खबरों की दुनिया में सबसे आगे 4PM

- लगातार तीन वर्षों से नम्बर वन पोजिशन कायम
- सच की ताकत, दर्शकों की नवाजिशों का नतीजा
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। सत्ता हमेशा आईना पसंद नहीं करती। क्योंकि आईना चेहरा दिखाता है और चेहरा जब सजा संवरा नहीं बल्कि दागदार हो तो आईना ही सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है। यही कहानी है उस मीडिया संस्थान की जिसने सरकारों को आईना दिखाने की जुर्रत की। जिसने सरकारों के सामने घुटने टेकने के बजाय आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछे। जिसने विज्ञापन की मलाई से ज्यादा सच की आग को चुना। और इस जिद का नाम है 4पीएम न्यूज नेटवर्क। आज जब देश का बड़ा मीडिया वर्ग सत्ता के चरणों में पुष्प अर्पित करने में व्यस्त दिखता है तब 4पीएम ने सत्ता के सिंहासन के नीचे छिपे सच को खींचकर जनता के सामने रख दिया। यह वही दौर था जब सवाल पूछना देशद्रोह जैसा बना दिया गया था। जब पत्रकारिता का मतलब प्रेस रिलीज पढऩा और स्टूडियो में चीखना भर रह गया था। लेकिन इसी अंधेरे में 4पीएम ने मशाल जलाने की कोशिश की। और इसकी यह कोशिश पाठकों को भा गयी और उन्होंने इसे देश का नम्बर वन मीडिया संस्थान बना दिया। यह दर्शकों की नवाजिशों का ही नतीजा है कि हम लगातार तीन वर्षों से नम्बर वन की पोजिशन पर है और करोड़ों/अरबो रूपये के बजट वाले मीडिया संस्थान हमारे आसपास तक नहीं पहुंच पा रहे है।
4PM ने संभाला लोकतंत्र का संतुलन
कहा जाता है कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होता है। लेकिन जब यह स्तंभ झुकने लगे तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ जाता है। ऐसे समय में 4पीएम ने झुकने से इनकार किया। इसने न तो विज्ञापन के लिए अपनी आत्मा बेची और न ही दबाव में आकर अपने सवाल बदले। इसने वही किया जो पत्रकारिता का मूल धर्म है सच को सच कहना। आज जब मीडिया का बड़ा हिस्सा मैनेजमेंट के युग में जी रहा है तब 4पीएम ने मैनेज होने से इनकार कर दिया। इस इनकार की कीमत चुकानी पड़ी। लेकिन इस कीमत ने इसे कमजोर नहीं बल्कि और मजबूत बनाया। क्योंकि हर मुकदमा हर दबाव हर प्रतिबंध ने इसे जनता के और करीब ला दिया। और यही वजह है कि आज यह सिर्फ एक मीडिया संस्थान नहीं बल्कि एक आंदोलन बन चुका है। एक ऐसा आंदोलन जिसने साबित किया कि अगर जिद सच की हो तो कोई भी ताकत उसे रोक नहीं सकती।
4PM के बढ़ते कदम
आज 4पीएम सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि एक ब्रांड बन चुका है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इसकी पकड़ लगातार मजबूत हुई है। दर्शकों की संख्या बढ़ी है प्रभाव बढ़ा है और विश्वसनीयता नई ऊंचाइयों तक पहुंची है। डिजिटल मीडिया की दुनिया में जहां कई बड़े नाम मौजूद हैं वहां 4पीएम ने अपनी अलग पहचान बनाई है। यहां तक कि स्थापित प्लेटफॉर्म भी 4पीएम के आसपास नजर नहीं आते। टीआरपी और व्यूअरशिप के आंकड़े बताते हैं कि 4पीएम और दूसरे नंबर के संस्थान के बीच लंबा अंतर है। यह अंतर सिर्फ संख्या का नहीं बल्कि विश्वास का भी है।
संजय शर्मा के शब्द-शब्द में जिद और आग
हर क्रांति के पीछे एक चेहरा होता है और 4पीएम रूपी इस समाजिक क्रांति के पीछे हैं दमदार संपादक संजय शर्मा। जो कभी डरे नहीं और न ही कभी पीछे हटे। खबर का मतलब खबर। जस को तस छापने और कहने की हिम्मत रखने वाले संजय शर्मा की राह में कांटे बिछाये गये। आरोप लगे मुकदमे दर्ज हुए चैनल को बंद करने की कोशिशें हुईं। यहां तक कि डिजिटल प्लेटफॉर्म से भी इसे हटाने की कार्रवाई हुई। लेकिन यह लड़ाई अदालत तक पहुंची और अंतत: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के हस्तक्षेप के बाद चीजें बहाल हुईं। यह सिर्फ कानूनी जीत नहीं थी बल्कि पत्रकारिता की जीत थी। यह उस जिद की जीत थी जिसने हार मानने से इनकार कर दिया। संजय शर्मा ने कभी पत्रकारिता को पेशा नहीं माना। उन्होंने इसे मिशन माना। एक ऐसा मिशन जिसमें जोखिम था संघर्ष था लेकिन समझौता नहीं था। उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी विश्वसनीयता बनी। दर्शकों ने उन्हें सिर्फ पत्रकार नहीं बल्कि अपनी आवाज के रूप में स्वीकार किया। यही कारण है कि 4पीएम का हर शब्द लोगों के दिल तक पहुंचा। आज जब मीडिया में सुविधा पत्रकारिता का नया मानक बन चुकी है तब संजय शर्मा ने संघर्ष को अपना रास्ता बनाया। और यही संघर्ष 4पीएम की पहचान बन गया।
मशाल की रोशनी में सरकार बेनकाब
इस मशाल की रोशनी से कई चेहरे बेनकाब हुए। और यही वह वक्त था जब सत्ता असहज हुई। आरोप लगे मुकदमे दर्ज हुए दबाव बनाए गए। सिस्टम ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी ताकि यह आवाज खामोश हो जाए चुप हो जाए या फिर आंखे मूंद लें लेकिन ऐसा नहीं हुआ और 4पीएम की मशाल जलती रही और आगे भी जब तक पाठक चाहेंगे जलेगी क्योंकि इतिहास गवाह है कि सत्ता को सबसे ज्यादा डर बंदूक से नहीं कलम से लगता है।
वर्षों के संघर्ष-समर्पण और सच के प्रति प्रतिबद्धता का परिणाम
यह सफलता अचानक नहीं मिली। यह वर्षों के संघर्ष समर्पण और सच के प्रति प्रतिबद्धता का परिणाम है। आज 4पीएम सिर्फ खबर नहीं दिखाता बल्कि खबर की आत्मा को सामने लाता है। यह सिर्फ सूचना नहीं देता बल्कि चेतना जगाता है। और यही कारण है कि आज जब खबरों की दुनिया में भरोसे का संकट है तब 4पीएम भरोसे का दूसरा नाम बन चुका है। यह कहानी सिर्फ एक मीडिया हाउस की सफलता की नहीं है बल्कि उस जिद की है जिसने साबित किया अगर इरादे मजबूत हों तो छोटी शुरुआत भी इतिहास लिख सकती है और आज इतिहास के उसी पन्ने पर सुनहरे अक्षरों में लिखा है खबरों की दुनिया में सबसे आगे 4पीएम।




