सीजफायर के बीच मिसाइल हमला? ईरान पर उठे गंभीर सवाल

ईरान ने पाकिस्तान जाने से साफ़ इंकार कर दिया और ट्रंप की बिछाई बिसात को उलट दिया। ईरान का रुख अब और भी कड़ा है—पहले लेबनान पर मुकम्मल सीज़फायर, फिर कोई बात होगी।

4pm न्यूज नेटवर्क: दुनिया अभी शांति की उम्मीद कर ही रही थी कि अचानक एक ऐसी खबर आई है जिसने पेंटागन से लेकर व्हाइट हाउस तक को दहला दिया है। होर्मुज की लहरों के ऊपर उड़ रहा अमेरिका का एक हाई-टेक जासूसी ड्रोन अचानक गायब हो गया! खबर है कि यह ड्रोन 50 हजार फीट की ऊँचाई से सीधा समंदर में गिरा है। क्या सीज़फायर के बीच ईरान ने मिसाइल दागकर ट्रंप के घमंड को चूर-चूर कर दिया है? क्या सीज़फायर पूरी तरह टूट चुका है और महायुद्ध फिर से शुरू हो गया है?

ईरान ने पाकिस्तान जाने से साफ़ इंकार कर दिया और ट्रंप की बिछाई बिसात को उलट दिया। ईरान का रुख अब और भी कड़ा है—पहले लेबनान पर मुकम्मल सीज़फायर, फिर कोई बात होगी। इतना ही नहीं, होर्मुज में ईरान की ‘टैक्स वसूली’ शुरू हो चुकी है और पेमेंट के लिए जो तरीका अपनाया गया है, उसने ब्रिटेन और अमेरिका के होश उड़ा दिए हैं। आज हम ट्रंप के उन दावों की धज्जियां उड़ाएंगे जो वे शांति के नाम पर कर रहे थे।

सबसे बड़ी खबर होर्मुज से आ रही है। अमेरिका का एक अत्याधुनिक जासूसी ड्रोन, जो आसमान की ऊँचाइयों से ईरान की हर हरकत पर नज़र रख रहा था, अचानक रडार से गायब हो गया। पेंटागन के सूत्र बता रहे हैं कि ड्रोन 50 हजार फीट की ऊँचाई पर था जब उसका संपर्क टूट गया। सवाल ये है कि क्या ईरान ने अपना ‘खैबर’ या ‘सय्याद’ मिसाइल सिस्टम एक्टिवेट कर दिया है? हालांकि, ईरान ने अभी तक इसकी आधिकारिक जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन जिस जगह यह ड्रोन गिरा है, वह पूरी तरह से ईरान की जद (रेंज) में है। अगर यह ईरान का पलटवार है, तो समझ लीजिए कि ट्रंप का वो तथाकथित सीज़फायर कागज़ का एक जलता हुआ टुकड़ा बनकर रह गया है। ट्रंप जो कल तक कह रहे थे कि सब कुछ उनके कंट्रोल में है, आज अपने सबसे महंगे जासूसी ड्रोन का मलबा तलाश रहे हैं। यह सुपरपावर की साख पर एक बहुत बड़ा कूटनीतिक और सैन्य तमाचा है।

अमेरिकी नौसेना का एडवांस्ड जासूसी ड्रोन MQ-4C Triton अचानक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के ऊपर पर्शियन गल्फ से गायब हो गया। यह ड्रोन जब गायब हुआ, तब वह एक निगरानी मिशन पर था और करीब तीन घंटे तक होर्मुज जलडमरूमध्य और खाड़ी क्षेत्र में उड़ान भरने के बाद वापस लौट रहा था। लेकिन अचानक इसमें गड़बड़ी शुरू हुई और कुछ ही देर में यह ऑनलाइन ट्रैकिंग सिस्टम से गायब हो गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि गायब होने से ठीक पहले ड्रोन तेज़ी से नीचे गिरता हुआ देखा गया। यह लगभग 50 हजार फीट की ऊँचाई से गिरकर 10 हजार फीट से भी नीचे आ गया। इस ड्रोन के गायब होने से अमेरिका को 200 मिलियन डॉलर यानी लगभग 18.53 अरब रुपये का भारी नुकसान हुआ है।

