जमानत पर न्यायिक दृष्टि दोष नहीं, संतुलन का साधन

- अधिवक्ता तल्हा अब्दुल रहमान व एसएम हैदर ने साझा किये कानून के विचार
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। हाल ही में देश के एक प्रमुख समाचार पत्र में प्रकाशित एक लेख में यह संकेत देने का प्रयास किया गया कि बड़ी संख्या में जमानत देना न्यायिक त्रुटि या अनुचित उदारता का द्योतक है। यह दृष्टिकोण न केवल विधिक रूप से त्रुटिपूर्ण है, वरन जमानत संबंधी न्यायशास्त्र की मूल भावना के विपरीत भी है। जमानत देना कोई अवगुण नहीं, वरन विधि द्वारा मान्यता प्राप्त एक आवश्यक साधन है, जिसका उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता और न्याय के बीच संतुलन स्थापित करना है। ये विचार एडवोकेट आन रिकॉर्ड उच्चतम न्यायालय तल्हा अब्दुल रहमान व उच्च न्यायालय लखनऊ खंडपीठ के अधिवक्ता एसएम हैदर रिजवी ने साझा किए।
सर्वप्रथम, यह समझना आवश्यक है कि जमानत का निर्णय किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि न्यायालय का होता है। न्यायाधीश केवल उस संस्थागत प्रक्रिया का एक अंग होते हैं। इसलिए किसी एक न्यायाधीश पर इस प्रकार की आलोचना केंद्रित करना न्यायिक संस्थान की प्रकृति को समझने में भूल को दर्शाता है। यदि किसी न्यायालय के समक्ष 510 जमानत याचिकाएंआती हैं और उनमें से 508 में जमानत प्रदान की जाती है, तो यह परिस्थिति अधिक गंभीर प्रश्न उठाती है कि क्या इतनी बड़ी संख्या में अभियोजन प्रक्रियाएंस्वयं संदेह के घेरे में हैं। यह स्थिति न्यायिक उदारता से अधिक, आपराधिक न्याय प्रणाली में संभावित दुरुपयोग की ओर संकेत करती है।
सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी और हिरासत को अपवाद के रूप में देखा जाना चाहिए
भारतीय विधि में, विशेषकर अर्नेश कुमार बनाम बिहार सरकार के न्याय निर्णय में, सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी और हिरासत को अपवाद के रूप में देखा जाना चाहिए। इसी प्रकार वैवाहिक विवादों में अनावश्यक आपराधिकरण को भी न्यायालयों ने समय-समय पर हतोत्साहित किया है। यह विधिक पृष्ठभूमि इस तथ्य को पुष्ट करती है कि जमानत देना न्यायिक विवेक का स्वाभाविक और अपेक्षित प्रयोग है। वर्तमान समय में दहेज संबंधी प्रकरणों के दुरुपयोग के सैकड़ों द्रष्टान्त सामने आते हैं, जहां विस्तृत परिवार के सदस्यों को भी अभियुक्त बना दिया जाता है। ऐसे मामलों में जमानत केवल अभियुक्त के अधिकारों की रक्षा नहीं करती, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक संतुलन को भी बनाए रखने का कार्य करती है।
निर्दोषों की स्वतंत्रता की रक्षा करना भी न्यायपालिका का दायित्व
न्यायपालिका का दायित्व केवल अपराध को दंडित करना नहीं, बल्कि निर्दोषों की स्वतंत्रता की रक्षा करना भी है। ऐसे में वे न्यायाधीश, जो संतुलन बनाए रखते हैं और विधि के शासन के प्रति प्रतिबद्ध रहते हैं, न्यायिक गरिमा को सुदृढ़ करते हैं, न कि उसे कमजोर करते हैं । अंतत:, इस विमर्श को व्यक्तियों से हटाकर सिद्धांतों पर केंद्रित करना आवश्यक है। जमानत को संदेह की दृष्टि से देखना, स्वतंत्रता के संवैधानिक मूल्य को कमतर आंकने के समान है।
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जमानत और दोषसिद्धि को एक ही तराजू में तौलना विधिक दृष्टि से अनुचित
जमानत और दोषसिद्धि को एक ही तराजू में तौलना विधिक दृष्टि से अनुचित है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि यदि कोई व्यक्ति अंतत: निर्दोष सिद्ध होता है, तो वह अपने जीवन के वे वर्ष कभी वापस नहीं पा सकता जो उसने कारावास में बिताए। इसीलिए संदेह की स्थिति में जमानत देना न्यायसंगत और विवेकपूर्ण है, ताकि अपरिवर्तनीय अन्याय से बचा जा सके। यदि किसी पक्ष को जमानत आदेश से वास्तविक आपत्ति है, तो विधि स्पष्ट उपाय प्रदान करती है। ऐसे आदेशों को उच्चतर न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है, जहाँ तथ्यों और विधि के आधार पर पुनर्विचार संभव है। इस प्रकार की वैधानिक अपील की व्यवस्था होते हुए भी जमानत देने से परहेज करना और विचाराधीन कैदियों से कारागारों को भर देना न तो न्यायसंगत है और न ही व्यावहारिक समाधान। न्याय का उद्देश्य सुधार और संतुलन है, न कि अनावश्यक निरुद्धता।



