Election Commission ने किया बड़ा बदलाव, WB में चुनाव से पहले तारीखों में फेर-बदल।
I-PAC जोकि सीएम ममता बनर्जी की पार्टी TMC की चुनावी रणनीति और पार्टी से जुड़े तमाम कामों के लिए जानी जाती है...उसी I-PAC के कार्यालय पर ED ने छापेमारी की

4पीएम न्यूज नेटवर्क: अब से महज कुछ महीने बाद होने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर पश्चिम बंगाल में ED से लेकर चुनाव आयोग अभी से सक्रिया हो गया है…जहां बीते दिनों आप ने देखा ही था कि कैसे ED ने I-PAC के कार्यालय पर छापेमारी की थी..
वही I-PAC जोकि सीएम ममता बनर्जी की पार्टी TMC की चुनावी रणनीति और पार्टी से जुड़े तमाम कामों के लिए जानी जाती है…उसी I-PAC के कार्यालय पर ED ने छापेमारी की…तो वहीं अब चुनाव आयोग ने SIR को लेकर बड़ा फैसला लेते हुए SIR की टाइमलाइन बदल दी है…जिससे भारी विवाद खड़ा हो गया है…और अपने इस फैसले से चुनाव आयोग अब बुरी तरह से फंस गया है…और ऐसा फंसा है कि जनता जवाल पूछ रही है क्या चुनाव आयोग और ED ये सब कुछ किसी के इशारे पर कर रहा है?…
दरअसल, 27 अक्टूबर 2025 को जब चुनाव आयोग ने पूरे देश में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR कराने का ऐलान किया था…तब इसे एक रूटीन प्रक्रिया बताकर INTRODUCE किया गया…कहा गया कि मतदाता सूची को शुद्ध किया जाएगा….फर्जी वोटरों को हटाया जाएगा और लोकतंत्र को मजबूत किया जाएगा….लेकिन अब, जैसे-जैसे SIR की तारीखें बार-बार बढ़ाई जा रही हैं…वैसे-वैसे ये सवाल ज़ोर पकड़ता जा रहा है कि…क्या ये प्रक्रिया लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए है या लोकतंत्र को मैनेज करने के लिए?…
देश के 12 राज्यों में SIR की शुरुआत हुई…ड्राफ्ट लिस्ट भी जारी कर दी गई…लेकिन उसके बाद जो हुआ उसने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर ही बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है….कभी दावे-आपत्तियों की तारीख बढ़ाई जाती है…तो कभी तकनीकी कारण बताए जाते हैं और कभी राज्य अधिकारियों के अनुरोध का हवाला दे दिया जाता है…..अब एक बार फिर पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों….गोवा, लक्षद्वीप, राजस्थान और पुडुचेरी में SIR की समय सीमा बढ़ा दी गई है…अब 19 जनवरी तक दावे और आपत्तियां दाखिल की जाएंगी…
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर चुनाव आयोग इतना सक्षम, इतना तैयार और इतना स्वतंत्र है…तो उसे बार-बार अपनी ही तय की गई समय-सीमा क्यों बदलनी पड़ रही है?….क्या आयोग को पहले से अंदाजा नहीं था कि कितने दावे और आपत्तियां आएंगी?…या फिर ये देरी जानबूझकर की जा रही है?….राजनीतिक गलियारों में अब ये चर्चा आम हो चुकी है कि SIR की प्रक्रिया को जानबूझकर खींचा जा रहा है…ताकि अंतिम मतदाता सूची चुनाव के बिल्कुल करीब जारी हो और उस पर सवाल उठाने का वक्त ही न बचे…ये वही पुराना तरीका है….जिसमें काम आखिरी वक्त तक लटकाओ और फिर कह दो कि अब बहुत देर हो चुकी है….
अगर गौर से देखा जाए…तो SIR की सबसे ज्यादा चर्चा पश्चिम बंगाल को लेकर ही हो रही है और ऐसा होना कोई संयोग नहीं है…2026 में पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं और बीजेपी के लिए ये राज्य लंबे समय से सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बना हुआ है….लगातार दो चुनावों में हार झेलने के बाद बीजेपी अब खुलकर कह रही है कि इस बार चूक नहीं होगी………..ऐसे में सवाल ये है कि क्या ये चूक न होने की तैयारी…चुनाव मैदान में हो रही है या फिर चुनाव आयोग के दफ्तरों में?….
