सियासी दलों की हुंकार : मौजूदा संकट के लिए पीएम मोदी जिम्मेदार!

  • पीएम मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति से फोन पर की बात लेकिन संकट बरकार
  • बोला विपक्ष- एलपीजी की यदि नहीं है कमी तो फिर सिलेंडर के लिए मारामारी क्यों?

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। क्या सरकार सिर्फ आश्वासन के सहारे काम चला रही है? क्या हकीकत और कथनी में जमीन आसमान का अंतर है? यदि गैस होती तो फिर लोग लाइन में क्यों होते? यदि स्टाक होता तो फिर बुकिंग के नियम क्यों बदले गये होते। यह बात अब किसी एक राजनेता की नहीं रही बल्कि देश के सभी विपक्षी दल एलपीजी किल्लत के लिए सीधे पीएम मोदी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। शुरूआत आप नेता संजय सिंह के संसद सत्र में दिये गये बयान से शुरू हुई जो अब धीरे—धीरे आमजन की जुबान पर चढ़ती दिखाई दे रही है।

आस्तीने ताने विपक्ष, बैकफुट पर सरकार

आप नेता संजय सिंह के ताजा आरोपों से देश की सियासत में भूचाल आ चुका है। ईरान—इजरायल युद्ध के चलते भले ही मिडिल ईस्ट में बर्बादी के बादल घिरे हो लेकिन अपना भारत भी संकट से अछूता नहीं रहा। अब तो देश के दूसरे सियासी दल भी मौजूदा संकट के लिए आस्तीने ताने सीधे पीएम मोदी को ही दोषी ठहरा रहे हैं। पीएम मोदी के ईरानी राष्ट्रपति से फोन पर बात करने के बावजूद जमीनी स्तर पर संकट कायम रहने पर विपक्षी दलों ने सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए हैं। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि पीएम मोदी की नीतियों की वजह से ही महंगाई और आवश्यक वस्तुओं विशेषकर एलपीजी सिलेंडर की मारामारी बड़ी है। विपक्ष का कहना है कि ईरानी राष्ट्रपति से बात होने के बाद भी जनता को राहत नहीं मिली और एलपीजी की किल्लत अभी भी जारी है जबकि सरकार दावे कर रही है।

 

ये तो सिर्फ शुरुआत है, असली दर्द बाकी है : राहुल

लोकसभा में बोलते हुए राहुल गांधी ने चेतावनी दी कि होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी प्रकार की रुकावट या बंद होने से भारत की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति सीधे तौर पर प्रभावित होगी। उन्होंने कहा कि एलपीजी की उपलब्धता को लेकर चिंता पहले से ही फैल रही है और संघर्ष बढऩे पर यह और भी गंभीर हो सकती है। ऊर्जा सुरक्षा को किसी भी देश के लिए मूलभूत बताते हुए गांधी ने यह भी सवाल उठाया कि भारत को अमेरिका को इस बात पर प्रभाव डालने की अनुमति क्यों देनी चाहिए कि वह गैस कहां से खरीदे। राहुल गांधी ने कहा कि मध्य पूर्व में युद्ध छिड़ गया है। अमेरिका, इजराइल और ईरान आपस में लड़ रहे हैं। इस युद्ध के दूरगामी परिणाम होंगे। होर्मुज जलडमरूमध्य, जिससे वैश्विक तेल का 20 प्रतिशत प्रवाह होता है, बंद कर दिया गया है। इसके बहुत गंभीर परिणाम होंगे, खासकर हमारे लिए, क्योंकि हमारे तेल और प्राकृतिक गैस का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। अभी तो बस शुरुआत हुई है। रेस्तरां बंद हो रहे हैं। एलपीजी को लेकर व्यापक दहशत फैली हुई है… यह तो बस शुरुआत है।

