UGC कानून को लेकर गरमाई सियासत, यूपी समेत अन्य राज्यों में पारा हाई!
यूजीसी एक्ट के विरोध में यति नरसिंहानंद गिरि ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया है। शुक्रवार को डासना देवी पीठ के पीठाधीश्वर जंतर-मंतर पर एक्ट के विरोध में अनशन करने जा रहे थे। इसी क्रम में उन्हें गाजियाबाद में रोका गया। पुलिस ने उन्हें नजरबंद कर दिया है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: इन दिनों देश में एक मुद्दे को लेकर सियासी बहस छिड़ी हुई है। दरअसल हम बात कर रहे है UGC की, जिसे लेकर कहीं तारीफ हो रही है तो कहीं इसका भारी विरोध हो रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ओर से उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम 2026’ को लागू किया गया है।
यह रेगुलेशन 15 जनवरी 2026 से देश के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू हो गया है। देश की अगड़ी जातियों के लोग इस रेगुलेशन का विरोध कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के शिक्षण संस्थानों में भी इस रेगुलेशन को लागू किया गया है। इसे अब तक शैक्षणिक रूप से महत्वपूर्ण कदम के तौर पर पेश किया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह कानून युवाओं के एक बड़े वर्ग को प्रभावित करेगा। यूपी चुनाव 2027 से पहले अब इस कानून की चर्चा शुरू हो गई है। गाजियाबाद डासना पीठ के पीठाधीश्वर यति नरसिंहानंद गिरि ने इसका विरोध शुरू कर दिया है।
यूजीसी एक्ट के विरोध में यति नरसिंहानंद गिरि ने विरोध प्रदर्शन शुरू किया है। शुक्रवार को डासना देवी पीठ के पीठाधीश्वर जंतर-मंतर पर एक्ट के विरोध में अनशन करने जा रहे थे। इसी क्रम में उन्हें गाजियाबाद में रोका गया। पुलिस ने उन्हें नजरबंद कर दिया है। इस दौरान उन्होंने यूजीसी एक्ट का जोरदार विरोध किया। उन्होंने योगी सरकार पर सवर्ण समाज का मुद्दा उठाने पर रोके जाने का आरोप लगाया। यति नरसिंहानंद को रोकने और नजरबंद किए जाने के बाद मामले पर चर्चा तेज हो गई है। अब तक उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतें मुख्य रूप से एससी और एसटी समुदाय तक सीमित मानी जाती थीं. नए रेगुलेशन के तहत ओबीसी वर्ग को भी स्पष्ट रूप से जातिगत भेदभाव की श्रेणी में शामिल कर लिया गया है. इसका मतलब यह है कि अब ओबीसी छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी अपने साथ होने वाले उत्पीड़न या भेदभाव की शिकायत आधिकारिक रूप से दर्ज करा सकेंगे.
हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में अब एससी, एसटी और ओबीसी के लिए समान अवसर प्रकोष्ठ बनाना अनिवार्य होगा. यूनिवर्सिटी लेवल पर एक समानता समिति गठित की जाएगी. इस समिति में ओबीसी, महिला, एससी, एसटी और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधियों की मौजूदगी जरूरी होगी. समिति हर 6 महीने में रिपोर्ट तैयार कर UGC को भेजेगी. UGC का कहना है कि इससे शिकायतों की निगरानी, जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ेगी. रेगुलेशन लागू होते ही देश के कई हिस्सों में अगड़ी जातियों से जुड़े संगठनों में असंतोष देखने को मिला. विरोध करने वालों का आरोप है कि इस कानून का दुरुपयोग हो सकता है और इसके जरिए अगड़ी जातियों के छात्रों और शिक्षकों को झूठे मामलों में फंसाया जा सकता है. जयपुर में करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा और वैश्य संगठनों ने मिलकर ‘सवर्ण समाज समन्वय समिति (S-4)’ बनाई है, ताकि इस नियम के खिलाफ संगठित आंदोलन किया जा सके.
इसे लेकर न सिर्फ यूपी में बल्कि हर प्रदेश में इसका विरोध हो रहा है। इस रेगुलेशन को लेकर सोशल मीडिया पर भी जबरदस्त बहस चल रही है. अगड़ी जातियों से जुड़े कई यूट्यूबर, इंफ्लुएंसर और एक्टिविस्ट इसे “सवर्ण विरोधी कानून” बता रहे हैं. स्वामी आनंद स्वरूप के एक वीडियो में सवर्ण समाज से एकजुट होने की अपील के बाद बहस और तेज हो गई. वहीं दूसरी ओर सामाजिक न्याय समर्थक इसे बराबरी और सम्मान की दिशा में जरूरी सुधार बता रहे हैं. वहीँ इसे लेकर लोगों का कहना है कि यह कानून सवर्ण समाज को निशाना बनाता है, जबकि समर्थकों का तर्क है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में अब भी वंचित वर्गों की भागीदारी 15 प्रतिशत से कम है. एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम लागू हुए 36 साल बीत जाने के बावजूद उत्पीड़न की घटनाएं खत्म नहीं हुई हैं. ऐसे में UGC का यह कदम उन्हें जरूरी सुधार लगता है.
UGC का नया रेगुलेशन सिर्फ एक शैक्षणिक सुधार नहीं, बल्कि एक सामाजिक और राजनीतिक बहस बन चुका है. यूपी चुनाव 2027 से पहले यह मुद्दा और तेज हो सकता है. सवाल यही है कि क्या यह कानून वाकई समानता की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा या फिर सामाजिक ध्रुवीकरण को और गहरा करेगा. आने वाले महीनों में इसका असर सिर्फ कैंपस तक नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति तक भी साफ दिख सकता है.



