ट्रंप को SC से झटका! टैरिफ रद्द, भारतीय बाजार में दिखेगी तेजी

अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ फैसले को गलत ठहराया और साफ-साफ शब्दों में कहा कि उन्हें दूसरे देशों पर टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ फैसले को गलत ठहराया और साफ-साफ शब्दों में कहा कि उन्हें दूसरे देशों पर टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं है. अमेरिकी कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति ने 1977 के International Emergency Economic Powers Act (IEEPA) का गलत इस्तेमाल किया है.

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मनमाने फैसलों को अमेरिका की सर्वोच्च अदालत ने ही अवैध ठहरा दिया है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से भारतीय निर्यातकों की बल्ले-बल्ले हो गई है. चूंकि यह फैसला शुक्रवार को आया. ऐसे में सोमवार को जब भारतीय शेयर बाजार खुलेंगे तब उनकी तेजी देखने को मिलेगी.

USA की सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी भी देश पर टैरिफ लगाने का अधिकार अमेरिकी कांग्रेस को है, राष्ट्रपति को नहीं. सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से डोनाल्ड ट्रंप सकते में आ गए हैं. अमेरिका फर्स्ट की अपनी पालिसी से ट्रंप अमेरिका के राइट विंगर्स को अपनी तरफ करना चाहते थे, लेकिन पर शीर्ष अदालत ने उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया है. सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति द्वारा वैश्विक टैरिफ लगाये जाने की प्रक्रिया को गैरकानूनी बता दिया है. साथ ही आला कोर्ट ने टैरिफ रद्द करने का फैसला भी सुनाया है.

IEEPA का गलत इस्तेमाल

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति ने 1977 के International Emergency Economic Powers Act (IEEPA) का गलत इस्तेमाल किया है. सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला 6-3 के बहुमत से सुनाया. मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स ने बहुमत की तरफ से कहा कि संविधान के तहत टैक्स और टैरिफ लगाने का असली अधिकार अमेरिकी कांग्रेस (संसद) के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं.

अलबत्ता आपातकालीन स्थिति में ऐसा किया जा सकता है. लेकिन राष्ट्रपति ने शांतिकाल में इन शक्तियों का इस्तेमाल किया है. इस फैसले के बाद वे सभी शुल्क जो IEEPA के तहत लगाए गए थे, इनमें ‘लिबरेशन डे’ (Liberation Day) के नाम से घोषित 10 प्रतिशत वैश्विक टैरिफ और कनाडा, मैक्सिको व चीन पर लगाए गए विशेष शुल्क शामिल हैं.

ट्रंप दूसरा रास्ता तलाशेंगे

सुप्रीम कोर्ट का फैसला उन टैरिफ पर लागू नहीं होता जो सेक्शन 232 (राष्ट्रीय सुरक्षा – जैसे स्टील और एल्युमीनियम) या सेक्शन 301 (अनुचित व्यापार व्यवहार) के तहत लगाए गए हैं. एक अंदाजे के अनुसार सरकार ने अब तक लगभग 175 अरब डॉलर से ज्यादा का टैरिफ वसूला है. इसके चलते विदेशों से माल आयात करने वाली कंपनियां (जैसे Costco, Alcoa आदि) इस राशि के रिफंड के लिए दावा कर सकती हैं.

भारत के लिए यह राहत की खबर है, क्योंकि इससे भारतीय निर्यातकों को उन 18 प्रतिशत तक के रेसीप्रोकल टैरिफ से छूट मिलेगी जो इस कानून के तहत लगाए गए थे. उधर राष्ट्रपति ट्रंप ने इस फैसले को ‘देश के लिए शर्मनाक’ बताया है और सेक्शन 122 के तहत एक नया आदेश लाने की घोषणा की है ताकि 10 प्रतिशत का अतिरिक्त वैश्विक टैरिफ फिर से लगाया जा सके.

भारतीय शेयर मार्केट उछाल भरेगा

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से भारतीय शेयर बाजार में उछाल आएगा. TCS, Infosys, HCLTech के लिए यह फैसला उम्मीदों भरा है. क्योंकि ट्रंप के टैरिफ वार का सर्वाधिक असर आईटी शेयरों पर पड़ा था. अमेरिकी कंपनियों पर टैरिफ का बोझ कम होने से उनके पास आईटी बजट और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन पर खर्च करने के लिए अधिक पूंजी बचेगी. इसके अलावा भारत के फार्मा उद्योग में खुशियां आएंगी.

मालूम हो कि भारत अमेरिका को जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा निर्यातक है. टैरिफ हटने या न लगने से Sun Pharma, Dr. Reddy’s, और Cipla जैसी कंपनियों के मार्जिन में सुधार होगा. अमेरिकी बाजार में भारतीय दवाओं की मांग और प्रतिस्पर्धात्मकता बनी रहेगी. साथ ही भारत से आने वाले ऑटो और ऑटो कंपोनेंट की डिमांड बढ़ेगी.

