बैकडोर एजेंडा ध्वस्त : धुआं-धुआं रणनीति अजेय छवि चकनाचूर

- संविधान संशोधन विधेयक खारिज होने पर विपक्ष का दावा दक्षिणी राज्यों की जीत
- इंदिरा के पोते ने कर दिया कमाल जो कहा वह करके दिखाया नहीं पास होने दिया विधेयक
- संविधान संशोधन विधेयक खारिज
- कांग्रेस ने बताया विपक्ष की जीत, कहा- महिला आरक्षण पर समर्थन अटूट
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। कभी-कभी संसद की दीवारें सिर्फ बहस नहीं सुनतीं इतिहास की करवट भी दर्ज करती हैं। कल का दिन कुछ ऐसा ही था। जब संविधान संशोधन विधेयक का खारिज होना महज एक विधायी प्रक्रिया का अंत नहीं बल्कि सत्ता की एक सोची समझी चाल पर लोकतंत्र की निर्णायक चोट बन गया। विपक्ष ने इसे सीधे-सीधे सरकार का बैकडोर एजेंडा बताया। एक ऐसा एजेंडा जो सामने से नहीं बल्कि चुपचाप संविधान की आत्मा में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा था। और जब यह प्रयास नाकाम हुआ तो सबसे तेज आवाज दक्षिण से उठी एक ऐसी आवाज जिसने सत्ता के गलियारों में गूंज पैदा कर दी। यह सिर्फ हार नहीं थी। यह एक संदेश था। साफ तीखा और असहज करने वाला कि भारत का संविधान किसी एक सत्ता एक विचारधारा या एक राजनीतिक सुविधा का दस्तावेज नहीं है। यह उन विविधताओं का संतुलन है जो उत्तर से दक्षिण पूरब से पश्चिम तक फैली हुई हैं।
संशोधन या संविधान का पुनर्लेखन
विपक्ष का सबसे बड़ा आरोप यही रहा कि यह विधेयक संशोधन के नाम पर पुनर्लेखन का प्रयास था। सवाल उठाया गया कि क्या सरकार धीरे धीरे संविधान की मूल भावना को बदलने की दिशा में काम कर रही है। क्योंकि इतिहास गवाह है कि संविधान में हर संशोधन सिर्फ एक कानूनी बदलाव नहीं होता वह सत्ता और जनता के बीच के रिश्ते को भी परिभाषित करता है। और जब यह रिश्ता एकतरफा होने लगे तो लोकतंत्र का संतुलन डगमगाने लगता है। विपक्ष के नेताओं ने संसद के भीतर और बाहर एक ही बात दोहराई कि यह विधेयक जनता के अधिकारों को सीमित करने और राज्यों की स्वायत्तता को कमजोर करने की कोशिश थी। क्या यह अतिशयोक्ति थी या सचमुच कोई गहरी परत थी जिसे सरकार खुलकर सामने नहीं लाना चाहती थी?
12 सालों में पहली बार ऐसा हुआ
कल की शाम भारत के संसदीय इतिहास में एक बड़े उलटफेर की गवाह बनी। मोदी सरकार द्वारा पेश किया गया 131वां संविधान संशोधन बिल 2026 लोकसभा में पास नहीं हो पाया। पिछले 12 सालों में यह पहला मौका है जब मोदी सरकार का कोई संविधान संशोधन बिल सदन में गिरा हो। दो दिनों तक चली लंबी बहस और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपीलों के बावजूद सरकार जरूरी आंकड़ों का जुगाड़ नहीं कर पाई। सदन में वोटिंग के दौरान बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े जबकि विरोध में 230 सदस्यों ने बटन दबाया। पिछले 12 सालों में यह पहली बार देखा गया कि विपक्ष ने इतनी सटीक रणनीति के साथ सरकार को घेरा। मल्लिकार्जुन खरगे, अखिलेश यादव और ममता बनर्जी जैसे दिग्गज नेताओं के बीच हुए बेहतर तालमेल ने सरकार के रणनीतिकारों को चौंका दिया। विपक्ष ने एक सुर में परिसीमन को चुनावी नक्शा बदलने की साजिश बताकर वोटिंग में सरकार को पछाड़ दिया।
सरकार की चुप्पी रणनीति या स्वीकारोक्ति?
विधेयक के खारिज होने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा सरकार की प्रतिक्रिया को लेकर हुई। न कोई तीखा पलटवार न कोई आक्रामक बयान बस एक नियंत्रित संतुलित चुप्पी। लेकिन राजनीति में चुप्पी भी बोलती है। सरकार की चुप्पी पर सवाल उठने लगे है कि क्या यह चुप्पी एक रणनीतिक विराम है? या फिर एक ऐसी स्वीकारोक्ति जिसे शब्दों में ढालना मुश्किल हो रहा है? क्योंकि अगर यह विधेयक इतना ही जनहितकारी था जैसा कि दावा किया जा रहा था तो उसके खारिज होने पर सत्ता की बेचैनी साफ दिखनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं सरकार की तरफ से जो दिखा वह एक अजीब सी ठंडक दिखाई दी। सरकारी चुप्पी पर और भी कई सवाल उठ रहे है कि क्या सरकार ने जनबूझकर हार स्वीकर की है। क्या इसमें में भी कोई रणनीति और राजनीतिक चाल है क्योंकि राजनीति में हार कर भी बाजी जीती जाती है।




