सोनभद्र भूमि विवाद: इकरारनामा या बैनामा? आदिवासी जमीन सौदे पर उठे बड़े सवाल
सोनभद्र के ओबरा क्षेत्र में आदिवासी भूमि सौदे को लेकर विवाद गहराया। शिकायतकर्ता ने इकरारनामा की जगह बैनामा कराने और भुगतान न मिलने का आरोप लगाया, जबकि मंत्री पक्ष ने आरोपों को निराधार बताया। मामले की जांच पर सबकी नजर है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: जमीन केवल संपत्ति नहीं होती, बल्कि ग्रामीण और आदिवासी परिवारों के लिए पीढ़ियों की विरासत, आजीविका और पहचान का आधार भी होती है। ऐसे में जब किसी भूमि सौदे को लेकर दस्तावेजों की प्रकृति, भुगतान प्रक्रिया और राजस्व अभिलेखों में बदलाव पर सवाल उठने लगें, तो मामला सामान्य विवाद से आगे बढ़कर प्रशासनिक और कानूनी जांच का विषय बन जाता है।
सोनभद्र जिले की ओबरा तहसील के ग्राम कोटा में सामने आया एक भूमि विवाद इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है। मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल (IGRS) पर दर्ज शिकायतों, सोशल मीडिया पर वायरल चर्चाओं और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के बाद अब यह मामला राजस्व प्रशासन, भूमि हस्तांतरण प्रक्रिया और दस्तावेजी पारदर्शिता से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर रहा है।
क्या है पूरा मामला?
ग्राम कोटा (गुरमुरा), थाना चोपन निवासी पारस ने मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत दर्ज कर आरोप लगाया है कि वर्ष 2022 में उनकी पुश्तैनी भूमि से संबंधित दस्तावेजों पर हस्ताक्षर और अंगूठा निशान लिए गए थे। शिकायतकर्ता का दावा है कि उन्हें ‘इकरारनामा’ कराए जाने की जानकारी दी गई थी, जबकि बाद में उन्हें पता चला कि दस्तावेज कथित रूप से ‘बैनामा’ के रूप में पंजीकृत हो गए। पारस का आरोप है कि संबंधित भूमि का हस्तांतरण कुछ अन्य व्यक्तियों के नाम दर्ज हो गया, जबकि उन्हें सौदे की पूरी जानकारी नहीं थी। शिकायतकर्ता का यह भी दावा है कि दस्तावेजों में भुगतान का उल्लेख होने के बावजूद उन्हें धनराशि प्राप्त नहीं हुई।
मंत्री ने आरोपों को बताया निराधार
मामले में नाम आने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार के राज्य मंत्री संजीव कुमार गोंड ने आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया है। मंत्री का कहना है कि भूमि सौदा वैधानिक प्रक्रिया के तहत हुआ था और संबंधित व्यक्ति को भुगतान भी किया गया था। उन्होंने यह भी दावा किया कि यह विवाद राजनीतिक कारणों से उछाला जा रहा है। मंत्री ने अपने बयान में यह भी कहा कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि वास्तविक तथ्य सामने आ सकें।
विवाद का सबसे अहम सवाल: भुगतान हुआ या नहीं?
पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भुगतान को लेकर सामने आया है। शिकायतकर्ता का कहना है कि उसके बैंक खाते में कोई राशि नहीं आई, जबकि दूसरी ओर भूमि सौदे में भुगतान किए जाने का दावा किया गया है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी भूमि हस्तांतरण में बैंकिंग माध्यम से भुगतान दर्शाया गया है, तो संबंधित बैंक रिकॉर्ड, खाते का विवरण और वित्तीय दस्तावेज इस विवाद के महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकते हैं। यही कारण है कि मामले में बैंकिंग रिकॉर्ड की जांच को कई जानकार सबसे महत्वपूर्ण कड़ी मान रहे हैं।
राजस्व अभिलेखों की प्रक्रिया पर भी सवाल
मामले में एक और महत्वपूर्ण प्रश्न राजस्व अभिलेखों में हुए बदलाव को लेकर उठ रहा है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि नामांतरण और रिकॉर्ड परिवर्तन की प्रक्रिया में पर्याप्त सुनवाई नहीं हुई। राजस्व मामलों के जानकारों के अनुसार भूमि हस्तांतरण के बाद नामांतरण, अभिलेख संशोधन और संबंधित प्रशासनिक प्रक्रियाओं में निर्धारित कानूनी नियमों का पालन किया जाना आवश्यक होता है। यदि किसी पक्ष को प्रक्रिया पर आपत्ति है तो उसके लिए राजस्व न्यायालय और अन्य वैधानिक मंच उपलब्ध हैं।
लंबित मामलों से और जटिल हुआ विवाद
शिकायतकर्ता के अनुसार मामले से संबंधित कुछ प्रकरण पहले से न्यायिक और राजस्व मंचों पर लंबित हैं। ऐसे में अंतिम निष्कर्ष न्यायालय और सक्षम प्राधिकरणों के निर्णय के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
प्रशासनिक जांच पर टिकी निगाहें
30 मई 2026 को मुख्यमंत्री पोर्टल पर दर्ज शिकायतों के बाद अब स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों की भूमिका पर भी नजरें टिकी हुई हैं। शिकायतों की जांच में यदि दस्तावेज, बैंक रिकॉर्ड, नामांतरण प्रक्रिया और राजस्व अभिलेखों से जुड़े तथ्यों की विस्तृत समीक्षा की जाती है, तो मामले की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। फिलहाल यह मामला केवल एक भूमि विवाद नहीं, बल्कि भूमि हस्तांतरण की पारदर्शिता, आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। अब सभी की नजर जिला प्रशासन और संबंधित जांच एजेंसियों की आगामी कार्रवाई पर है।
रिपोर्ट: संतोष देव गिरि
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