थपथपाते हुए कोरोना काल का ज़िक्र कर दिया था। उन्होंने कोरोना महामारी का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत ने पहले भी वैश्विक संकटों का सामना एकजुट होकर किया है। उन्होंने कहा कि देश को हर चुनौती के लिए तैयार रहना चाहिए और एकजुटता बनाए रखनी चाहिए जैसे हमने कोविड काल में किया था।
बस मोदी जी का कोरोना नाम लेना था कि लोगों को कोरोना काल याद आ गया। लोगों को याद आ गया कि कैसे कोविड महामारी के दौरान लोगों को सांस लेने के लिए भी ऑक्सीजन सिलेंडर लेने के लिए लाइनों में लगना पड़ा था। उस समय लोगों को कैसे कैसे दिन झेलने पड़े थे। और कैसे सरकार ने लोगों को अपने हाल पर छोड़कर आत्मनिर्भर भारत की घोषणा कर दी थी।
इसी का नतीजा था कि लोगों ने जैसे ही कोरोना का नाम सुना, लोगों ने अपनी अपनी गाड़ियां उठाईं और सब तेल भराने के लिए पहुंचने लगे। सरकार के मंत्री चिल्लाते रह गए कि कोई कमी नहीं है लेकिन किसी को इस सरकार पर भरोसा नहीं रह गया। लोगों ने देखा कि सरकार इतने दिनों से चिल्ला रही है कि देश में एलपीजी गैस का कोई संकट नहीं है लेकिन इसके बावजूद एलपीजी गैस के लिए लंबी लंबी लाइनें लग रही हैं। आज बुकिंग करो तो पता नहीं कब गैस मिल रही है। लोगों के होटल रेस्टोरेंट बंद होते रहे लेकिन सरकार कहती रही सब चंगा सी।
यही कारण है कि लोगों ने इस बार किसी की एक नहीं सुनी और जैसे ही उन्होंने प्रधानमंत्री के मुंह से कोरोना काल का नाम सुना, लोगों को समझ आ गया कि इस सरकार में कुछ भी मुमकिन है। जब भी ये सरकार कहे कि घबराने की जरूरत नहीं है तभी घबराना चाहिए। इसके बाद पूरे देश भर में ऐसा पैनिक फैल गया कि लोग अपना सारा काम धाम छोड़कर टंकी फुल कराने के लिए दौड़ पड़े। इसके बाद मंत्रालय को खुद आकर सफाई देनी पड़ी कि हमारे पास पर्याप्त पेट्रोल-डीजल है। पेट्रोल पंप पर भी पर्याप्त है। अफवाह पर ना जाएं।
एक तरफ जहां मोदी सरकार से देश के हालात संभल नहीं रहे हैं वहीं विश्व स्तर पर भी उसकी जमकर फजीहत हो रही है। लेकिन फिर भी हमारे लेज़र eyes वाले हमारे विदेश मंत्री एस जयशंकर अपने हीरोगिरी वाले बयानों से बाज़ नहीं आ रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार सर्वदलीय बैठक के दौरान जब विपक्षी नेताओं ने सरकार के मंत्रियों से पूछा कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ के तौर पर पाकिस्तान की भूमिका भारत के लिए कोई झटका है, तो विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि भारत ‘दलाल देश’ नहीं बन सकता, जो दूसरे देशों के पीछे भागे और पूछे कि क्या उसकी सेवाओं की ज़रूरत है।
उन्होंने यह भी कहा कि यह कोई नई बात नहीं है, क्योंकि पाकिस्तान 1981 से ही यह भूमिका निभा रहा है। बैठक में मौजूद कुछ लोगों के अनुसार, जयशंकर ने यह भी बताया कि अगर इसे अब भारत की विदेश नीति की विफलता माना जा रहा है, तो यह पहले भी एक विफलता ही थी। मतलब फिर वही बात कि अगर कांग्रेस ने गलती की तो हम भी करेंगे।
आखिर में सवाल सिर्फ पेट्रोल, डीजल या एलपीजी का नहीं है, सवाल भरोसे का है। जब सरकार बार-बार यह कहे कि सब कुछ कंट्रोल में है और जमीन पर हालात इसके उलट दिखें, तो लोगों के मन में डर पैदा होना लाज़मी है।
यही डर इस बार भी देखने को मिला, जहां एक बयान ने पूरे देश में ऐसा माहौल बना दिया कि लोग अफवाह और आशंका के बीच फर्क ही भूल गए। यह स्थिति अपने आप में बताती है कि कहीं न कहीं कम्युनिकेशन में बड़ी खामी है। सरकार का काम सिर्फ बयान देना नहीं, बल्कि लोगों के विश्वास को बनाए रखना भी होता है। लेकिन जब लोगों को अपने पिछले अनुभव याद आते हैं—चाहे वो कोरोना काल की परेशानियां हों या जरूरी चीजों की किल्लत—तो फिर कोई भी आश्वासन उन्हें पूरी तरह शांत नहीं कर पाता।
यही वजह है कि इस बार लोगों ने इंतजार करने के बजाय खुद ही कदम उठाना सही समझा। दूसरी तरफ, विपक्ष इस पूरे मुद्दे को सरकार की नाकामी के तौर पर पेश कर रहा है, जबकि सरकार इसे अफवाह और राजनीति बता रही है। लेकिन सच्चाई इन दोनों के बीच कहीं है, जहां जनता सबसे ज्यादा परेशान है। अब जरूरत है साफ और भरोसेमंद संवाद की, ताकि लोग घबराहट में फैसले न लें। क्योंकि अगर हालात ऐसे ही रहे, तो हर छोटे बयान पर बड़ा पैनिक पैदा होता रहेगा—और इसका सबसे बड़ा नुकसान आम आदमी को ही उठाना पड़ेगा।