इस दौरान ड्रोन ने ‘7700 कोड’ भेजा, जो आमतौर पर इमरजेंसी (आपातकाल) की स्थिति में इस्तेमाल होता है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि पहले ‘7400 कोड’ भेजा गया, जो कंट्रोल से संपर्क टूटने का संकेत देता है। हालांकि, अभी तक यह साफ़ नहीं हो पाया है कि ड्रोन के साथ आखिर क्या हुआ? अमेरिकी नौसेना ने इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान देने से इनकार कर दिया है, जिससे रहस्य और गहरा गया है।

डाटा के मुताबिक, ड्रोन इटली के सिगोनेला एयरबेस से उड़ा था और अपने मिशन के बाद वापस लौट रहा था। लेकिन सऊदी अरब के हवाई क्षेत्र में पहुँचते ही इसने अचानक दिशा बदली और ईरान की ओर मुड़ गया। इसी दौरान इसमें तकनीकी या किसी बाहरी हस्तक्षेप की आशंका जताई जा रही है। यानी प्रबल संभावना है कि कहीं ईरान ने ही तो इसे मार नहीं गिराया? यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका का ऐसा ड्रोन विवाद में आया हो; 2019 में भी ईरान ने एक अमेरिकी ड्रोन को मार गिराया था। MQ-4C Triton एक बेहद एडवांस्ड अमेरिकी सर्विलांस ड्रोन है, जिसे खास तौर पर समुद्री इलाकों में लंबी दूरी तक जासूसी के लिए बनाया गया है।

यह करीब 50,000 फीट की ऊँचाई पर उड़ सकता है और 24 घंटे से ज़्यादा समय तक लगातार निगरानी कर सकता है। इसमें ऐसे रडार, हाई-रिजॉल्यूशन कैमरे, इन्फ्रारेड सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस सिस्टम लगे होते हैं, जो दिन-रात और हर मौसम में काम करते हैं। यह दुश्मन के जहाज, पनडुब्बी और सिग्नल तक को ट्रैक कर सकता है और रियल टाइम जानकारी सेना तक पहुँचाता है। हालांकि, यह हथियारबंद नहीं होता और जैमिंग या हमले का शिकार हो सकता है। ऐसे में पूरा मामला फिलहाल पेचीदा है; न तो ईरान और न ही अमेरिका की ओर से कोई आधिकारिक बयान आया है।

हालांकि, अब तक सीज़फायर की फाइनल डील पर जो बातें होनी थीं, उसमें बड़ा अपडेट आया है। खबर पक्की है कि ईरान की टीम पाकिस्तान नहीं पहुँची है। ट्रंप के रणनीतिकार जेडी वांस इस्लामाबाद में इंतज़ार ही करते रह गए, लेकिन तेहरान से कोई नहीं आया। ईरान ने साफ संदेश भेज दिया है कि जब तक इज़राइल लेबनान पर हमले बंद नहीं करता, तब तक किसी भी मेज़ पर बातचीत मुमकिन नहीं है।

ईरान ने ट्रंप को आइना दिखाते हुए कहा है कि आप एक तरफ तो शांति का ड्रामा करते हैं और दूसरी तरफ नेतन्याहू को लेबनान में बेगुनाहों का खून बहाने की खुली छूट देते हैं। तेहरान ने साफ कर दिया है कि वह किसी के दबाव में आकर अपनी शर्तों से समझौता नहीं करेगा। यह ट्रंप की विदेश नीति की अब तक की सबसे बड़ी और शर्मनाक नाकामी है। दूसरी ओर होर्मुज, जो दुनिया की आर्थिक रग है, वहाँ इस वक्त ईरान का मुकम्मल कब्ज़ा है। पिछले 24 घंटों में वहाँ से सिर्फ 6 जहाज गुज़रे हैं। और जानते हैं क्यों?

