घर-घर शुरू हुआ BJP हटाओ अभियान, विपक्ष ने तेज किया जनसंपर्क

बीजेपी जो सवर्ण समाज को अपनी जागीर समझती थी, आज उसी समाज ने सत्ता के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया है। कहीं अमित शाह की फोटो को जूतों से पीट रही है तो कहीं घरों पर लगे बीजेपी के झंडे उखाड़ फेंके जा रहे हैं.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: सिंहासन खाली करो कि जनता आती है, राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर की ये कविता एक बार फिर से जीवंत होती दिख रही है। साल 1974 में जब जय प्रकाश नरायण ने इस लाइन को अपना मार्गदर्शक मानकर आंदोलन किया था तो देश की इंदिरा हकूमत को उखाड़ फेंका था।

और अब इसी रास्ते पर देश के सामान्य वर्ग का जेन जी आगे बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। और इस बार जेन जी के निशाने पर सीधे बीजेपी है। वही बीजेपी जो सवर्ण समाज को अपनी जागीर समझती थी, आज उसी समाज ने सत्ता के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया है। कहीं अमित शाह की फोटो को जूतों से पीट रही है तो कहीं घरों पर लगे बीजेपी के झंडे उखाड़ फेंके जा रहे हैं और इस सबके बीच सबसे चौंका देने खबर है बरेली महानगर से आई है, सिटी मजिस्ट्रेट जैसे अहम पद पर विराजमान एक अफसर ने बीजेपी के दो बड़े फैसले यूजीसी नियमों में हुआ बदलाव और जगदगुरु स्वामी शंकराचार्य के अपमान के विरोध में अपनी नौकरी से ही इस्तीफा दे दिया है।

जिससे कि पूरे देश में न सिर्फ एक बहुत बड़ा मैसेज गया है बल्कि सरकार के हाथ पांव भी फूल गए हैं। कैसे बीजेपी पूरे मामले में बुरा फंसती जा रही है और कैसे इसका बड़ा और दूरगामी असर होना तय माना जा रहा है, मोदी सरकार के मंत्री और उसके जुड़े संगठन अक्सर ये दावा करते हैं कि देश में अमृत काल चल रहा है। रामराज आ गया है लेकिन शहर की सड़कों से लेकर गांव की पगडंडियों तक हर ओर भयंकर रार तकरार देखी जा रही है। केंद्र की मोदी सरकार अचानक यूजीसी का नया नियम लाई है।

नियम इतना अजीब है कि ये किसी को गले नहीं उतर रहा है। जैसे ही ये नियम देश के अपर कास्ट के जेन-जी तक पहुंचा है, हर ओर धरना प्रदर्शन का दौर शुरु हो गया है। जो युवा संगठन अब तक बीजेपी और मोदी की भक्ति में सराबोर थे वो अचानक पीएम मोदी और उनके चाणक्य जी के फोटोज पर जूतों की पिटाई करने लगे हैं। कई जगहों पर जेन जी इतना आक्रोशित हैं कि बीजेपी का झंडा जला रहे हैं तो कहीं बीजेपी के झंडों को अपने घरों से उतार कर फेंक रहे हैं और सबसे अहम बात ये है कि सिर्फ कुछ जगहों या घरों तक सीमित नहीं है बल्कि पूरी देश से इसी तरह से रिएक्शन आ रहे हैं।

पिछले 12 सालों से मोदी सरकार देश के लोगों को हिंदू एकता, हिंदू अखंडता के नाम पर बरगला कर वोट बटोर रही थी लेकिन जैसे जैसे समय बीत रहा है, सरकार की झूठी पोल पट्टी खुलती हुई दिखाई दे रही है। नौकरी के नाम पर लाठियां, पेपर लीक का अंतहीन सिलसिला और भविष्य की असुरक्षा ने इन युवाओं के सब्र का बांध तोड़ दिया है। कहां पहले पीएम मोदी नारा लगाया करते थे कि एक हैं तो सेफ हैं। तो वहीं अब हाल यह हो गया है कि यूजीसी के नए नियम में सवर्ण वर्ग के लोगों को सीधे झुकाने और गिराने की कोशिश शुरु हो गई है। और ये युवा कह रहे हैं कि हमें बड़े-बड़े विज्ञापनों वाला विकास? नहीं, बल्कि वो हक चाहिए जिसे सरकार ने छीन लिया है।

अपर कास्ट का जेन जी इस बात पर नाराज है कि यूजीसी के नए नियमों में भेदभाव की शिकायत करने का अधिकार मुख्य रूप से केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और दिव्यांग व्यक्तियों के छात्रों को दिया गया है, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों को समान सुरक्षा नहीं मिलती है। दावा किया जा रहा कि यूजीसी में भेदभाव की परिभाषा बहुत व्यापक रखी गई है, जिसमें परोक्ष और प्रत्यक्ष व्यवहार भी शामिल है, जिनकी कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं है।

