आरोप गढ़ने वाले तंत्र की हार’ 84 दंगों के आरोप से बरी हुए सज्जन

- सिस्टम ने शक बोया समाज ने नफरत काटी और कोर्ट ने पूछा सबूत कहां है?
- 1984 दंगों की राजनीति न्यायिक लड़ाइयों और सार्वजनिक बहस का केंद्र रहे सज्जन कुमार
- प्रणव राय, राहुल गांधी अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और ममता बनर्जी पर भी लगे गंभीर आरोपों के दाग कोर्ट ने धुले
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े एक मामले में कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार को गुरुवार को बड़ी कानूनी राहत मिली है। दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत ने उन्हें उस केस में बरी कर दिया, जिसमें उन पर जनकपुरी और विकासपुरी इलाकों में भीड़ को हिंसा के लिए उकसाने का आरोप था। विशेष न्यायाधीश दिग्विजय सिंह ने यह फैसला सुनाया। अदालत ने इससे पहले दिसंबर में सभी पक्षों की सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा था जिसे अब सार्वजनिक किया गया है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब सज्जन कुमार का नाम दशकों से 1984 दंगों की राजनीति न्यायिक लड़ाइयों और सार्वजनिक बहस का केंद्र रहा है। अदालत ने जिस मामले में उन्हें राहत दी है उसमें अभियोजन पक्ष आरोपों को न्यायिक कसौटी पर साबित करने में सफल नहीं हो सका।
सुप्रीम कोर्ट जाएंगे पीडि़त
फैसले के बाद पीडि़त परिवारों की पीड़ा एक बार फिर सामने आई। कुछ पीडि़त परिवारों ने उच्च न्यायालय का रुख करने की बात कही है। गौरतलब है कि 1984 का प्रश्न केवल कानूनी नहीं बल्कि गहरे सामाजिक और नैतिक घावों से जुड़ा है। आज के इस फैसले ने एक व्यापक बहस को भी फिर से जिंदा कर दिया है कि क्या भारत में कुछ मामलों में आरोपों का सार्वजनिक जीवन पर प्रभाव अदालतों के अंतिम निर्णय से पहले ही तय हो जाता है? क्या जांच एजेंसियों और मीडिया के जरिये किसी व्यक्ति को लंबे समय तक दोषी की तरह प्रस्तुत किया जाना बाद में अदालत से राहत मिलने के बाद भी उसकी सामाजिक छवि को ठीक कर पाता है?
आरोप और सबूत के बीच की दूरी
पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जहां बड़े नामों पर ईडी सीबीआई या अन्य एजेंसियों ने गंभीर आरोप लगाए लंबे समय तक जांच भी चली और मीडिया प्लेटफार्म पर तीखी बहस भी हुई। लेकिन अंतत: अदालतों में या तो राहत मिली या आरोप साबित नहीं हो सके। सज्जन कुमार के ताजा फैसले ने इसी सवाल को एक बार फिर केंद्र में ला खड़ा किया है कि आरोप और सबूत के बीच की दूरी लोकतंत्र में कितनी निर्णायक होती है।
प्रणव, राधिका राय और अन्य पर भी आरोप
एनडीटीवी के संस्थापक प्रणव राय और राधिका राय का मामला इसी बहस का एक अहम उदाहरण माना जा सकता है। सीबीआई और ईडी ने वर्षों तक इन लोगों पर बैंक लोन और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े गंभीर आरोप लगाए। इस दौरान मीडिया में लगातार खबरें चलीं और एनडीटीवी को सरकारी एजेंसियों के निशाने पर बताया गया। लेकिन लंबी जांच के बाद सीबीआई ने स्वयं अदालत में यह कहते हुए केस बंद करने की मांग की कि आरोपों को आगे बढ़ाने लायक सबूत नहीं हैं। अदालत ने इस क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार किया। कानूनी तौर पर यह साफ संकेत था कि जिन आरोपों ने लंबे समय तक सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित किया वह न्यायिक कसौटी पर टिक नहीं पाए।
सोनम वागचुक व खालिद अभी भी जेल में बंद
उमर खालिद पिछले कई वर्षों से जेल में हैं। दिल्ली दंगों के मामले में यूएपीए जैसे कठोर कानून के तहत आरोप तय किए गए लेकिन मुकदमे की रफ्तार सुस्त है। अभी तक न सज़ा हुई है न दोष सिद्ध फिर भी आजादी नहीं। सवाल यह नहीं कि आरोप लगे या नहीं सवाल यह है कि क्या लंबी कैद अपने आप में सजा नहीं बन जाती? अदालतों ने बार-बार कहा है कि जमानत नियम है जेल अपवाद पर खालिद के मामले में अपवाद ही नियम बनता दिखा। सोनम वांगचुक लद्दाख के पर्यावरणविद्, शिक्षाविद् और शांतिपूर्ण आंदोलनकारी है वह भी जेल में बंद है। उनकी आवाज बार-बार हिरासत प्रतिबंधों और मुकदमों के साये में घिरी है। संविधान के दायरे में बैठकर मांगें रखने वाले व्यक्ति को बार बार रोका जाना यह सवाल खड़ा करता है कि क्या असहमति अब सुरक्षा समस्या बन चुकी है? वांगचुक का अपराध बस इतना है कि उन्होंने विकास, पर्यावरण और लद्दाख के संवैधानिक अधिकारों पर सवाल उठाए। इन दोनों मामलों को जोडऩे वाली डोर साफ़ है राज्य बनाम असहमति। जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलता तब तक उमर खालिद की जेल और सोनम वांगचुक पर लगा शिकंजा दोनों मिलकर उस सलेक्टिव न्याय की कहानी कहते रहेंगे जिसे सिस्टम सामान्य मान चुका है।
राहुल गांधी और अन्य भी घिरे रहे
राहुल गांधी के खिलाफ भी बीते वर्षों में कई आपराधिक और मानहानि से जुड़े मामले दर्ज हुए। सबसे चर्चित मोदी सरनेम मानहानि मामले में निचली अदालत से सजा के बाद उनकी संसद सदस्यता चली गई लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस सजा पर रोक लगाई और स्पष्ट किया कि दोषसिद्धि पर गंभीर सवाल हैं। कानूनी प्रक्रिया में यह राहत निर्णायक मानी गई। इसी तरह पी. चिदंबरम, कार्ती चिदंबरम, तेजस्वी यादव और अन्य कई नेताओं पर एजेंसियों ने बड़े आरोप लगाए। लंबी पूछताछ, गिरफ़्तारी, मीडिया ट्रायल सब कुछ हुआ। लेकिन इनमें से कई मामलों में या तो जमानत मिली या ट्रायल लंबित है या आरोप अब तक सिद्ध नहीं हो सके। आरोप लगना और आरोप सिद्ध होना दो अलग बातें हैं। अदालतें बार बार यह रेखांकित करती रही हैं कि लोकतंत्र में किसी व्यक्ति की दोषिता का फैसला जांच एजेंसियां या मीडिया नहीं बल्कि न्यायालय करता है।