क्योंकि ईरान ने अब ‘टोल टैक्स’ वसूलना शुरू कर दिया है। ईरान की नई नीति के मुताबिक, हर एक बैरल तेल पर एक डॉलर का टैक्स देना होगा। लेकिन असली पेच तो पेमेंट के तरीके में है। ईरान ने अमेरिकी डॉलर को ठेंगा दिखाते हुए पेमेंट के लिए ‘क्रिप्टो करेंसी’ अपनाई है। इसका मतलब है कि अमेरिका चाहकर भी इन लेन-देन को रोक नहीं सकता और न ही प्रतिबंधों का डर दिखा सकता है। ईरान ने सीधे तौर पर अमेरिकी डॉलर की बादशाहत को चुनौती दे दी है। होर्मुज में फंसी दुनिया अब देख रही है कि कैसे एक मुल्क ने सुपरपावर की नाकेबंदी को ही अपनी कमाई का ज़रिया बना लिया है।

हालांकि, ईरान के इस कड़े फैसले के बाद ब्रिटेन बिलबिला उठा है। ब्रिटिश सरकार ने आधिकारिक बयान जारी कर होर्मुज में टोल टैक्स लेने का कड़ा विरोध किया है। ब्रिटेन का कहना है कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार के इतिहास में एक नई और खतरनाक मिसाल है। लेकिन सवाल तो ये है कि जब इज़राइल अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाता है, तब ये मुल्क खामोश क्यों रहते हैं?

आज जब ईरान ने अपनी सुरक्षा के लिए अपनी ज़मीन और समंदर का इस्तेमाल करना शुरू किया, तो पूरी पश्चिमी दुनिया को दर्द हो रहा है। दरअसल, ब्रिटेन और अमेरिका को डर इस बात का है कि अगर ईरान इस क्रिप्टो टैक्स में कामयाब हो गया, तो आने वाले वक्त में कोई भी मुल्क अमेरिका के आर्थिक प्रतिबंधों की परवाह नहीं करेगा। ट्रंप इस वक्त निहत्थे दिखाई दे रहे हैं; वे न तो अपनी नौसेना भेज पा रहे हैं और न ही बातचीत का रास्ता निकाल पा रहे हैं। इस पूरे बवाल की जड़ में बेंजामिन नेतन्याहू हैं।

सीज़फायर की आड़ में नेतन्याहू ने लेबनान में कत्लेआम जारी रखा है। लेबनान के रिहायशी इलाकों पर इज़राइली बमबारी इस बात का सबूत है कि नेतन्याहू को अमन से कोई लेना-देना नहीं है। वे चाहते हैं कि अमेरिका इस जंग में पूरी तरह कूद पड़े ताकि उनकी डूबती हुई राजनीति बच सके। और ट्रंप? ट्रंप साहब तो सिर्फ सुर्खियां बटोरने में लगे हैं। एक तरफ वे कहते हैं कि उन्होंने जंग रुकवा दी, और दूसरी तरफ नेतन्याहू को बारूद और हथियारों की सप्लाई जारी है। यह ट्रंप का दोगलापन ही है जिसने ईरान को और भी आक्रामक बना दिया है। आज जो ड्रोन गिरा है, वह इसी दोगली नीति का नतीजा है।

ऐसे में मिडिल ईस्ट की हालत एक बार फिर निहायत ही नाज़ुक है। ड्रोन का गिरना, ईरान का वार्ता में न जाना और होर्मुज में क्रिप्टो टैक्स—ये सब इस बात की तरफ इशारा कर रहे हैं कि सीज़फायर अब सिर्फ इतिहास की बात न रह जाए। ईरान के सुप्रीम लीडर ने साफ कर दिया है कि वे अब और इंतज़ार नहीं करेंगे। अगर शुक्रवार तक लेबनान में इज़राइल के हमले नहीं रुके, तो होर्मुज से वो 6 जहाज भी नहीं गुज़र पाएंगे। दुनिया तेल की किल्लत और महंगाई के उस दौर में जाने वाली है जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी। ट्रंप और नेतन्याहू की ये जोड़ी पूरी दुनिया को विनाश की तरफ ले जा रही है।

साफ है कि ट्रंप की ‘डीलममेकिंग’ की हवा निकल चुकी है। वे न तो इज़राइल के ‘विलेन’ नेतन्याहू को लगाम लगा पा रहे हैं और न ही ईरान के जज़्बे को तोड़ पा रहे हैं। ईरान ने बिना किसी बड़े धमाके के ही अमेरिका को उसकी औकात दिखा दी है। अब सवाल ये है कि क्या ट्रंप अपनी सेना को होर्मुज में उतारने की जुर्रत करेंगे?

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