आलोचकों का तर्क है कि इससे झूठी शिकायतें हो सकती हैं और शिक्षकों को प्रशासनिक फैसले लेने में डर लगेगा कि कहीं वे कानूनी पचड़े में न फंस जाएं। साथ ही नियमों में झूठी या फर्जी शिकायतों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई या सुरक्षा उपायों का प्रावधान नहीं है, जिससे दुरुपयोग का भय पैदा होता है।  इसी वजह से सड़कों से लेकर यूनिवर्सिटीज तक भयंकर विरोध हो रहा है। हालांकि पूरे मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका भी दायर हो गई है। इसमें तर्क दिया गया है कि ये नियम संविधान के अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और अनुच्छेद 15 का उल्लंघन करते हैं, क्योंकि वे सभी नागरिकों को समान अधिकार नहीं देते हैं। हालांकि अभी रिट मंजूर नहीं हुई है लेकिन जेन जी लंबी लड़ाई लड़ने की तैयारी के लिए तैयार हो चुका है।

ये मामला सिर्फ जेन जी तक ही नहीं है बल्कि बरेली के सिटी मजिस्ट्र्रेट अंलकार अग्निहोत्री के इस्तीफे के रुप में आया है। अंलकार ने न सिर्फ अपना इस्तीफा दिया है बल्कि सरेआम ये बात मीडिया के सामने कही है कि बीजेपी का रवैया पिछले दो तीन साल से पूरी तरह से ब्राहमण विरोधी है और ये बढ़ता ही जा रहा है। पीएम मोदी को केंद्र की सत्ता में आने से पहले बीजेपी हिंदी भाषी पांच प्रमुख राज्यों में ब्राहमण बनिया पार्टी की मानी जाती थी और आज भी बीजेपी का बेस वोट पांचों हिंदी भाषी राज्यो में यही है। पीएम मोदी के आने से कुछ ओबीसी और एससी के वोट जरुर जुड़े हैं लेकिन आज भी पांच राज्यों में बीजेपी को मूल वोटर्स ब्राहण बनिया और ठाकुर ही है। ऐसे में कहा जा रहा है कि राहुल गांधी का जेन जी जो काम नहीं कर पाए वो सामान्य वर्ग का जेन जी कर सकता है और इसकी शुरुआत घरों से झंडा उतार कर फेंकने और झंडा जलाने से हो चुकी है। और इससे भी दर्दनाक और डराने वाला मंजर तब दिखा, जब राम मंदिर आंदोलन के वो सिपाही सामने आए जिन्होंने 90 के दशक में अपनी छाती पर चार-चार गोलियां खाई थीं।

आज वो कारसेवक, जिन्होंने अपना खून बहाकर मंदिर का रास्ता साफ किया था, हाथों में रुद्राक्ष लेकर प्रण कर रहे हैं कि बीजेपी को सत्ता से उखाड़ फेंकने का। ये वही लोग हैं जिन्होंने बीजेपी को शून्य से शिख तक पहुँचाया। आज वो खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है कि मंदिर तो बन गया, लेकिन राम की मर्यादा को सत्ता के नशे में चूर नेताओं ने कुचल दिया। मोदी सरकार को लग रहा था कि वे धर्म और भावनाओं के नाम पर हर बार सवर्णों को बहला लेंगे। लेकिन लग रहा है कि शायद अब पासा पलट चुका है। सवर्ण समाज अब बीजेपी की वोट बैंक मशीन बनने को तैयार नहीं दिख रहा है। घरों से फेंके जा रहे झंडे और कारसेवकों की आंखों के आंसू इस बात का प्रमाण हैं कि अब ब्रांड मोदी अपर कास्ट को कहीं न कहीं अखरने लगा है।

ऐसे में ये बात पूरी तरह से साफ है कि यूजीसी के नियमों में बदलाव और शंकराचार्य का अपमान कहीं न कहीं मोदी सरकार के लिए जी का जंजाल बनता जा रहा है। एक ओर जहां माघ मेले में लगातार शंकराचार्य जी के धरना स्थल पर भीड़ बढ़ती जा रही है तो वहीं दूसरी ओर यूजीसी के नए नियमों को लेकर जेन जी का गुस्सा फूट पड़ा है, और ये दोनों मामले कहीं न कहीं सरकार की चूल्हें हिला रहे हैं। आपको क्या लगता है कि सरकार को बैकफुट पर नहीं आना चाहिए। क्या यूजीसी के नए नियमों को तुरंत वापस नहीं लिया जाना चाहिए। क्या सरकार ये नियम सिर्फ इसलिए बना रहीे है कि चुनाव में यह साबित कर सके कि वो ओबीसी और एससी समुदाय के साथ खड़ी है।

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