CJI आगबबूला! सरकार में हड़कंप | NCERT पर कड़ी फटकार | PM मोदी की जवाबदेही तय?
देश की न्यायपालिका और सरकार के बीच बड़ा टकराव सामने आया है... सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने NCERT से जुड़े मुद्दे पर कड़ी नाराजगी जताई...

4पीएम न्यूज नेटवर्कः देश में इस समय NCERT की एक नई किताब को लेकर बड़ा घमासान मचा हुआ है.. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में खुद संज्ञान लिया.. और बहुत कड़ा रुख अपनाया.. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका की गरिमा को कम करने की यह सोची-समझी साजिश है.. जिसके बाद कोर्ट ने किताब की आगे की छपाई.. बिक्री और डिजिटल प्रसार पर पूरी तरह रोक लगा दी है.. साथ ही शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव.. और NCERT के निदेशक को नोटिस जारी किया है कि.. उन पर अदालत की अवमानना का केस क्यों न चलाया जाए.. CJI ने साफ कहा कि सरकार के प्रमुख सामने आएं.. और जवाबदेही तय करें..
आपको बता दें कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान.. और प्रशिक्षण परिषद द्वारा जारी कक्षा 8 की नई सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक पर पूर्ण.. और व्यापक प्रतिबंध लगा दिया.. पुस्तक में न्यायपालिका की भूमिका पर चर्चा करते हुए न्यायपालिका में भ्रष्टाचार शीर्षक वाले.. खंड को शामिल करने को अदालत ने सोची-समझी, गहरी जड़ें वाली साजिश.. और संस्थागत गरिमा को ठेस पहुंचाने का गणना किया गया कदम करार दिया.. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने इसे गोली चलाकर न्यायपालिका को खून बहाने वाला.. काम बताते हुए कहा कि युवा छात्रों के प्रभावशाली मन पर यह स्थायी गलतफहमी पैदा कर सकता है..
पीठ ने पुस्तक के आगे प्रकाशन, पुनर्मुद्रण या डिजिटल प्रसार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाते हुए.. सभी भौतिक प्रतियों की तत्काल जब्ती.. और सीलिंग का आदेश दिया.. एनसीईआरटी निदेशक.. और जहां-जहां पुस्तक पहुंची है.. उन सभी स्कूलों के प्रिंसिपलों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया गया.. सभी राज्यों के शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिवों को दो सप्ताह में अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया.. साथ ही स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव और एनसीईआरटी निदेशक डॉ. दिनेश प्रसाद सखलानी को अवमानना अधिनियम के तहत नोटिस जारी कर पूछा गया कि.. उनके खिलाफ या जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए..
जानकारी के मुताबिक यह घमासान उस समय शुरू हुआ.. जब 24 फरवरी को एनसीईआरटी ने एक्सप्लोरिंग सोसाइटी इंडिया एंड बियॉन्ड (भाग-2) नामक नई पाठ्यपुस्तक जारी की.. पुस्तक के अध्याय 4 द रोल ऑफ द जुडिशरी इन अवर सोसाइटी में.. न्यायिक प्रणाली की चुनौतियों पर एक उप-खंड शामिल किया गया.. जिसमें स्पष्ट रूप से न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार को सूचीबद्ध किया गया.. रिपोर्ट के अनुसार खंड में लिखा था कि न्यायिक प्रणाली को भ्रष्टाचार.. भारी बैकलॉग, न्यायाधीशों की कमी, जटिल कानूनी प्रक्रियाएं.. और खराब बुनियादी ढांचे जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.. इसमें सीपीजीआरएएमएस के माध्यम से 2017 से 2021 के बीच.. 1 हजार 600 से अधिक शिकायतें प्राप्त होने का जिक्र था.. साथ ही कहा गया कि गंभीर आरोपों में संसद द्वारा महाभियोग की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है.. लेकिन लोग न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार का अनुभव करते हैं..
द इंडियन एक्सप्रेस ने 25 फरवरी को इसकी पहली रिपोर्ट प्रकाशित की.. जिसके बाद पूरे देश में हलचल मच गई.. एनसीईआरटी ने उसी दिन पुस्तक की बिक्री रोक दी.. और बुधवार को अनजाने में हुई त्रुटि बताते हुए खेद व्यक्त किया.. परिषद ने कहा कि यह अनुचित सामग्री अनजाने में घुस गई है.. और इसे फिर से लिखा जाएगा.. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे पर्याप्त नहीं माना.. बुधवार को वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल.. और एएम सिंहवी ने मामले को अदालत के संज्ञान में लाया.. सीजेआई सूर्यकांत ने तुरंत स्वत संज्ञान लिया.. और मामले को गुरुवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया..
गुरुवार की सुनवाई में पीठ ने कड़ी टिप्पणियां की.. मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह एक गहरी जड़ें वाली.. अच्छी तरह से आयोजित साजिश लगती है.. न्यायपालिका के प्रमुख के रूप में मेरा कर्तव्य है कि जिम्मेदार व्यक्ति कौन है.. यह पता लगाऊं.. अगर एक से अधिक हैं, तो प्रमुखों के सिर गिरने चाहिए.. जवाबदेही तय होनी चाहिए.. जब तक मैं संतुष्ट नहीं हो जाता.. मैं इन कार्यवाही को बंद नहीं करने जा रहा हूं.. उन्होंने जोर देकर कहा कि पुस्तक न केवल छात्रों तक सीमित नहीं है.. बल्कि शिक्षकों, अभिभावकों और पूरे समाज तक पहुंचेगी.. इस नाजुक उम्र में पक्षपातपूर्ण कथा से युवा छात्रों को अवगत कराना मौलिक रूप से अनुचित है.. जो स्थायी गलतफहमियां पैदा कर सकता है..
