अमेरिका का जवाब देने के लिए ईरान तैयार, जंगी जहाजों का सामना करेंगे ईरानी ड्रोन?

ईरान का कहना है कि उसने जमीन और समुद्र दोनों से हमला करने में सक्षम 1000 नए स्ट्रेटेजिक ड्रोन तैयार कर लिए हैं और इन्हें अपनी सेना की चारों शाखाओं में तैनात भी कर दिया गया है। मतलब अमेरिका की बड़ी बड़ी मिसाइलों का जवाब ईरान के छोटे छोटे ड्रोन देंगे जिसे अमेरिका हमेशा याद रखेगा।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: मिडिल ईस्ट की हवा में बारूद की गंध तेज होती जा रही है और दुनिया की नजरें अब दो देशों पर टिक गई हैं, अमेरिका और ईरान।

हालात ऐसे मोड़ पर पहुंच चुके हैं जहां जंग अब सिर्फ एक संभावना नहीं बल्कि किसी भी गलत कदम के बाद हकीकत बन सकती है। यानि सिर्फ एक कदम और पूरी दुनिया तबाही का मंदर देखेगी। क्योंकि बयानबाजी अपने सबसे आक्रामक स्तर पर है, सैन्य हलचलें खुलकर हो रही हैं और दोनों पक्ष एक दूसरे को साफ संदेश दे रहे हैं कि वो पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। इसी खतरनाक माहौल के बीच ईरान ने ऐसा दावा किया है जिसने तनाव को कई गुना बढ़ा दिया है। अमेरिका की धमकियों का जवाब देते हुए ईरान ने खुद अपनी ताकत का खुलासा किया जिसके बाद हो सकता है कि ट्रंप अपने कदम वापिस लेेने कि सोचें। तो ईरान ने ऐसा क्या खुलासा किया है।

ईरान का कहना है कि उसने जमीन और समुद्र दोनों से हमला करने में सक्षम 1000 नए स्ट्रेटेजिक ड्रोन तैयार कर लिए हैं और इन्हें अपनी सेना की चारों शाखाओं में तैनात भी कर दिया गया है। मतलब अमेरिका की बड़ी बड़ी मिसाइलों का जवाब ईरान के छोटे छोटे ड्रोन देंगे जिसे अमेरिका हमेशा याद रखेगा। ईरान सरकार द्वारा फंडेड तस्नीम न्यूज एजेंसी के हवाले से छापी है, जो इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC से जुड़ी मानी जाती है। तस्नीम ने यह भी कहा कि सुरक्षा कारणों से इन ड्रोन की कोई तस्वीर जारी नहीं की गई है। अब तस्वीरें भले न हों, लेकिन संदेश बेहद साफ है कि ईरान अपनी ताकत छिपा भी रहा है और दिखा भी रहा है। इसके साथ ही ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने हमला किया तो उसके सुरक्षा बलों की उंगलियां ट्रिगर पर ही हैं।

ईरानी सेना का कहना है कि उसके ड्रोन और मिसाइलों का नेटवर्क किसी भी हमले को नाकाम करने की क्षमता रखता है। यानी हमला हुआ तो जवाब भी कई दिशाओं से और कई स्तरों पर आ सकता है। अब देखिए यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब मिडिल ईस्ट में अमेरिकी युद्धपोतों की तैनाती की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। 28 जनवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान से उसके परमाणु कार्यक्रम पर समझौता करने को कहा था और साफ चेतावनी दी थी कि ऐसा न करने पर अगला हमला पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक होगा। ट्रम्प के मुताबिक अमेरिकी युद्धपोत ईरान की तरफ बढ़ रहे हैं। यह ट्रंप का ये बयान कूटनीतिक भाषा नहीं बल्कि सीधी सैन्य चेतावनी की तरह सुनाई देता है, लेकिन ट्रंप अपनी बातों के कितने पक्के हैं ये तो दुनिया जानती है। लेकिन अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी साफ कर दिया है कि सेना राष्ट्रपति के किसी भी सैन्य आदेश के लिए तैयार है। यानी वॉशिंगटन में फैसले की घड़ी आए तो फौज को इंतजार नहीं करना पड़ेगा।

