सोनिया गांधी की किताब के पन्नों से संजय शर्मा की ‘सहिया’ के पर्दे तक
चुप रहे तो देशभक्त, बोले तो बागी! असहमति की आवाज को दबाने की कोशिश!

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। समुद्र में नाकाबंदी हो तो तेल रुकता है रास्ते बंद हों तो जहाज रुकते हैं लेकिन लोकतंत्र में अगर सवालों की नाकाबंदी हो जाए तो फिर क्या रुकता है आवाज और जब आवाज रुकती है तो सिर्फ एक लेखक की किताब नहीं रुकती सिर्फ एक पत्रकार की फिल्म नहीं रुकती। रुकता है वह भरोसा जिस पर लोकतंत्र की पूरी इमारत खड़ी होती है। सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि मामला किसी एक किताब या किसी एक फिल्म का नहीं है। मामला उस अदृश्य लाल रेखा का है जिसके इस पार बोलने की आजादी है और उस पार पहुंचते ही किताब संपादकीय मेज पर अटक जाती है फिल्म प्रमाणन की दीवार से टकरा जाती है और सवाल पूछने वाला खुद सवाल बन जाता है। 27 अगस्त को पत्रकार संजय शर्मा की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘सहियाÓ को सीबीएफसी से प्रमाणन देने से मना कर दिया 28 अगस्त को सोनिया गांधी की किताब बिलॉन्गिंग को लेकर पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने सफाई दी। यहां दो तारीखें दो माध्यम दो अलग अलग कहानियां है लेकिन दोनों के बीच खड़ा एक बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में असहमति की आवाज के लिए जगह लगातार छोटी होती जा रही है? क्या असहमति की आवाज को बैक डोर से दबाया जा रहा है।
पिक्चर अभी बाकी है
सहिया फिल्म में बंदूक दिखी तो देश खतरे में आ गया लेकिन सवाल यह है कि सीबीएफसी को फिल्म में इंसान क्यों नहीं दिखे। फिल्म में दर्शाया गया प्रेम क्यों नहीं दिखा, फिल्म का मैसेज क्यों नहीं समझा गया कि आखिर करोड़ों रूपये खर्च कर फिल्मकार संजय शर्मा समाज को क्या मैसेज देना चाहते हैं। आखिर सेंसर बोर्ड की तरफ से ऐसा क्यों कहा गया कि फिल्म देश की संप्रभुता और अखंडता तथा राज्य की सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है और सार्वजनिक व्यवस्था पर असर डाल सकती है। क्या किसी कहानी में हिंसा दिखाई देना हिंसा का समर्थन करना है अगर ऐसा है तो फिर दुनिया की तमाम युद्ध फिल्में बंद कर दीजिए। अपराध पर बनी फिल्में बंद कर दीजिए। आतंकवाद की कहानियां बंद कर दीजिए। विद्रोह, संघर्ष, पुलिस, सेना, राजनीति और सत्ता के टकराव पर बनी हर फिल्म को पहले कठघरे में खड़ा कर दीजिए। क्योंकि कहानी में अपराधी का होना अपराध का समर्थन नहीं होता खलनायक का दिखना खलनायकी का प्रचार और संघर्ष का चित्रण संघर्ष का महिमामंडन नहीं होता यही तो संजय शर्मा का सवाल है? वह कहते हैं कि फिल्म को उसके पूरे संदर्भ और मूल संदेश के साथ देखा जाना चाहिए।
कहानी इतनी सीधी नहीं है
पेंगुइन कहता है कि हम बिलॉन्गिंग के भारतीय प्रकाशक ही नहीं हैं। वह कहता है कि प्रकाशन में तथ्य जांच और संपादकीय सुझाव देना उसका अधिकार और जिम्मेदारी है और लेखक के साथ बातचीत गोपनीय है। दूसरी तरफ सोनिया गांधी सार्वजनिक रूप से सवाल उठाती हैं और कहती हैं कि पेंगुइन उन लेखकों को निराश करता रहा है जिनका काम केंद्र सरकार को पसंद नहीं आता। और फिर वह एक पोस्टर सामने रखती हैं पेंगुइन है या पिंजरे का परिंदा। अब सवाल यह है कि आखिर वह कौन लोग है और किस लिए इस तरह का माहौल क्रिएट कर रहे हैं जिसमें एक पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष को यह सार्वजनिक सवाल उठाना पड़ रहा है कि प्रकाशन की स्वतंत्रता सत्ता की पसंद नापसंद से संचालित हो रही है। क्या सत्ता को सिर्फ वही किताब पसंद है जिसमें उसके खिलाफ एक भी पन्ना न हो क्या वही फिल्म सुरक्षित है जिसमें व्यवस्था से कोई असहज सवाल न पूछा गया हो क्या वही पत्रकार स्वीकार्य है जो सवाल पूछने से पहले अनुमति ले और क्या लोकतंत्र में अब सबसे सुरक्षित नागरिक वही है जो चुप है।
तब सत्ता निशाने पर थी आज सवाल पूछने वाला निशाने पर है
याद कीजिए वह दौर जब फिल्मों ने सीधे सत्ता पर निशाना साधा। चक्रव्यूह, राजनीति, हवाइंया जैसी फिल्मों ने व्यवस्था भ्रष्टाचार और सत्ता के चरित्र पर सवाल खड़े किये। सरकार विरोधी नैरेटिव के बावजूद फिल्में सिनेमाघरों तक पहुंचीं दर्शकों ने देखा और फिल्मों ने अपना कारोबार भी किया। यानी कहानी सरकार के खिलाफ हो सकती थी पर्दे पर व्यवस्था की धज्जियां उड़ाई जा सकती थीं और फिर भी लोकतंत्र का दरवाजा बंद नहीं हुआ। तब सवाल यह नहीं था कि फिल्म सरकार की तारीफ करती है या आलोचना। सवाल यह था कि फिल्म कानून के दायरे में है या नहीं। अगर यूपीए सरकार के दौर में सरकार विरोधी फिल्मों और किताबों को अपनी बात कहने की जगह मिल सकती थी तो आज सत्ता से असहज सवाल पूछने वाली रचना के सामने प्रमाणन प्रकाशन और अनुमति की दीवारें इतनी ऊंची क्यों दिखाई दे रही हैं। सोनिया गांधी की किताब का विवाद हो पूर्व सैन्य अधिकारी की किताब का मामला हो या फिर पत्रकार संजय शर्मा की फिल्म सहिया इन तीनों ही मामलों के तथ्य और संस्थागत परिस्थितियां अलग हैं। लेकिन सवाल एक ही है कि क्या लोकतंत्र में सत्ता बदलने के साथ असहमति की आजादी का पैमाना भी बदल गया है। क्योंकि सरकार कोई भी हो सत्ता की तारीफ करना लोकतंत्र नहीं है सत्ता से सवाल पूछने की आजादी ही लोकतंत्र की असली परीक्षा है। और अगर कल सरकार विरोधी फिल्म देखकर लोकतंत्र मजबूत था तो आज सरकार से असहज सवाल पूछने वाली फिल्म देखकर लोकतंत्र कमजोर कैसे हो सकता है।




