अपने ही मंत्री से योगी ने छीन ली बड़ी जिम्मेदारी, एक्सप्रेस-वे विभाग जाते ही तिलमिलाए नंद गोपाल नंदी, अखिलेश ने कसा तंज!

उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी को बड़ा झटका लगा है। योगी सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए उनके पास मौजूद औद्योगिक विकास मंत्रालय से एक्सप्रेस-वे विभाग की जिम्मेदारी वापस ले ली है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सूबे की सियासत में एक बार फिर भूंचाल आ गया है। योगी ने एक बार फिर अपने ही मंत्री का का पत्ता साफ़ कर दिया है। इस खबर के सामने आते ही सियासी गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। कोई योगी को खुद ही के नेताओं का विरोधी कह रहा है तो कोई तानाशाह बता रहा है।

दरअसल उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी को बड़ा झटका लगा है। योगी सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए उनके पास मौजूद औद्योगिक विकास मंत्रालय से एक्सप्रेस-वे विभाग की जिम्मेदारी वापस ले ली है। अब एक्सप्रेस-वे के निर्माण और विकास से जुड़ी यह बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ संभालेंगे।

गौरतलब है कि सचिवालय प्रशासन द्वारा जारी आधिकारिक आदेश के अनुसार, उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज औद्योगिक विकास प्राधिकरण को अब अवस्थापना विकास विभाग के साथ जोड़ दिया गया है, जो कि सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अधीन आता है।

यानी अब यूपीडा सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय को रिपोर्ट करेगा। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि सरकार के भीतर यह बड़ा संगठनात्मक परिवर्तन बीते 27 मई को ही कर दिया गया था, लेकिन इसके आधिकारिक आदेश अब सार्वजनिक हुए हैं। अब इस खबर के सामने आने के बाद सियासी हलचल बढ़ गई है।

वहीं इसे लेकर आलोचकों का कहना है कि अगर मुख्यमंत्री को खुद ही विभाग संभालना पड़ रहा है, तो इसका मतलब है कि सरकार अपने मंत्रियों पर पूरा भरोसा नहीं कर पा रही है। इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या सरकार के भीतर आपसी तालमेल में बेहद कमी आ गई है सवाल यह भी है कि क्या प्रशासनिक व्यवस्था ठीक से काम नहीं कर रही है।

नंद गोपाल नंदी पहले भी अधिकारियों के रवैये को लेकर नाराजगी जता चुके हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि कई महत्वपूर्ण फाइलें लंबे समय से रोकी जा रही हैं और मंत्रियों के निर्देशों का पालन नहीं हो रहा है। इससे यह धारणा बनी कि सरकार के भीतर अफसरशाही और जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल की समस्या मौजूद है।

सवाल यह भी बनता है की क्या नंद गोपाल नंदी की बातें अधिकारी योगी के इशारे ओर नहीं सुनते थे ? खैर सवाल यह भी है कि अगर एक कैबिनेट मंत्री को ही अपनी बात मनवाने के लिए मुख्यमंत्री को पत्र लिखना पड़े, तो यह शासन व्यवस्था की कमजोरी को दिखता है। ऐसे में नंदी से विभाग वापस लेना समस्या का समाधान नहीं बल्कि उसके लक्षणों को छिपाने जैसा कदम माना जा सकता है। वहीं इसे लेकर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मंत्री नंदी से यूपीडा विभाग लिए जाने पर बीजेपी पर तंज कसा है.

उन्होंने एक्स पर पोस्ट करते हुए कि जब भ्रष्टाचार और आपसी लेनदेन का टारगेट पूरा हो गया तो उन्हें हटा दिया गया. अखिलेश ने लिखा- ‘अभी हाफ़ हुए हैं, विधानसभा में टिकट नहीं मिलेगा तो साफ़ हो जाएंगे. जब सारे ‘घटिया एक्सप्रेसवे’ बन गये और भ्रष्टाचार का आपसी लेनदेन का टारगेट पूरा हो गया तब हटाया तो क्या हटाया?’ सुना है इलाहाबाद की सारी सीटों पर भाजपा अपने प्रत्याशी बदलने जा रही है क्योंकि भाजपा को लगता है कि ये सारे विधायक और प्रत्याशी केवल खाने-कमाने में लगे रहे और लोकसभा सीट हाथ से निकल गई।

यही फ़ार्मूला उप्र की उन सभी 43 लोकसभा सीटों पर लागू किया जा रहा है जहाँ इंडिया गठबंधन की जीत हुई थी और बाक़ी उन 9-10 सीटों पर भी जहाँ भाजपा हेरफेर करके सर्टिफ़िकेट से जीती थी, वोट से नहीं। इसका मतलब तो ये हुआ कि लगभग 225 सीटों पर प्रत्याशी बदले जाएंगे।

वैसे तो सुना है कि भाजपा के वर्तमान विधायक ख़ुद भी चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं क्योंकि ‘पीडीए’ के सामने उनके जीतने की कोई भी उम्मीद नहीं बची है। भाजपा के मूल वोटर अब एक-चौथाई भी नहीं रह गये हैं, इसीलिए भाजपा के वर्तमान विधायक हारे हुए चुनाव में अपनी कमाई ख़र्च नहीं करना चाहते हैं बल्कि बाक़ी जीवन के लिए पैसे बचाकर रखना चाहते हैं क्योंकि उनको ये भी पता है कि इस बार भाजपा पक्का जाएगी और फिर कभी नहीं आएगी।

दरअसल भाजपा के वर्तमान विधायकों ने जनता के आक्रोश को पढ़ लिया है क्योंकि भाजपा की महा-भ्रष्ट, बेईमान और दमनकारी नीतियों की वजह से आई हर तरह की दिक़्क़तों जैसे दिनदहाड़े की लूट, रंगदारी, हत्या, ज़मीनों की क़ब्ज़ेबाज़ी, घूसख़ोरी-कमीशनख़ोरी, महंगाई, बेरोज़गारी, पीडीए पर अत्याचार, पक्षपात, सांप्रदायिक राजनीति की वजह से हो रही नाइंसाफ़ी, पेपर लीक, संविधान की अवहेलना, आरक्षण की हक़मारी, युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ व महिलाओं के प्रति बेतहाशा बढ़ते अपराध, चुनावी हेराफेरी और चंदा-चढ़ावा चोरी की वजह से जन-जन का गुस्सा उबाल-उफ़ान पर आ चुका है।

कुल मिलाकर इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या सत्ता का सुख भोगने के लिए अपनों का ही पत्ता साफ़ करना कितना सही है? जब अधिक से अधिक विभाग सीधे मुख्यमंत्री के नियंत्रण में आ जाते हैं, तो अन्य मंत्रियों की भूमिका सीमित दिखाई देने लगती है।

लेकिन सवाल एक यह भी है कि अगर योगी ऐसे ही अपने ही मंत्रियों का पत्ता साफ करते रहे तो आगामी चुनावी में इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। यह बात भी किसी से छुपी नहीं है कि योगी और अमित शाह के बीच किस कदर ताना-तनी चल रही है। और ऐसे में योगी का अपने ही मंत्रियों पर ऐसा बर्ताव कहीं उनका चमकता राजनीतिक कैरियर न ले डूबे।

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