उधर ईरान के सेना प्रमुख मेजर जनरल अमीर हातामी ने मूल रूप से फारसी में कहा, किसी भी हमले और हमलावर को करारा जवाब देने के लिए तैयारी हमेशा सेना के एजेंडे में रही है। यह बयान दर्शाता है कि ईरान इस टकराव को अचानक पैदा हुई स्थिति नहीं बल्कि लंबे समय से तैयार की गई चुनौती मान रहा है। माना जा रहा है कि संभावित निशानों में कतर में स्थित अमेरिकी अल उदीद एयर बेस भी शामिल हो सकता है। यह वही बेस है जिसे ईरान पहले भी निशाना बना चुका है। पिछले साल जून में हुए अमेरिकी हमले के बाद ईरान ने इस एयरबेस पर हमला किया था और अब एक बार फिर इसका नाम सामने आ रहा है।

वहीं हाल के दिनों में अमेरिका ने मिडिल ईस्ट के अपने एयरबेसों पर अलर्ट जारी किया है। यह कदम बताता है कि खतरे को सिर्फ बयानबाजी नहीं बल्कि वास्तविक जोखिम के रूप में देखा जा रहा है। मेजर जनरल अमीर हातामी ने यह भी कहा कि पिछले साल जून में अमेरिका और इजराइल के साथ हुए 12 दिन के संघर्ष के बाद ईरानी सेना ने अपनी सैन्य रणनीति बदली है। इसी नई रणनीति के तहत बड़ी संख्या में ड्रोन तैयार किए गए हैं। हातामी के मुताबिक ये ड्रोन जमीन और समुद्र दोनों जगहों से ऑपरेट किए जा सकते हैं। इसका मतलब है कि युद्ध हुआ तो मोर्चा सिर्फ सीमा पर नहीं बल्कि समुद्र, आसमान और दूरस्थ ठिकानों तक फैल सकता है। ईरान के पास पहले से बड़ी संख्या में बैलिस्टिक मिसाइलें मौजूद हैं, जो उसकी मारक क्षमता को और खतरनाक बनाती हैं। उधर अमेरिका भी चुप नहीं बैठा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मिडिल ईस्ट में युद्धपोतों का एक बेड़ा भेजा है।

ट्रंप ने बुधवार को कहा है कि एक और सैन्य बेड़ा ईरान की तरफ बढ़ रहा है। उन्होंने अपने ट्रुथ सोशल प्लेटफॉर्म पर लिखा कि, एक बहुत बड़ा बेड़ा ईरान की ओर बढ़ रहा है। यह तेजी से, बहुत ताकत, जोश और मकसद के साथ आगे बढ़ रहा है। ट्रंप ने आगे कहा कि उम्मीद है कि ईरान जल्दी ही बातचीत की मेज पर आएगा और एक निष्पक्ष और बराबरी का समझौता करेगा, कोई परमाणु हथियार नहीं। एक ऐसा समझौता जो सभी पक्षों के लिए अच्छा हो। ट्रंप ने यह भी कहा कि वह ईरान के साथ समझौता करना चाहते हैं और अगर ईरान परमाणु संधि कर लेता है और प्रदर्शनकारियों को ना मारे तो अमेरिका अब भी डील करने के लिए तैयार है। लेकिन बातचीत की पेशकश के साथ साथ युद्ध की पूरी तैयारी भी दिखाई दे रही है।

अमेरिकी यूएसएस अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को मिडिल ईस्ट में तैनात कर दिया गया है। इसके साथ गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर भी मौजूद हैं। यह विमानवाहक पोत कई दर्जन लड़ाकू विमानों को साथ लेकर चल सकता है। इसके अलावा F 15E स्ट्राइक ईगल लड़ाकू विमानों का एक अमेरिकी स्क्वाड्रन भी भेजा गया है। यह ताकत सिर्फ दबाव बनाने के लिए नहीं बल्कि असली ऑपरेशन की क्षमता रखती है।

