हसनंबा मंदिर: 12वीं सदी का मंदिर, साल में सिर्फ दिवाली पर खुलता है

कर्नाटक के हसन में स्थित हसनंबा मंदिर अपनी रहस्यमयी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है. यह अद्वितीय धार्मिक स्थल साल में केवल एक बार दिवाली के आसपास भक्तों के लिए खुलता है. 12वीं सदी में निर्मित होयसला शैली के इस मंदिर की मुख्य देवी आदि शक्ति हैं.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: कर्नाटक के हसन जिले में स्थित हसनंबा मंदिर अपनी अनोखी और रहस्यमयी परंपराओं के लिए जाना जाता है। यह मंदिर 12वीं सदी में होयसला शैली में निर्मित किया गया था और इसकी मुख्य देवी आदि शक्ति हैं।

मंदिर का निर्माण लगभग 800 साल पहले हुआ था और यह अपने इतिहास और परंपराओं के कारण विशेष महत्व रखता है। हसनंबा मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह साल में केवल एक बार, दिवाली के दिन भक्तों के लिए खुलता है। इस दिन भक्तों की भारी भीड़ मंदिर में दर्शन करने के लिए आती है। मंदिर खुलने का दिन भक्तों के लिए विशेष उत्सव का अवसर होता है और लोग बेसब्री से इस दिन का इंतजार करते हैं। मंदिर की यह परंपरा इसे देशभर में अन्य मंदिरों से अलग और विशेष बनाती है, और भक्त इस अनोखी परंपरा का हिस्सा बनने के लिए हर साल हसन आते हैं।

शिव और रावण की मूर्ति
हसनंबा मंदिर को विशेष रूप से चींटी के टीले के आकार में बनाया गया है. इसकी एक और अद्भुत विशेषता यह है कि यहां रावण की दस सिरों वाली वीणा बजाती हुई मूर्ति है. मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही आपको सिद्धेश्वर स्वामी के दर्शन हो सकते हैं. यहां शिव को लिंग रूप में नहीं बल्कि अर्जुन को पशुपदास्त्र देते हुए दर्शाया गया है.

जब मंदिर खुलता है तो क्या होता है?
दिवाली पर मंदिर खुलते ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं. इस दौरान मंदिर में दो बोरी चावल, पानी और एक घी का दीपक (नंदा दीपम) रखा जाता है. साथ ही साथ उसको फूलों से सजाया जाता है और फिर बंद कर दिया जाता है. इसके बाद मंदिर एक साल बाद ही दोबारा खुलता है. जब मंदिर दोबारा खुलता है, तो चावल पके हुए मिलते हैं और वो उस दिन भी गर्म रहते हैं. वे खराब नहीं होते. नंदा दीपम में रखा घी एक साल तक जलता रहता है. इन्हीं विशेषताओं के कारण यह मंदिर विशेष बन गया है.

हसनंबा मंदिर की कहानी
एक बार सात माताएं कहलाने वाली ब्राह्मी, महेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वरकी, इंद्राणी और चामुंडी दक्षिण भारत आईं और हसन नामक स्थान की सुंदरता देखकर वहीं बसने का निर्णय लिया. महेश्वरी, कौमारी और वैष्णवी मंदिर के भीतर टीलों में रहने लगीं. ब्राह्मी केंजम्मा नामक स्थान पर रहने लगीं. इंद्राणी, वरकी और चामुंडी होंडा नामक स्थान पर एक कुएं में रहने लगीं.

हसनंबा का क्या है अर्थ?
हसनंबा का अर्थ है वह माता जो मुस्कुराते हुए अपने भक्तों को सभी वरदान प्रदान करती हैं. ऐसा माना जाता है कि जो लोग उनके भक्तों को कष्ट पहुंचाते हैं, उन्हें वह कठोर दंड देती हैं. मंदिर को लेकर कहा जाता है कि एक बार हसनंबा की एक भक्त मंदिर में प्रार्थना करने आई. तभी उसकी सास ने उसे बुरी तरह पीटा. जब भक्त ने गिड़गिड़ाकर प्रार्थना की, तो हसनंबा ने उस पर दया दिखाई. उन्होंने अपनी भक्त को पत्थर में बदल दिया और उसे अपने पास रख लिया. इस पत्थर को ‘शोशी कल’ कहा जाता है. शोशी का अर्थ है बहू. ऐसा माना जाता है कि यह पत्थर हर साल चावल के दाने के रूप में हसनंबा की ओर बढ़ता है. कहा जाता है कि यह कलियुग के अंत में हसनंबा तक पहुंचेगा.

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