जस्टिस वर्मा पर जांच का काम खत्म, अब फैसला ओम बिरला के हाथ
इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ नकदी आरोपों की जांच रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी गई है.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ नकदी आरोपों की जांच रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी गई है. अब इसे संसद के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाएगा. वर्मा के सरकारी आवास से बेहिसाब नकदी मिलने के बाद उनके खिलाफ जांच शुरू की गई थी.
इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज यशवंत वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की जांच कर रही जजेज इंक्वायरी कमेटी ने सोमवार (18 मई) को अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी. मार्च 2025 में वर्मा के आधिकारिक आवास से कथित तौर पर बेहिसाब नकदी मिलने के बाद उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू की गई थी.
अधिकारियों के मुताबिक, यह रिपोर्ट जजेज (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत तय प्रक्रिया के अनुसार सौंपी गई है. अब इसे संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखा जाएगा. माना जा रहा है कि संसद के आगामी मानसून सत्र में इस पर चर्चा हो सकती है. लोकसभा अध्यक्ष ने 12 अगस्त, 2025 को तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया गया था.
घर से मिली थी जली हुई नकदी
दरअसल 14 मार्च 2025 की रात जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी बंगले में आग लग गई थी. आग बुझाने पहुंचे दमकलकर्मियों को एक स्टोर रूम में भारी मात्रा में जली हुई नकदी मिली थी. इस खुलासे के बाद न्यायपालिका और राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया था.
तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन
इसके बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा गठित इन-हाउस कमेटी ने जांच की. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जिस स्टोर रूम से नकदी मिली उस पर जस्टिस वर्मा का प्रत्यक्ष या मौन नियंत्रण था. वहीं जुलाई 2025 में 200 से अधिक सांसदों ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे. इसके बाद अगस्त 2025 में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था. इस समिति का काम आरोपों की जांच कर रिपोर्ट तैयार करना था. समिति ने विस्तृत जांच के बाद अब अपनी रिपोर्ट स्पीकर को सौंप दी है.
जस्टिस वर्मा ने दिया इस्तीफा
हालांकि संसद द्वारा पद से हटाए जाने की संभावना का सामना करते हुए जस्टिस वर्मा ने हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया, जिससे उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही निष्फल हो गई.
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों के अनुसार, कोई भी न्यायाधीश राष्ट्रपति को इस्तीफा सौंपने और उसकी प्रति सार्वजनिक करने के बाद पद छोड़ चुका माना जाता है. इस्तीफा राष्ट्रपति की स्वीकृति पर निर्भर नहीं होता, बल्कि बाद में केवल औपचारिक अधिसूचना जारी की जाती है. प्रक्रिया के अनुसार राष्ट्रपति औपचारिक स्वीकृति देते हैं, जिसके बाद विधि मंत्रालय के न्याय विभाग द्वारा इसकी सूचना दी जाती है. इसी आधार पर विशेषज्ञों का मानना है कि अब जस्टिस वर्मा एक निजी नागरिक माने जाएंगे और संसद किसी पूर्व न्यायाधीश को पद से नहीं हटा सकती.
संसद में पेश की जाएगी रिपोर्ट
विशेषज्ञों के अनुसार, जस्टिस वर्मा के इस्तीफे का जांच समिति के काम पर कोई असर नहीं पड़ा, क्योंकि जांच उस समय शुरू हुई थी जब वह पद पर थे. समिति ने अपना काम पूरा कर रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी है और अब इसे संसद के दोनों सदनों में पेश किया जाएगा. ऐसे में अब नजर इस बात पर रहेगी कि संसद के दोनों सदन इस रिपोर्ट पर क्या रुख अपनाते हैं.