विपक्षी दलों, खासकर TMC का आरोप है कि SIR के बहाने वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ की तैयारी की जा रही है…खास इलाकों, खास समुदायों और खास वर्गों के नाम काटने या उलझाने की कोशिश हो रही है…ताकि चुनावी गणित बदला जा सके…
एक समय था जब चुनाव आयोग को लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता था….उसकी एक प्रेस रिलीज से सरकारें कांप जाया करती थीं…लेकिन अब विपक्ष खुलकर कह रहा है कि चुनाव आयोग अपनी रीढ़ खो चुका है….वो मोदी सरकार के सहायक के रुप में काम कर रहा है…सीधे-सीधे आरोप लगाए जा रहे हैं कि आयोग बीजेपी के इशारे पर काम कर रहा है…जहां बीजेपी को फायदा दिखता है…वहां नियमों की सख्ती बढ़ जाती है और जहां नुकसान का डर होता है….वहां नियमों की परिभाषा बदल दी जाती है…
SIR की बार-बार बढ़ती तारीखें इसी शक को और गहरा कर रही हैं….विपक्ष पूछ रहा है कि अगर ये सब राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों के अनुरोध पर हो रहा है…तो उन अनुरोधों को सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?…आखिर छिपाया क्या जा रहा है?………SIR की प्रक्रिया का सबसे बड़ा असर उन लोगों पर पड़ रहा है…जिनके पास कागज़ात पूरे नहीं हैं…जैसे कि गरीब, प्रवासी मजदूर, झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोग और अल्पसंख्यक समुदाय…..इन सबको लेकर विपक्ष का आरोप है कि यही वो वर्ग हैं…जिन्हें कथिततौर पर वोटर लिस्ट से बाहर करने की सबसे आसान कोशिश की जा सकती है…
जबकि, बार-बार तारीखें बढ़ाने से ये भ्रम और बढ़ रहा है…..लोग समझ ही नहीं पा रहे कि कब, कैसे और कौन-से दस्तावेज जमा करने हैं….विपक्ष का कहना है कि ये कोई भूल नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति है…..मतदाता को इतना उलझा दो कि वो प्रक्रिया से ही बाहर हो जाए…….हालांकि, ये पहला मौका नहीं है जब SIR की तारीखें बढ़ाई गई हों…उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में भी ये प्रक्रिया कई बार आगे बढ़ाई जा चुकी है…विपक्ष का कहना है कि ये एक पैटर्न है…जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता……हर उस राज्य में जहां चुनाव नजदीक हैं और जहां मुकाबला कांटे का है….वहां SIR की प्रक्रिया सबसे ज्यादा उलझी हुई नजर आती है……..अब सवाल ये है कि क्या ये महज संयोग है या फिर एक सोची-समझी चाल?…
दिलचस्प बात ये है कि बीजेपी इन आरोपों पर खुलकर सफाई देने से बचती नजर आ रही है….न तो वह चुनाव आयोग की देरी पर सवाल उठाती है और न ही तारीखें बढ़ने पर चिंता जताती है….उल्टा, बीजेपी नेता बार-बार कहते हैं कि जो डरता है वही सवाल उठाता है……जबकि, विपक्ष पूछ रहा है कि अगर बीजेपी को सच में लोकतंत्र पर भरोसा है….तो वो स्वतंत्र जांच और पारदर्शिता की मांग क्यों नहीं करती?….क्यों हर बार चुनाव आयोग के फैसलों का बचाव वही पार्टी करती है….जिसे सत्ता का फायदा मिल रहा है?
गौर करने वाली बात ये भी है कि अंतिम मतदाता सूची फरवरी 2026 में जारी होनी है….यानी चुनाव से ठीक पहले….विपक्ष का आरोप है कि यही वो समय होता है जब किसी भी गड़बड़ी को सुधारने की गुंजाइश लगभग खत्म हो जाती है……पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में….जहां हर वोट की कीमत है….वहां वोटर लिस्ट में मामूली बदलाव भी सत्ता की दिशा तय कर सकता है….विपक्ष इसे सीधे-सीधे संवैधानिक संस्थाओं के जरिए चुनाव जीतने की कोशिश बता रहा है….जिसके बाद ये मामला अब सिर्फ SIR या तारीख बढ़ाने तक सीमित नहीं रहा है…बल्कि, ये मुद्दा चुनाव आयोग की साख, उसकी स्वतंत्रता और उसकी नीयत से जुड़ गया है…..क्योंकि, अगर जनता का भरोसा चुनाव आयोग से उठ गया….तो लोकतंत्र की पूरी इमारत हिल जाएगी…..
विपक्षी दलों की मांग है कि…SIR की पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र निगरानी हो…तारीख बढ़ाने के कारण सार्वजनिक किए जाएं और चुनाव आयोग ये साबित करे कि वो किसी राजनीतिक दबाव में नहीं है……दोस्तों, आज हालात ये हैं कि चुनाव आयोग खुद अपने ही फैसलों में उलझता हुआ नजर आ रहा है…बार-बार तारीखें बढ़ाकर उसने सवालों को शांत करने के बजाय और हवा दे दी है……पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले ये शक और भी ज्यादा गहराता जा रहा है कि कहीं लोकतंत्र को बैलेट से नहीं…..बल्कि फाइलों से मैनेज करने की कोशिश तो नहीं हो रही?…अब निगाहें फरवरी 2026 पर हैं…जब अंतिम वोटर लिस्ट आएगी…उसी दिन ये भी साफ होगा कि SIR सच में सुधार की प्रक्रिया थी या फिर एक बड़ी सियासी चाल…



