आयुष्मान कार्ड दिखाया, फिर भी वसूले हजारों रुपये! बरेली के गंगा चरण अस्पताल पर लोक अदालत का बड़ा फैसला

बरेली की लोक अदालत ने आयुष्मान कार्ड धारक 77 वर्षीय महिला से कथित अवैध वसूली के मामले में गंगा चरण अस्पताल पर 18,324 रुपये लौटाने का आदेश दिया है। समय पर भुगतान न होने पर अस्पताल की संपत्ति कुर्क की जा सकती है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सरकार की आयुष्मान भारत योजना का मकसद गरीब और जरूरतमंद लोगों को मुफ्त और सम्मानजनक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है। लेकिन जब इसी योजना के नाम पर मरीजों से पैसे वसूले जाने के आरोप सामने आते हैं, तो सवाल सिर्फ एक अस्पताल पर नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था की जवाबदेही पर खड़े होते हैं। बरेली में ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां 77 वर्षीय बुजुर्ग महिला से कथित रूप से आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद हजारों रुपये वसूल लिए गए। अब इस मामले में स्थायी लोक अदालत ने अस्पताल के खिलाफ सख्त फैसला सुनाया है।

क्या है पूरा मामला?

बरेली के फरीदपुर क्षेत्र की रहने वाली 77 वर्षीय रामेश्वरी देवी को 10 अक्टूबर 2025 की रात सांस लेने में तकलीफ होने पर रामपुर गार्डन स्थित गंगा चरण अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों का कहना है कि भर्ती के समय अस्पताल को आधार कार्ड और आयुष्मान भारत कार्ड दोनों दिखाए गए थे। 

आरोप है कि अस्पताल स्टाफ ने शुरुआत में इलाज पूरी तरह मुफ्त होने का भरोसा दिया, लेकिन कुछ ही देर बाद मरीज के तीमारदारों को दवाइयां खरीदने और जांच कराने के नाम पर भुगतान करने के लिए कहा गया। परिवार के अनुसार अस्पताल ने दवाओं के लिए 8,801 रुपये खर्च करवाए, जबकि ब्लड जांच के नाम पर 5,000 रुपये एडवांस जमा कराए गए। आरोप यह भी है कि इस रकम की कोई रसीद नहीं दी गई। इसके अलावा बाद में 820 रुपये और 1,703 रुपये की अतिरिक्त पर्चियां भी थमा दी गईं।

शिकायत के बाद पहुंचा मामला लोक अदालत

रामेश्वरी देवी और उनके परिवार ने अस्पताल की इस कार्रवाई के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। मामले के बढ़ने पर अस्पताल की ओर से कथित तौर पर 8,324 रुपये का चेक भेजकर विवाद समाप्त करने का प्रयास किया गया, लेकिन तब तक मामला स्थायी लोक अदालत पहुंच चुका था। परिवार ने चेक स्वीकार करने से इनकार कर दिया और न्यायिक प्रक्रिया जारी रखी।

अदालत ने क्यों सुनाया एकपक्षीय फैसला?

स्थायी लोक अदालत की बेंच, जिसमें अध्यक्ष काली चरन, सदस्य संजीव कुमार गौतम और सदस्य अनीता यादव शामिल थे, ने मामले की कई बार सुनवाई की। अदालत के अनुसार अस्पताल की ओर से पैरवी करने वाला प्रतिनिधि उपस्थित तो हुआ, लेकिन आरोपों के जवाब में कोई लिखित उत्तर या साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने इसे गंभीर मानते हुए माना कि अस्पताल के पास अपने बचाव में कोई ठोस जवाब नहीं है और इसके बाद एकपक्षीय निर्णय सुनाया गया।

लोक अदालत का बड़ा आदेश

अदालत ने गंगा चरण अस्पताल को निम्न आदेश दिए हैं-

  • मरीज से वसूली गई 8,324 रुपये की राशि वापस की जाए।
  • मानसिक प्रताड़ना और अनावश्यक भागदौड़ के लिए 10,000 रुपये अतिरिक्त हर्जाना दिया जाए।
  • कुल 18,324 रुपये का भुगतान एक महीने के भीतर किया जाए।
  • समय सीमा में भुगतान नहीं होने पर पीड़ित पक्ष अदालत के माध्यम से कुर्की वारंट जारी कराकर रकम वसूल सकता है।

अदालत की सख्त टिप्पणी

फैसले में लोक अदालत ने स्पष्ट कहा कि आयुष्मान भारत योजना गरीबों और जरूरतमंद मरीजों के इलाज के लिए बनाई गई है, न कि अस्पतालों द्वारा अतिरिक्त कमाई का माध्यम बनाने के लिए। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि कोई सूचीबद्ध अस्पताल आयुष्मान लाभार्थियों से दवा, जांच या एडवांस फीस के नाम पर धनराशि वसूलता है तो उसे पूरी रकम वापस करनी पड़ सकती है। साथ ही हर्जाना, प्रशासनिक कार्रवाई और अन्य कानूनी परिणाम भी भुगतने पड़ सकते हैं।

बेटे ने कहा- “उधार लेकर दिए थे पैसे”

फैसले के बाद रामेश्वरी देवी के बेटे मुकेश ने कहा कि उनकी मां की हालत गंभीर थी और परिवार को भरोसा था कि आयुष्मान योजना के तहत इलाज मुफ्त होगा। लेकिन अस्पताल में बार-बार पैसे मांगे गए, जिसके लिए उन्हें उधार तक लेना पड़ा। उन्होंने कहा कि अदालत के फैसले से उन्हें न्याय मिला है और उम्मीद है कि भविष्य में दूसरे गरीब मरीजों के साथ ऐसी स्थिति नहीं होगी।

स्वास्थ्य विभाग भी सख्त

मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. विश्राम सिंह के अनुसार बरेली जिले में वर्तमान समय में 74 अस्पताल आयुष्मान भारत योजना के तहत सूचीबद्ध हैं। पिछले छह महीनों में योजना से संबंधित 22 शिकायतें प्राप्त हुई हैं। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार तीन अस्पतालों को नोटिस जारी किया गया है जबकि एक अस्पताल का क्लेम रोका जा चुका है। अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि यदि किसी अस्पताल द्वारा मरीजों से अवैध वसूली की जाती है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

आयुष्मान योजना की पारदर्शिता पर बड़ा संदेश

यह फैसला सिर्फ एक मरीज को राहत देने तक सीमित नहीं माना जा रहा है। कानूनी जानकारों का कहना है कि यह निर्णय उन सभी अस्पतालों के लिए चेतावनी है जो सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के लाभार्थियों से अतिरिक्त शुल्क लेने की कोशिश करते हैं। 

रिपोर्ट: सुनील सक्सेना, बरेली

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