गुजरात लॉबी में ‘अपनों का संग्राम’ | ब्राह्मण फरमान से संकट में BJP? 

गुजरात की सियासत में अंदरूनी संग्राम खुलकर सामने आ गया है... UGC से जुड़ा मामला सरकार के लिए गले की फांस बनता जा रहा है...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः भारतीय जनता पार्टी इन दिनों ‘अपनों’ के निशाने पर है.. जिस वर्ग को बीजेपी का कोर वोटर कहा जाता है.. वही वर्ग, सबसे मुखर होकर बीजेपी की आलोचना कर रहा है.. पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति करने वाले राजनीतिक दल, बीजेपी को सवर्णों की पार्टी बताते रहे हैं.. अब यही सवर्ण बीजेपी से नाराज हैं.. भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी एक बड़ा धड़ा ऐसा है.. जिसे अब शीर्ष नेतृत्व के कुछ फैसले रास नहीं आ रहे हैं.. बीजेपी एक-दो मुद्दों पर नहीं बल्कि कई मुद्दों पर एकसाथ घिरी है.. विपक्षी ही नहीं, पार्टी के अपने नेता भी मुखर होकर विरोध कर रहे हैं.. यूजीसी की नई नियमावली, शंकराचार्य अवमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों के साथ झड़प, काशी में कॉरिडोर के नाम पर तोड़फोड़.. और ब्राह्मण विधायकों की आलोचना पर बीजेपी ऐसे घिरी है कि अब पार्टी की हर तरफ किरकिरी हो रही है..

बीजेपी सिर्फ सवर्णों के निशाने पर ही नहीं है, उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में ओबीसी राजनीति करने वाली पार्टियां भी शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद.. और काशी के मुद्दे पर बीजेपी के खिलाफ मुखरित होकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रही हैं.. बीजेपी के प्रति उदार रवैया रखने वाले कुमार विश्वास हों या उत्तर प्रदेश के बीजेपी विधायक प्रतीक भूषण सिंह, सबने मुखर होकर यूजीसी मुद्दे पर सरकार के खिलाफ बोला है.. और एक बार फिर से अपने रुख में बदलाव करने के लिए कहा है..

वहीं यह सिर्फ एक मुद्दा है.. प्रतीक भीषण के पिता बृजभूषण शरण सिंह ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों के साथ प्रयागराज में यूपी प्रशासन के टकराव पर भले ही मुखर होकर कुछ नहीं कहा है.. लेकिन उन्होंने इशारा जरूर किया है कि सरकार ठीक नहीं कर रही है.. द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंदर सरस्वती भी संतों से न उलझने की नसीहत सरकार को दे चुके हैं.. आखिर बीजेपी से हर किसी को शिकायत क्यों है, समझते हैं..

आपको बता दें कि उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) नई नियमावली ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूट्स 2026’ लेकर आई है.. जिसका सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है.. इस नियमावली को देशभर में हंगामा मचा है.. सवर्ण छात्रों और नेताओं का कहना है कि संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोने के लिए लाए गए ये नियम, सवर्णों के गले की फांस बन जाएंगे..

 

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