सड़ता सिस्टम मरते लोग

  • हवा, पानी, सड़क-हर मोर्चे पर भाजपा सरकार विफल
  • दिल्ली में हवा, मध्यप्रदेश में पानी और यूपी में रोड एक्सीडेंट से मरता भारत
  • सबसे बड़ा सवाल दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
  • मौतें अब भगवान नहीं सरकार बांट रही है?

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। इंदौर की मौतें बीत चुकी खबर नहीं हैं वह आने वाली त्रासदियों का ट्रेलर भर हैं। अगर इन खबरों के बाद भी सिस्टम नहीं जागा और व्यवस्था को दुरूस्त नहीं किया गया तो फिर पछतावे के आंसू नहीं पश्चताप की सिसकियों के अलावा कुछ हासिल होने वाला नहीं। प्रकृति भयंकर संदेश दे रही है। दिल्ली की हवा जहरीली हो चुकी है और देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सड़क हादसों की बाढ़ सी आयी हुई है। वहीं मध्य प्रदेश के इंदौर में जहरीले पानी से हुई मौतों के चलते लोगों का भरोसा सिस्टम से उठ चुका है। कोमोवेशन ऐसी ही? स्थितियां परिस्थतियां पूरे देश के अलग—अलग हिस्सों में बन नही है लेकिन सवाल पूछने पर उन्हें ठीक करने के बजाए सवाल उठाने वालों को ही दोषी साबित किया जा रहा है। सोनम वांगचुक एक मिसाल भर है। सवाल पूछने या व्यवस्था को आईना दिखाने की कोशिश में जेल जाने वालों की की फेहरिस्त दिन प्रतिदिन लंबी होती जा रही है लेकिन व्यवस्था में तनिक भी बदलाव नहीं आ रहा है। सोचिए लखनऊ में पीएम के कार्यक्रम के बाद बचे खाने को खुले में फेंक दिया गया और 71 से ज्यादा भेड़ों की मौत हो गयी। यह हाल स्मार्ट सिटी का है जहां अरबों रूपया पानी की तरफ बहाया जा चुका है। देश के बाकी के हिस्सों का हाल आसानी से समझा जा सकता है।

मोहन सरकार मेरे बच्चे को वापस ला सकती है क्या?

इंदौर जहरीले पानी पीने से हुई मौतों में 6 माह के अभ्यान साहू की मौत ने पूरे देश में हाहाकार मचा रखा है। इंदौर के भगीरथपुरा इलाके के मराठी मोहल्ले की एक संकरी गली में रहने वाले अभ्यान साहू की मौत पानी पीने के बाद आये उल्टी दस्त के कारण हो गयी। अभ्यान के परिवार का दर्द इसलिए भी और गहरा है, क्योंकि यह बच्चा उनके जीवन में दस साल की मन्नतों और इंतजार के बाद आया था। वर्षों की दुआओं इलाज और उम्मीदों के बाद जन्मे इस बच्चे की मौत ने पूरे परिवार को भीतर से तोड़ दिया। आसपास के लोगों के मुताबिक बच्चे की बीमारी के दौरान इलाके में कई अन्य लोग भी पेट की गंभीर समस्याओं से जूझ रहे थे लेकिन समय रहते न तो साफ पानी की व्यवस्था की गई और न ही कोई ठोस स्वास्थ्य हस्तक्षेप हुआ। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अभ्यान के परिवार ने बच्चे की मौत के बाद मिलने वाले मुआवजे को लेने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि पैसों से न तो उनका बेटा लौट सकता है और न ही सिस्टम की लापरवाही धुल सकती है। यह इनकार उनके गम की गहराई और व्यवस्था के प्रति गुस्से को साफ दर्शाता है।

मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का शर्मनाक बयान

इंदौर घटना आया मिनिस्टर कैलाश विजयवर्गीय का बयान न सिर्फ बेहूदा था बल्कि सत्ता की संवेदनहीन मानसिकता का आईना भी। जब लोग मरते हैं और मंत्री हल्के शब्दों में बात करते हैं तो साफ हो जाता है कि सरकार और जनता दो अलग दुनियाओं में जी रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल प्रधानमंत्री की चुप्पी का है। दिल्ली की हवा पर नहीं बोले इंदौर के पानी पर नहीं बोले यूपी की सड़कों पर नहीं बोले। क्या यह चुप्पी संयोग है? नहीं। यह वह रणनीति है जिसमें मुद्दे बोलने से नहीं दबाने से मैनेज किए जाते हैं। हाल ही में गुजरात में हुए हादसे ने एक और परत खोली। वहां सरकार सीधे सवालों के घेरे में है अनुमतियां, निगरानी, सिस्टम। यानी अब हादसे प्राकृतिक नहीं नीतिगत हो चुके हैं। तो क्या मौतें भगवान नहीं सरकारें बांट रही हैं लगता कुछ ऐसा ही है।

मौतें चेतवानी लेकिन दुर्भाग्य कहकर दफना दिया गया

दिल्ली आज गैस चैंबर बन चुकी है लेकिन इसे आपदा कहने से सत्ता कतराती है। क्योंकि आपदा मानते ही सरकार को जवाबदेही तय करनी पड़ेगी। इसी देश के इंदौर में दूषित पानी पीने से दर्जनों लोग मर गए। टूटी पाइपलाइन सड़ी व्यवस्था और बेलगाम नगर प्रशासन। सवाल यही है कि क्या यह हादसा है या फिर प्रशासनिक लापरवाही। उत्तर प्रदेश की सड़कें अब विकास की रेखा नहीं रहीं वह आतंक का पर्याय बन चुकी हैं। हर सुबह किसी बस के पलटने किसी ट्रक के कुचलने या किसी ओवरब्रिज से गिरने की खबर आती है। जांच बैठती है फाइल चलती है और अगला हादसा तय हो जाता है। यहां दुर्घटनाओं से मिलती मौतो पर ब्रेक लग ही नहीं पा रहा। पटना यानी बिहार की राजधानी खुद इस बात का सबूत है कि जब सत्ता को शर्म न हो तो राजधानी भी बदहाल हो सकती है। जलभराव गंदा पानी, बीमार स्वास्थ्य व्यवस्था यह सब वर्षों से बदस्तूर चल रहा है। लेकिन सरकार इसे राजद और लालूराज की विरासत कह कर टाल देती है। क्या सरकार को नहीं मालूम की पिछले 15 वर्षों से ज्यादा समय से वहा नीतिश राज है। राजस्थान और मध्य प्रदेश विकास के पोस्टर स्टेट हैं। मंचों से योजनाएं चमकती हैं लेकिन ज़मीन पर पानी सड़क और सुरक्षा तीनों चरमरा चुके हैं। इंदौर की मौतें चेतावनी हैं पर सरकार ने उन्हें दुर्भाग्य कहकर फाइल में दफना दिया।

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