ट्रंप का गुस्सा फूटा, नाटो को कहा ‘पेपर टाइगर’! सहयोगियों ने क्यों नहीं दिया साथ

ईरान युद्ध के बीच डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो देशों से सैन्य मदद मांगी, लेकिन यूरोप के कई सहयोगियों ने साफ इनकार कर दिया। आखिर क्यों पीछे हटे अमेरिका के सहयोगी? जानिए नाटो, ट्रंप और वैश्विक राजनीति के इस बड़े टकराव की पूरी कहानी।

4pm न्यूज नेटवर्क: मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के टकराव ने वैश्विक राजनीति को फिर से गरमा दिया है। इस बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो देशों से खुलकर सैन्य सहयोग मांगा, लेकिन यूरोप के कई सहयोगियों ने इस मांग से दूरी बना ली। कुछ देशों ने साफ कहा कि यह उनकी जंग नहीं है, जबकि कुछ ने कानूनी और रणनीतिक कारणों का हवाला दिया।

ट्रंप ने इस रुख पर नाराज़गी जताते हुए उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) को “पेपर टाइगर” तक कह दिया और यहां तक संकेत दे दिए कि अमेरिका गठबंधन से बाहर भी जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर सहयोगी देशों ने ट्रंप की बात क्यों नहीं मानी? और क्या इस विवाद से नाटो जैसा बड़ा सैन्य गठबंधन कमजोर पड़ सकता है?

77 साल पुराना सैन्य गठबंधन है नाटो

नाटो की स्थापना 4 अप्रैल 1949 को हुई थी। इसे वॉशिंगटन संधि के तहत बनाया गया था। इसके शुरुआती सदस्य देशों में अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और बेल्जियम जैसे देश शामिल थे।

आज यह गठबंधन बढ़कर 32 देशों का हो चुका है। संगठन का मुख्य सिद्धांत यह है कि यदि किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है, तो उसे सभी देशों पर हमला माना जाएगा। इस सिद्धांत को नाटो के अनुच्छेद 5 में शामिल किया गया है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप में स्थायी शांति और सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस गठबंधन की नींव रखी गई थी। इसका मुख्यालय बेल्जियम की राजधानी Brussels में स्थित है।

ट्रंप की मांग पर सहयोगियों ने क्यों बनाई दूरी?

1. “यह हमारी जंग नहीं है”

यूरोप के कई नेताओं ने साफ संकेत दिया कि वे अमेरिका-ईरान संघर्ष में सीधे पक्ष नहीं बनना चाहते। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने कहा कि यह संघर्ष उनके राष्ट्रीय हितों से जुड़ा नहीं है। यूरोपीय देशों का मानना है कि अमेरिका के रणनीतिक लक्ष्य और उनके राष्ट्रीय हित हमेशा एक जैसे नहीं होते।

2. घरेलू राजनीति और जनता का दबाव

यूरोप के कई देशों में जनता मध्य-पूर्व के युद्धों से दूरी बनाए रखने के पक्ष में रहती है। सरकारों को डर है कि युद्ध में शामिल होने से चुनावी नुकसान हो सकता है। इसलिए वे केवल सीमित और रक्षात्मक भूमिका निभाना चाहते हैं।

3. कानूनी और नीति संबंधी बाधाएं

यूरोप के कई देशों में विदेशी सैन्य कार्रवाई के लिए संसद या गठबंधन सरकार की मंजूरी जरूरी होती है। ऐसे में तुरंत किसी युद्ध में शामिल होने का फैसला लेना आसान नहीं होता। कई सरकारें यह भी तय करती हैं कि उनके सैन्य अड्डों का उपयोग किस प्रकार की कार्रवाई के लिए होगा।

किस देश ने क्या कहा?

ट्रंप की नाराज़गी का सबसे बड़ा कारण यूरोप के सैन्य अड्डों और एयरस्पेस का इस्तेमाल न मिलना रहा।

  • स्पेन ने कहा कि वह अपने हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल उन अमेरिकी विमानों के लिए नहीं होने देगा जो इस युद्ध में शामिल हैं।
  • फ्रांस ने उन सैन्य विमानों को अपनी भूमि से गुजरने की अनुमति नहीं दी जो इज़रायल के लिए सैन्य सप्लाई लेकर जा रहे थे।
  • ब्रिटेन ने कहा कि बेस का उपयोग हो सकता है, लेकिन केवल रक्षात्मक उद्देश्य के लिए।
  • इटली ने इस मुद्दे पर सतर्क रुख अपनाया और किसी भी बड़े सैन्य सहयोग की पुष्टि नहीं की।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर भी सहयोगियों ने कहा ‘ना’

मध्य-पूर्व का होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल और गैस सप्लाई का सबसे अहम समुद्री रास्ता माना जाता है। अमेरिका चाहता था कि नाटो देश वहां नौसैनिक गठबंधन बनाकर तैनाती करें। लेकिन फ्रांस, ब्रिटेन, ग्रीस और इटली जैसे देशों ने इस प्रस्ताव को जोखिम भरा बताया। जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने भी सवाल उठाया कि क्या यूरोप की कुछ युद्धपोत वह काम कर सकते हैं जो अमेरिकी नौसेना खुद नहीं कर पा रही।

क्या ट्रंप सच में नाटो छोड़ सकते हैं?

सवाल उठता है कि क्या ट्रंप के गुस्से से नाटो टूट सकता है। इसका सीधा जवाब “नहीं” है। नाटो एक मजबूत संस्थागत ढांचा है, जो 77 साल में लगातार विस्तार करता रहा है। किसी एक नेता के बयान से इसे खत्म करना आसान नहीं है। हालांकि यदि अमेरिका गठबंधन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता कम करता है, तो इससे सहयोगियों का भरोसा कमजोर हो सकता है। इसका असर संयुक्त सैन्य योजनाओं और संकट के समय सामूहिक प्रतिक्रिया पर पड़ सकता है।

आगे क्या हो सकता है?

आने वाले समय में अमेरिका और यूरोप के बीच रणनीतिक मतभेद और खुलकर सामने आ सकते हैं। यूरोपीय देश चाहते हैं कि उनकी भूमिका अपने क्षेत्र की सुरक्षा तक सीमित रहे, जबकि अमेरिका चाहता है कि सहयोगी देश वैश्विक सैन्य अभियानों में भी सक्रिय भूमिका निभाएं। यदि सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप जारी रहे, तो इससे गठबंधन की एकता कमजोर हो सकती है और विरोधी देशों को राजनीतिक फायदा मिल सकता है।

ईरान-अमेरिका तनाव के बीच नाटो देशों का रुख यह दिखाता है कि वैश्विक गठबंधन हमेशा एक जैसी प्राथमिकताओं पर नहीं चलते। यूरोप के कई देशों ने इस संघर्ष को अपनी लड़ाई नहीं माना, जबकि घरेलू राजनीति, कानूनी बाधाएं और रणनीतिक जोखिम भी उनके फैसले के पीछे अहम कारण रहे।

ट्रंप की नाराज़गी भले ही गठबंधन को तुरंत खत्म न करे, लेकिन इससे नाटो के भीतर भरोसे और तालमेल पर असर पड़ सकता है। आने वाले समय में यही सवाल तय करेगा कि दुनिया का यह सबसे बड़ा सैन्य गठबंधन कितनी मजबूती से एकजुट रह पाता है।

यह भी पढ़ें: कार में पुलिस की वर्दी, बेल्ट और कैप! कौन है कानपुर सेक्स रैकेट का मास्टरमाइंड रोहित वर्मा?

Related Articles

Back to top button