पीएम मोदी सही हैं लेकिन स्थिति पर संदेह है : प्रियंका

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नागरिकों से घबराहट न करने का आग्रह करने और यह कहने के एक दिन बाद कि भारत कोविड महामारी की तरह ही एलपीजी सिलेंडर संकट से उबर जाएगा, कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने उम्मीद जताई कि पीएम मोदी सही हैं, लेकिन स्थिति पर संदेह व्यक्त किया। देशव्यापी एलपीजी की कमी की खबरों के बीच पीएम मोदी के आश्वासन पर कांग्रेस सांसद ने पत्रकारों से संक्षेप में कहा कि मुझे उम्मीद है कि वह सही हैं, लेकिन ऐसा लगता नहीं है।

मोदी-ईरान वार्ता, बयान नहीं राहत चाहिए

मध्य पूर्व के तनावपूर्ण माहौल के बीच भारत ने कूटनीतिक सक्रियता भी बढ़ाई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजिक्शयान से फोन पर बातचीत कर क्षेत्रीय स्थिति पर चर्चा की। इस बातचीत में दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और उसके वैश्विक असर पर विचार साझा किए। प्रधानमंत्री मोदी ने शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए संवाद और कूटनीति पर जोर दिया। भारत का रुख पारंपरिक रूप से संतुलित माना जाता है। एक तरफ उसके ऊर्जा और व्यापारिक हित खाड़ी क्षेत्र से जुड़े हैं दूसरी तरफ वह वैश्विक स्तर पर स्थिरता और शांति का समर्थक भी रहा है। इसी वजह से भारत लगातार कूटनीतिक प्रयासों के जरिए तनाव कम करने की अपील कर रहा है। हालांकि विपक्ष का कहना है कि कूटनीतिक बातचीत अपनी जगह है लेकिन देश के अंदर गैस और ईंधन से जुड़ी समस्याओं पर भी सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए। उनके मुताबिक जनता को केवल बयान नहीं बल्कि राहत की जरूरत है।

भारत-अमेरिका खनिज समझौते की दिशा में बढ़ते कदम

वैश्विक तनाव और ऊर्जा संकट के बीच भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक सहयोग भी तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राजदूत सर्गियो गोर के मुताबिक दोनों देश महत्वपूर्ण खनिजों से जुड़े एक बड़े समझौते को अंतिम रूप देने के करीब हैं। यह समझौता उन खनिजों पर केंद्रित है जो आधुनिक तकनीक इलेक्ट्रिक वाहनों और रक्षा उपकरणों के लिए बेहद जरूरी माने जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस सहयोग से दोनों देशों की आपूर्ति श्रृंखला मजबूत हो सकती है और चीन जैसे देशों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। भारत के लिए यह समझौता रणनीतिक दृष्टि से अहम माना जा रहा है क्योंकि ऊर्जा और तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाना उसकी प्राथमिकता बन चुका है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि वैश्विक समझौतों के साथ-साथ सरकार को घरेलू संकटों पर भी उतनी ही तेजी से ध्यान देना होगा क्योंकि आखिरकार जनता के लिए सबसे बड़ा सवाल वही है कि रसोई में सिलेंडर कब और कैसे पहुंचेगा।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अमेरिकी सुरक्षा का दावा

मध्य पूर्व के बढ़ते तनाव के बीच दुनिया की नजरें अब उस समुद्री मार्ग पर टिक गई हैं जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। यह मार्ग है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जिसे ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। इस पर ईरान का कब्जा है और उसने आसपास के समुद्री क्षेत्र में बारूदी सुंरगे भी बिछाना शुरू कर दी है। वही उसकी मानवराहित आत्मघाति बोट का जलवा पूरी दुनिया मानती है। ऐसे में ईरान की धमकी के बाद से वहां से जहाजों का आना जाना लगभग रूक चुका है और जो भी जहाज गुजरने की कोशिश कर रहे हैं वह स्वंय के रिस्क पर आगे बड़ रहे हैं। सूचना के मुताबिक अतबक उस क्षेत्र में 28 भारतीय जहाज रूके हैं। व्हाइट हाउस ने साफ किया है कि अमेरिका इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह तैयार है। व्हाइट हाउस के अधिकारियों का कहना है कि क्षेत्र में अमेरिकी नौसैनिक उपस्थिति बढ़ा दी गई है ताकि तेल और गैस ले जाने वाले जहाजों को किसी भी तरह के हमले से बचाया जा सके।

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