पीठ ने पुस्तक की सामग्री की आलोचना करते हुए कहा कि.. इसमें न्यायपालिका के शानदार इतिहास को एक कलम के झटके से मिटा दिया गया है.. पुस्तक पूरे अध्याय को न्यायपालिका की भूमिका पर समर्पित करती है.. लेकिन लोकतांत्रिक ढांचे के संरक्षण में सुप्रीम कोर्ट.. उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों द्वारा किए गए महत्वपूर्ण योगदान को पूरी तरह नजरअंदाज कर देती है.. इसमें संवैधानिक नैतिकता और बुनियादी संरचना सिद्धांत को बनाए रखने में न्यायपालिका की भूमिका का कोई जिक्र नहीं है.. पीठ ने कहा कि यह चुप्पी विशेष रूप से गंभीर है.. क्योंकि अदालत ने अतीत में उच्च-रैंकिंग अधिकारियों की भ्रष्ट आचरण की निंदा की है..
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुनवाई की शुरुआत में बिना शर्त माफी मांगी.. और उन्होंने कहा कि शुरुआत में हम बिना शर्त और अयोग्य माफी मांगते हैं.. स्कूल शिक्षा सचिव यहां मौजूद हैं.. लेकिन सीजेआई ने टिप्पणी की कि एनसीईआरटी के बयान में माफी का एक शब्द भी नहीं है.. और निदेशक ने सामग्री का बचाव करने की कोशिश की.. मेहता ने आगे कहा कि अध्याय तैयार करने वाले दो व्यक्तियों को कभी भी मंत्रालय की किसी गतिविधि से नहीं जोड़ा जाएगा.. पीठ ने इसे बहुत हल्की कार्रवाई करार दिया.. और कहा कि उन्होंने गोलियां चलाई हैं, न्यायपालिका आज खून बह रही है..
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि यह अनजाने में नहीं हो सकता.. जबकि एससीबीए के अध्यक्ष विकास सिंह ने इसे जानबूझकर बताया.. पीठ ने स्पष्ट किया कि उसका इरादा आलोचना को दबाना नहीं है.. राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की शैक्षणिक अखंडता की रक्षा के लिए न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी हो गया है.. हम वैध आलोचना को नहीं रोकना चाहते.. मतभेद और आलोचना लोकतंत्र की जान हैं.. लेकिन इस मामले में चयनात्मक और पक्षपातपूर्ण तरीका अपनाया गया.. जो युवाओं के मन में न्यायपालिका की पवित्रता को नष्ट कर सकता है..
आपको बता दें कि अपने आदेश में पीठ ने कहा कि पुस्तक की सामग्री लापरवाह, गैर-जिम्मेदाराना, अवमाननापूर्ण और प्रेरित है.. प्रथम दृष्टया जांच से लगता है कि यह संस्थागत प्राधिकरण को कमजोर करने.. और न्यायपालिका की गरिमा को कम करने के लिए सोची-समझी चाल है.. अगर इसे अनियंत्रित छोड़ दिया गया.. तो बड़े पैमाने पर जनता और युवाओं के प्रभावशाली दिमाग में न्यायिक कार्यालय की पवित्रता खत्म हो जाएगी.. पीठ ने मीडिया का शुक्रिया अदा किया कि उन्होंने इस मुद्दे को उजागर किया..
वहीं एनसीईआरटी की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि यह अनजाने में हुई त्रुटि थी.. और पुस्तक की वितरण रोक दी गई है.. लेकिन अदालत ने इसे अपर्याप्त माना.. और कहा कि निदेशक का लिखित जवाब बचाव का प्रयास था.. अब एनसीईआरटी को पुस्तक तैयार करने वाली राष्ट्रीय पाठ्यक्रम.. और शिक्षण सामग्री समिति के सदस्यों की पूरी सूची.. और अध्याय लिखने वाली टीम के नाम जमा करने होंगे..
यह विवाद केवल एक पुस्तक तक सीमित नहीं है.. बल्कि शिक्षा व्यवस्था, संवैधानिक साक्षरता और संस्थागत सम्मान के बड़े सवाल को उठाता है.. भारत में न्यायपालिका लोकतंत्र का स्तंभ मानी जाती है.. केशवानंद भारती मामले से लेकर मौलिक अधिकारों की रक्षा तक, अदालत ने बार-बार संविधान की रक्षा की है.. लेकिन लंबित मामलों की संख्या वाकई चुनौती है.. फिर भी, इसे कक्षा 8 के छात्रों के सामने एकतरफा तरीके से पेश करना.. बिना न्यायपालिका की उपलब्धियों.. और सुधारों का जिक्र किए.. अदालत को नागवार गुजरा..
विशेषज्ञों का मानना है कि पाठ्यक्रम में संस्थाओं की भूमिका को संतुलित तरीके से पढ़ाया जाना चाहिए.. एनसीईआरटी की किताबें पहले भी विवादों में रही हैं.. लेकिन इस बार मामला सीधे न्यायपालिका की गरिमा से जुड़ा है.. इसलिए अदालत का हस्तक्षेप स्वाभाविक था.. बता दें कि सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने माफी मांगी.. और आश्वासन दिया कि दोषी व्यक्ति आगे किसी काम से नहीं जुड़ेंगे.. लेकिन पीठ ने साफ कहा कि यह पर्याप्त नहीं.. कल जिस तरह के संदेश मुझे मिले… और आज बस माफी मांग ली जाए.. बता दें कि सीजेआई ने कहा कि.. अब अगली सुनवाई होली की छुट्टियों के बाद होगी.. तब तक सभी प्रतियां जब्त होनी चाहिए.. और डिजिटल संस्करण हटाए जाने चाहिए.. किसी भी प्रयास को अदालत की अवहेलना माना जाएगा..