वहीं मिडिल ईस्ट का तनाव अब यूरोप तक भी फैल चुका है। यूरोपियन यूनियन ने ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड यानी IRGC को आतंकी संगठन घोषित कर दिया है। यह फैसला विरोध प्रदर्शनों पर ईरानी सरकार की हिंसक कार्रवाई के चलते लिया गया बताया गया है। IRGC के शीर्ष कमांडरों समेत 15 अधिकारियों और 6 संगठनों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं। इनमें ऑनलाइन कंटेंट की निगरानी करने वाली संस्थाएं भी शामिल हैं। यूरोप में इनकी संपत्तियां जब्त की जाएंगी और उनकी यात्रा पर रोक लगेगी। EU की राजनयिक काजा कलास ने कहा कि दमन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि IRGC को अब अल कायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी संगठनों के बराबर माना जाएगा। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अमेरिका पहले ही IRGC को आतंकी संगठन घोषित कर चुके हैं, हालांकि ब्रिटेन ने अब तक इसे अपनी आतंकी सूची में शामिल नहीं किया है।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने EU के इस फैसले को दिखावटी कदम और बड़ी रणनीतिक गलती बताया है। उनका कहना है कि यूरोप हालात संभालने के बजाय तनाव बढ़ा रहा है। IRGC ईरान की सबसे ताकतवर सैन्य ताकत मानी जाती है। इसकी स्थापना 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद हुई थी और इसके पास करीब 1 लाख 90 हजार सक्रिय सैनिक हैं। यानी जिस संगठन को यूरोप आतंकी बता रहा है, वही ईरान की सैन्य रीढ़ है। इन सबके बीच कूटनीति की हल्की लेकिन अहम कोशिशें भी चल रही हैं।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची इस्तांबुल पहुंचे और तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान से मुलाकात की। इस यात्रा का मकसद अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव पर बातचीत करना है। तुर्किये ने मध्यस्थता की पेशकश की है। ईरान के विदेश मंत्रालय के मुताबिक अराघची की राष्ट्रपति से भी बैठक प्रस्तावित है। तुर्किये के विदेश मंत्री ने दोनों पक्षों से बातचीत की मेज पर लौटने की अपील की है और सुझाव दिया है कि अमेरिका को ईरान से जुड़े मुद्दों को एक एक कर सुलझाना चाहिए, सबसे पहले परमाणु कार्यक्रम पर बात होनी चाहिए।

जमीन पर तस्वीर बेहद सख्त है। अरब सागर और लाल सागर में USS अब्राहम लिंकन, USS थियोडोर रूजवेल्ट और कई मिसाइल विध्वंसक युद्धपोत तैनात हैं। कतर, बहरीन, सऊदी अरब, इराक और जॉर्डन के सैन्य अड्डों से अमेरिकी वायुसेना की सक्रियता बढ़ी है। मिडिल ईस्ट और पर्शियन गल्फ में लगभग 30,000 से 40,000 अमेरिकी सैनिक मौजूद बताए जा रहे हैं।

इस क्षेत्र में करीब 6 नौसैनिक जहाज हैं, जिनमें 3 गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर शामिल हैं जो बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस और अन्य ऑपरेशन के लिए सक्षम हैं। एक तरफ बातचीत की अपीलें हैं, दूसरी तरफ ट्रिगर पर उंगलियां। एक तरफ समझौते की बातें हैं, दूसरी तरफ ड्रोन, मिसाइल, युद्धपोत और लड़ाकू विमान। भरोसा लगभग खत्म हो चुका है और शक अपनी चरम सीमा पर है। मिडिल ईस्ट फिर उसी मोड़ पर खड़ा है जहां एक गलती, एक हमला या एक गलत अनुमान पूरे क्षेत्र को आग में झोंक सकता है। दुनिया देख रही है, लेकिन फैसले बंद कमरों और युद्धक जहाजों के डेक पर लिए जा रहे हैं। यही इस टकराव की सबसे खतरनाक सच्चाई है।

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