सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी, कहा- पुलिस वाले ही वसूली करेंगे, तो आम आदमी को न्याय कौन देगा?
सुप्रीम कोर्ट ने जौहरी से जबरन वसूली मामले में तीन पुलिसकर्मियों की अग्रिम जमानत रद्द की है. कोर्ट ने कहा कि जब कानून लागू करने वाले ही जबरन वसूली करने वाले बन जाते हैं, तो नागरिक दुविधा में पड़ जाते हैं

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सुप्रीम कोर्ट ने जौहरी से जबरन वसूली मामले में तीन पुलिसकर्मियों की अग्रिम जमानत रद्द की है.
कोर्ट ने कहा कि जब कानून लागू करने वाले ही जबरन वसूली करने वाले बन जाते हैं, तो नागरिक दुविधा में पड़ जाते हैं.सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस के इस दुरुपयोग की कड़ी निंदा की. कोर्ट ने कहा कि पुलिस वाले ही वसूली करते हैं तो आम आदमी कहां जाएगा?
सुप्रीम कोर्ट ने तीन पुलिसकर्मियों की अग्रिम जमानत रद्द करते हुए सख्त टिप्पणी की है. कोर्ट ने जौहरी से पैसे वसूलने के मामले में ये जमानत रद्द किया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कानून लागू करने वाले ही जबरन वसूली करने वाले बन जाते हैं, तो नागरिक दुविधा में पड़ जाते हैं, क्योंकि जिनकी रक्षा करना उनका कर्तव्य है, वही उनके खिलाफ सुरक्षा मांगने लगते हैं.
तीनों पुलिसकर्मी एक जौहरी से जबरन वसूली करने के आरोपी हैं. ऐसे में पुलिस का सामना करना तत्काल प्रतिशोध को न्योता देना है. नागरिक के पास एकमात्र विकल्प वर्दीधारी अधिकारियों के सामने चुपचाप आत्मसमर्पण करना ही रह जाता है, भले ही वो स्पष्ट दुर्व्यवहार हो रहा हो.
दरअसल, एक पिता और उनकी नाबालिग बेटी अपने बहनोई के साथ मुंबई से यात्रा कर रहे थे. उन्हें रेलवे स्टेशन पर पुलिस ने हिरासत में ले लिया. उनके बैग की तलाशी के दौरान 14 ग्राम सोने की छड़ और 31,900 रुपये नकद बरामद हुए. इसके बाद उन्हें पास के एक कमरे में ले जाया गया और सोने की छड़ के बदले नकद देने के लिए मजबूर किया गया. पिता ने घटना के बाद प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई, जिसके बाद सत्र न्यायालय ने अधिकारियों की अग्रिम जमानत खारिज कर दी.
हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट ने जांच के दौरान प्राप्त सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद उनकी याचिका स्वीकार कर ली. हाई कोर्ट के अनुसार आरोपियों ने पहचान पत्र पहन रखे थे और पिता और बेटी में किसी प्रकार की परेशानी के लक्षण नहीं दिखे, साथ ही एफआईआर दर्ज कराने में देरी भी हुई थी.
जहां कैमरा नहीं था, वहां ले गए पुलिसवाले
महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका के जरिए इसे चुनौती दी. सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से अधिवक्ता भरत बागला ने कहा कि विभिन्न दिशानिर्देशों के अनुसार, तलाशी और ज़ब्ती की प्रक्रिया उचित वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ की जाती है. हालांकि, पुलिसकर्मियों ने पिता और उनकी बेटी को एक ऐसे कमरे में ले गए जहां कोई कैमरा नहीं था.
उन्होंने कहा कि राज्य नागरिकों के खिलाफ वर्दीधारी अधिकारियों द्वारा की गई ऐसी ज्यादतियों को बर्दाश्त नहीं करता है और न्यायालय को सूचित किया कि उचित जांच के बाद तीनों अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है.
सर्वोच्च अदालत ने राज्य सरकार की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि हमें आश्चर्य है कि हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की है कि उनमें किसी प्रकार की परेशानी के लक्षण नहीं हैं, विशेषकर तब जब फुटेज में उनके चेहरे के भाव स्पष्ट नहीं हैं. हमने यह भी देखा कि दोनों वयस्क आगे बढ़ रहे थे, उनमें से एक अपने हाथों से लगातार इशारे कर रहा था जबकि बच्चा पीछे-पीछे चल रहा था, जो निश्चित रूप से परेशानी का संकेत है.
हम यह भी पाते हैं कि बंद कमरे में बिताया गया समय पुलिसकर्मियों के लिए शिकायत में उल्लिखित कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त था, जिसे हम यह कहना चाहते हैं कि किसी भी स्थिति में आपराधिक मुकदमे में साबित करना होगा.
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि आरोपी पुलिस अधिकारियों द्वारा सोने की छड़ लौटाने से जबरन वसूली के आरोप का खंडन होता है और कहा कि सोने की छड़ लौटाने से ही अभियोजन पक्ष के मामले को बल मिलता है.



