केंद्र को वित्तीय संस्थानों से लाभांश में बढ़ोतरी, 2026-27 में मिलेगा 3.16 लाख करोड़ रुपये

केंद्र सरकार को वित्त वर्ष 2027 में भारतीय रिज़र्व बैंक और सरकारी बैंकों से 3.16 लाख करोड़ रुपये का डिविडेंड मिलने की उम्मीद है। यह राशि पिछले वित्त वर्ष के 2.68 लाख करोड़ रुपये से अधिक है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: केंद्र सरकार को वित्त वर्ष 2027 में भारतीय रिज़र्व बैंक और सरकारी बैंकों से 3.16 लाख करोड़ रुपये का डिविडेंड मिलने की उम्मीद है। यह राशि पिछले वित्त वर्ष के 2.68 लाख करोड़ रुपये से अधिक है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस बढ़ोतरी से सरकार के बजट में नॉन-टैक्स रेवेन्यू को मजबूती मिलेगी, जिससे विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं और विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता बढ़ेगी। सरकारी दस्तावेज़ों के अनुसार, केंद्रीय सरकार का यह डिविडेंड अनुमान बजट नियोजन और आर्थिक स्थिरता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

केंद्र सरकार को वित्त वर्ष 2026-27 में भारतीय रिज़र्व बैंक, राष्ट्रीयकृत बैंक और वित्तीय संस्थानों से लाभांश और अधिशेष के रूप में 3.16 लाख करोड़ रुपये प्राप्त होने की उम्मीद है, जो चालू वित्त वर्ष की तुलना में लगभग 3.75 प्रतिशत अधिक है. संसद में प्रस्तुत संशोधित अनुमान (आरई) के अनुसार, चालू वित्त वर्ष के दौरान केंद्र सरकार को लगभग 3.05 लाख करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है, जो फरवरी, 2025 में पेश किए गए आम बजट में 2.56 लाख करोड़ रुपये था. बजट दस्तावेजों में यह भी बताया गया कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और अन्य निवेश से मिलने वाला लाभांश 75,000 करोड़ रुपये अनुमानित है, जो चालू वित्त वर्ष के बजट में 71,000 करोड़ रुपये था.

केंद्रीय बजट के रेवेन्यू फ्रेमवर्क में, सरकारी प्राप्तियों को मोटे तौर पर कर राजस्व और नॉन टैक्स रेवेन्यू में वर्गीकृत किया गया है. कर राजस्व – जिसमें आयकर, निगम कर, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी), सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क शामिल हैं – आमतौर पर सरकार की कुल राजस्व प्राप्तियों का सबसे बड़ा हिस्सा होता है, जो कुल राजस्व प्राप्तियों का लगभग 80 फीसदी या उससे अधिक होता है, जबकि नॉन टैक्स रेवेन्यू शेष छोटा हिस्सा होता है.

नॉन टैक्स रेवेन्यू आय का एक रिकरिंग सोर्स है जो सरकार कराधान के अलावा अन्य कार्यों से अर्जित करती है. इसमें ऋणों पर प्राप्त ब्याज, शुल्क और जुर्माना, रॉयल्टी, लाइसेंस शुल्क (जैसे स्पेक्ट्रम नीलामी), और सरकारी उद्यमों और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से प्राप्त लाभांश और लाभ शामिल हैं.

नॉन टैक्स रेवेन्यू में, आरबीआई से डिविडेंड ट्रांसफर हाल के वर्षों में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक के रूप में उभरा है. पिछले दशक में इन ट्रांसफर्स में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, कई बार तो ये अन्य डिविडेंड सोर्सेज से भी अधिक हो गए हैं और गैर-कर प्राप्तियों को बढ़ावा दे रहे हैं.

आरबीआई डिविडेंड में लगातार इजाफा
पिछले आठ वर्षों में, आरबीआई डिविडेंड में लगातार इजाफा देखने को मिला है. आंकड़ों पर बात करें तो वित्त वर्ष 2022 में 30,307 करोड़ रुपएका डिविडेंड देखने को मिला था जो वित्त वर्ष 2025 में 2,68,590 करोड़ रुपये पर आ गया. नॉन टैक्स रेवेन्यू के हिस्से के रूप में, लाभांश में व्यापक उतार-चढ़ाव आया है, जो वित्त वर्ष 2022 में 8 फीसदी से लेकर वित्त वर्ष 2019 में 75 फीसदी तक रहा है.

हाल के वर्षों में, विशेष रूप से वित्त वर्ष 2024 और वित्त वर्ष 2025 में, आरबीआई द्वारा दिए गए डिविडेंड में हुई वृद्धि का श्रेय आरबीआई के निवेश पोर्टफोलियो पर मजबूत सरप्लस इनकम और लाभ को दिया जाता है. जिसमें फॉरेन करेंसी असेट्स और सरकारी सिक्योरिटीज शामिल हैं, जिसकी वजह से सामान्य से अधिक सरप्लस ट्रांसफर हुए हैं.

आरबीआई डिविडेंड का महत्व
हालांकि नॉन टैक्स रेवेन्यू, करों की तुलना में अपेक्षाकृत छोटा घटक है, फिर भी यह सरकार के फिस्कल मैथ को संतुलित करने में रणनीतिक भूमिका निभाता है. आरबीआई से प्राप्त डिविडेंड, जब अधिक होता है, तो नॉन टैक्स रेवेन्यू को बढ़ाने में मदद करता है, जिससे सरकार पर केवल करों या बढ़े हुए लोन के माध्यम से राजस्व टारगेट को पूरा करने का दबाव कुछ हद तक कम हो जाता है. इससे फिस्कल डेफिसिट को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है. उदाहरण के लिए, वित्त वर्ष 2025 के लिए आरबीआई द्वारा किए गए रिकॉर्ड हस्तांतरण ने प्रारंभिक बजट से अधिक अतिरिक्त राजकोषीय गुंजाइश प्रदान की.

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