रुपया मजबूत होने की उम्मीद

भारतीय कपड़ा उद्योग के लिए अमेरिका एक मुख्य बाजार है. वैश्विक 10 प्रतिशत टैरिफ रद्द होने से भारतीय कपड़ों की कीमतें अमेरिका में प्रतिस्पर्धी बनी रहेंगी, जिससे निर्यात वॉल्यूम बढ़ेगा. निफ्टी और सनसेक्स पर इस फैसले का सकारात्मक असर पड़ने की संभावना है. वैश्विक व्यापार युद्ध की आशंका कम होने से विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) उभरते बाजारों (Emerging Markets) जैसे भारत में वापस निवेश बढ़ा सकते हैं.

डॉलर के मुकाबले रुपये में मजबूती आने की संभावना है, जिससे व्यापार घाटा कम होगा और बाजार में विश्वास बढ़ेगा. भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर महेंद्र सिंह ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि इलेक्शन तो पूरी दुनिया में होते रहते हैं, यहां तक कि ईरान और सूडान में भी पर अब साबित हो गया कि असली डेमोक्रेसी केवल और केवल अमेरिका ही है!

रिपब्लिकन जज ही ट्रंप के टैरिफ के विरोध में महेंद्र सिंह ने बताया कि अमेरिकन सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश भी घोषित रिपब्लिकन है और कुल छह जज भी रिपब्लिकन हैं जिन्होंने इस टैरिफ पालिसी के विरोध में फैसला दिया उनमें से आधे यानी तीन ने ट्रंप के खिलाफ फैसला दिया. बाकी तीन तो डेमोक्रेट थे.

एक रिपब्लिकन महिला जज को तो खुद प्रेसीडेंट ट्रंप ने पिछले कार्यकाल में नामित किया था. पर उसने भी टैरिफ पॉलिसी के खिलाफ फैसला देना पसंद किया. इस समय अमेरिकन सुप्रीम कोर्ट में मेजोरिटी में रिपब्लिकन जज हैं. पर इन सब ने संविधान की लाज रखी और इज्जत करते हैं. दूसरी तरफ भारत के अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ और पाटिलपुत्र विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हेमंत कुमार झा ने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल में अक्सर एक तानाशाह की तरह व्यवहार कर रहे थे. लेकिन अमेरिका ने बताया कि असल शक्ति उसके संविधान और कानून में निहित है.

अमेरिकी संस्थान ट्रंप के अर्दब में नहीं

प्रोफेसर झा ने कहा कि कुछ दिन पहले ट्रंप ने अमेरिका की विश्वविख्यात हॉवर्ड युनिवर्सिटी को निर्देश दिया था कि उसके परिसर में छात्रों के फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनों और इस जैसे अन्य राजनीतिक-कूटनीतिक मुद्दों से जुड़े प्रदर्शनों पर रोक लगाएं. यूनिवर्सिटी ने विनम्रता किंतु दृढ़ता से राष्ट्रपति का प्रतिवाद किया और अपने तर्क रखे. अमेरिकी संस्थान मजबूत हैं, उनके ऊंचे पदों पर जो लोग बैठे हैं वे यह नहीं देखते कि राजनीतिक सत्ता क्या चाहती है.

वे यह देखते हैं कि संविधान क्या कहता है, कानून क्या कहता है, अमेरिकी जनता के हित क्या कहते हैं. अमेरिकी विश्वविद्यालय दुनिया की हर विचारधारा से जुड़े विद्वानों से भरे हैं. वहां राजनीतिक सत्ता के खिलाफ लिखने, बोलने वाले प्रोफेसरों, अमेरिकी कंपनियों के गोरखधंधे के खिलाफ रिसर्च पेपर प्रस्तुत करने वाले शोधार्थियों को अर्बन नक्सल या इस जैसा कुछ नाम नहीं दिया जाता.

ट्रंप की मनमानी पर अंकुश

टोरोंटो के पास डरहम में एडवोकेट उत्कर्ष तिवारी का कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी मनमानी से अमेरिका की अर्थ व्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया था साथ ही पड़ोसी कनाडा से भी रिश्ते खराब कर लिए थे. नतीजा यह रहा कि दोनों जगह महंगाई और बेरोजगारी बढ़ने लगी थी. वे किसी को टैरिफ से आतंकित कर रहे थे तो किसी पर सीधे कब्जा कर लेने की धमकी दे रहे थे. उन्होंने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अपनी फौज भेज कर उठवा लिया.

ग्रीनलैंड को धमकी देते ही रहते हैं और तो और वे कनाडा, जो आकार में USA से डेढ़ लाख वर्ग किमी बड़ा है, उसे अपना 51 वां राज्य बताते नहीं थकते. रूस और चीन तो उसके विरोधी हैं ही NATO देशों को अपने खिलाफ खड़ा कर लिया. EU उनके विरोध में है और इसीलिए उसने भारत से ट्रेड डील की. ऐसे में यह फैसला ट्रंप पर अंकुश तो लगाएगा ही.

Related Articles

Back to top button