कानपुर में ‘मृतक’ ने बेची कार! RTO का खेल सुनकर रह जाएंगे दंग
Kanpur RTO Scam: कानपुर RTO में बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। 2022 में मृत आशीष दुबे के नाम पर स्कॉर्पियो कार का ट्रांसफर कर दिया गया। पीड़िता ने फर्जी हस्ताक्षर, कर्मचारियों की मिलीभगत और धमकी देने के आरोप लगाए हैं। मामले की जांच जारी है।

4पीएम न्यूज नेटवर्क: उत्तर प्रदेश के कानपुर में आरटीओ विभाग की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। इस बार मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड में एक मृत व्यक्ति को ‘जिंदा’ दिखाकर कार ट्रांसफर करने का है। आरोप इतने चौंकाने वाले हैं कि सुनने वाला भी हैरान रह जाए। जिस व्यक्ति की मौत साल 2022 में हो चुकी थी, उसके नाम से कथित तौर पर दस्तावेज तैयार हुए, हस्ताक्षर किए गए और कार का ट्रांसफर भी पूरा हो गया। यह मामला सामने आने के बाद परिवहन विभाग, आरटीओ कार्यालय और स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं। पीड़ित परिवार का आरोप है कि पूरे मामले में फर्जीवाड़ा, दस्तावेजों की हेराफेरी और कर्मचारियों की मिलीभगत शामिल है।
2021 में खरीदी थी स्कॉर्पियो, 2022 में हो गई मौत
कानपुर के कल्याणपुर बारासिरोही निवासी गरिमा दुबे के मुताबिक उनके पति आशीष दुबे ने वर्ष 2021 में एक स्कॉर्पियो कार खरीदी थी। लेकिन नवंबर 2022 में उनकी मृत्यु हो गई। पति की मौत के बाद कार लंबे समय तक घर पर ही खड़ी रही। कुछ समय बाद परिवार ने आर्थिक जरूरतों को देखते हुए वाहन बेचने का फैसला किया। गरिमा दुबे का कहना है कि उन्होंने जूही बारादेवी करपात्री नगर निवासी सिद्धार्थ शुक्ला को कार 9 लाख 30 हजार रुपये में बेचने की सहमति दी। आरोप है कि खरीदार ने 8 लाख 30 हजार रुपये RTGS के जरिए ट्रांसफर किए, जबकि बाकी रकम ट्रांसफर प्रक्रिया पूरी होने के बाद देने की बात कही गई।
चेक के बहाने खुला पूरा खेल
गरिमा दुबे के अनुसार उन्होंने सुरक्षा के तौर पर करीब 1 लाख रुपये का चेक भी लिया था। बाद में आरटीओ प्रक्रिया के नाम पर अतिरिक्त पैसों की मांग की गई। मामला तब संदिग्ध लगा जब फरवरी 2026 में उन्होंने चेक और ट्रांसफर प्रक्रिया की जानकारी के लिए संपर्क किया। उन्हें पता चला कि स्कॉर्पियो कार तो पहले ही 5 अक्टूबर 2025 को सिद्धार्थ शुक्ला के नाम ट्रांसफर हो चुकी है। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि ट्रांसफर प्रक्रिया में उनके दिवंगत पति आशीष दुबे के हस्ताक्षर दिखाए गए। यहीं से पूरे मामले ने बड़ा मोड़ ले लिया।
मृतक के फर्जी हस्ताक्षर का आरोप
पीड़िता ने आरोप लगाया है कि आरटीओ कार्यालय में तैनात महिला बाबू रसना यादव समेत कुछ अन्य कर्मचारियों की मिलीभगत से फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए। आरोप है कि मृतक के नाम से हस्ताक्षर कर वाहन ट्रांसफर की प्रक्रिया पूरी कर दी गई। अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला सिर्फ विभागीय लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आ सकता है। सरकारी रिकॉर्ड में मृत व्यक्ति के नाम से दस्तावेज तैयार होना परिवहन विभाग की सत्यापन प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े करता है।
शिकायत के बाद दबाव और धमकी का आरोप
गरिमा दुबे ने डीसीपी वेस्ट और आरटीओ प्रशासन से मामले की शिकायत कर जांच और कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शिकायत दर्ज कराने के बाद उन पर समझौते का दबाव बनाया जा रहा है। पीड़िता के मुताबिक उन्हें लगातार फोन कॉल आ रहे हैं और कुछ सत्ताधारी दल से जुड़े क्षेत्रीय नेताओं द्वारा मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन शिकायत के बाद बढ़ते दबाव ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है।
आरटीओ प्रशासन ने शुरू की जांच
मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए एआरटीओ प्रशासन आलोक कुमार ने कहा कि शिकायत विभाग के संज्ञान में है और पूरे मामले की जांच कराई जा रही है। उन्होंने कहा कि यदि जांच में किसी कर्मचारी की भूमिका सामने आती है, तो विभागीय कार्रवाई की जाएगी। वहीं डीसीपी वेस्ट एसएम कासिम आब्दी ने बताया कि महिला की शिकायत के आधार पर जांच शुरू कर दी गई है। पुलिस संबंधित आरटीओ अधिकारियों से जानकारी जुटा रही है और दस्तावेजों की भी जांच की जा रही है।
सवालों के घेरे में सत्यापन प्रणाली
यह मामला कई गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर किसी मृत व्यक्ति के नाम से वाहन ट्रांसफर कैसे हो गया? क्या दस्तावेजों का भौतिक सत्यापन नहीं हुआ? क्या बायोमेट्रिक या पहचान सत्यापन की प्रक्रिया को नजरअंदाज किया गया? विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि सरकारी विभागों में रिकॉर्ड सत्यापन की प्रक्रिया मजबूत नहीं हुई, तो इस तरह के मामले आम लोगों का भरोसा कमजोर कर सकते हैं। खासकर वाहन ट्रांसफर जैसे मामलों में दस्तावेजों की प्रामाणिकता और पहचान की पुष्टि बेहद जरूरी मानी जाती है।
जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
फिलहाल पूरे मामले की जांच जारी है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि जांच में क्या सामने आता है और क्या दोषियों पर कार्रवाई होती है या नहीं। अगर आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला कानपुर के आरटीओ सिस्टम में बड़े फर्जीवाड़े की परतें खोल सकता है।
रिपोर्ट – प्रांजुल मिश्रा
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