कॉकरोच का आक्रोश, सरकार की सिट्टी पिट्टी गुम

- एक दिन के प्रदर्शन की मिली अनुमति
- अभिजीत दिपके पहुंचे जंतर-मंतर, भरी हुंकार
- युवाओं की उमड़ी भीड़
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। दिल्ली का जंतर-मंतर आज एक बार फिर नारों और जनसैलाब से लबरेज हैं। अन्ना आंदोलन के बाद ऐसा महौल पहली बार बन रहा है जिसे सरकार के लिए चुनौती कहा जा सके। आज एक बार फिर सत्ता और सड़क के बीच टकराव का नैरेटिव बनता दिखायी दे रहा है। हाथ में संविधान चेहरे पर चुनौती और आवाज में विद्रोह का स्वर लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रमुख अभिजीत दिपके जंतर-मंतर पहुंच चुके हैं। पुलिस प्रशासन ने प्रदर्शन के लिए महज एक दिन की अनुमति दी है लेकिन सवाल यह है कि क्या यह विरोध सिर्फ एक दिन का रहेगा या फिर आने वाले दिनों में यह सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक परीक्षा बन जाएगा? नीट विवाद को लेकर देशभर में छात्रों और अभिभावकों के बीच जो बेचैनी और असंतोष दिखाई दिया उसी जमीन पर यह आंदोलन खड़ा होने की कोशिश कर रहा है। दिपके और उनके समर्थक इसे केवल परीक्षा व्यवस्था का मामला नहीं बल्कि युवाओं के भविष्य और व्यवस्था की जवाबदेही का प्रश्न बता रहे हैं। दूसरी ओर सरकार और उसके समर्थकों का तर्क है कि जांच एजेंसियां अपना काम कर रही हैं और राजनीतिक दल इस मुद्दे को हवा देकर लाभ उठाना चाहते हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह आंदोलन ऐसे समय में खड़ा हो रहा है जब बेरोजगारी भर्ती परीक्षाओं में देरी और युवाओं की बढ़ती नाराजगी पहले से ही राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनी हुई है। ऐसे में यदि जंतर-मंतर का यह प्रदर्शन सोशल मीडिया से निकलकर देश के दूसरे शहरों तक पहुंचता है तो इसके राजनीतिक असर को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
चुनौतियों के बीच जोश हाई
हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। पुलिस की ओर से सीमित अनुमति, प्रशासनिक निगरानी और अदालतों में चल रही प्रक्रियाएं इस आंदोलन की गति को प्रभावित कर सकती हैं। इतिहास गवाह है कि कई आंदोलन शुरुआती शोर के बाद ठंडे पड़ गए जबकि कुछ ने राष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदल दी। फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि जंतर-मंतर पर अभिजीत दिपके की मौजूदगी ने एक नया राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या यह केवल एक विरोध प्रदर्शन है या फिर युवाओं के असंतोष को संगठित राजनीतिक शक्ति में बदलने की शुरुआत? आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि यह हुंकार दिल्ली की सीमाओं तक सिमट जाती है या फिर देश की राजनीति में एक नए अध्याय की भूमिका लिखती है। अभी के लिए जंतर-मंतर पर नजरें हैं सरकार पर सवाल हैं और जवाब का इंतजार पूरे देश को है।
कार्रवाई की बजाय हमारी पोस्ट डिलीट करवा रहे : दीपके
कॉकरोच जनता पार्टी के फाउंडर अभिजीत दिपके ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह परीक्षाओं और भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के आरोप में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे सहित उनकी मांगों पर ध्यान देने के बजाय संगठन की सोशल मीडिया पर ज्यादा ध्यान दे रही है उन्होंने कहा, मेरे दोस्तों, यह एक लंबा संघर्ष है। सोशल मीडिया पर प्रधान के इस्तीफे की मांग शुरू किए हुए एक महीना हो गया है, लेकिन ये लोग इतने बेशर्म हैं कि कार्रवाई करने के बजाय, वे अन्य कामों में लगे हुए हैं, जैसे हमारे अकाउंट हैक करना और हमारी पोस्ट को डिलीट करवाना, आप हमारी पोस्ट डिलीट कर सकते हैं, लेकिन आप हमें इस मंच से मिटा नहीं सकते।
क्या अन्ना आंदोलन जैसी लहर बन पाएगा कॉकरोच आंदोलन?
अभिजीत दीपके के आंदोलन को अन्ना के आंदोलन से जोड़कर देखा जा रहा है और सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह आंदोलन भी अन्ना के आंदोलन जैसा होगा? विशेषज्ञों के मुताबिक 11 में जंतर मंतर पर अन्ना हजारे का आंदोलन केवल एक व्यक्ति का आंदोलन नहीं था। वह जनता के भीतर वर्षों से जमा भ्रष्टाचार विरोधी गुस्से का विस्फोट था। सड़कों पर छात्र थे मध्य वर्ग था सामाजिक संगठन थे और मीडिया का अभूतपूर्व समर्थन अन्ना के आंदोलन को मिला था। कॉकरोच आंदोलन की चुनौती भी यही है। क्या वह नीट विवाद और युवाओं के असंतोष को एक व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन में बदल पाएगा? यह बड़ा सवाल है। फिलहाल इसके पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह है कि देश का युवा वर्ग भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक, रोजगार और अवसरों को लेकर पहले से बेचैन दिखाई देता है। यदि यह आंदोलन खुद को केवल एक परीक्षा या एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं रखता और शिक्षा तथा रोजगार सुधार जैसे बड़े मुद्दों को उठाता है तो इसकी पहुंच बढ़ सकती है। लेकिन दूसरी तरफ कठिनाइयां भी कम नहीं हैं। अन्ना आंदोलन के पीछे दशकों से स्थापित सामाजिक कार्यकर्ता की विश्वसनीयता थी। वहीं आज का राजनीतिक माहौल कहीं अधिक ध्रुवीकृत है।
मीडिया पर इस आंदोलन को कम दिखाने का दबाव बनाया जा रहा : राउत
महाराष्ट्र से शिवसेना यूबीटी सांसद संजय राउत ने कहा है कि यह अच्छी बात है कि युवाओं ने एक मुद्दे पर आंदोलन खड़ा किया है। सरकार इस आंदोलन को दबाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की जा रही है। मीडिया पर भी इस आंदोलन को कम दिखाने का दबाव बनाया जा रहा है। यदि जंतर-मंतर का आंदोलन सफल होता है तो सरकार को इसकी गंभीरता समझनी पड़ेगी। सरकार नहीं चाहती कि यह आंदोलन देशभर के युवाओं तक पहुंचे, इसलिए प्रशासनिक और पुलिस तंत्र का इस्तेमाल किया जा रहा है। हजारों युवा सड़कों पर उतर सकते हैं और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कर सकते हैं अगर पीएम मोदी मंत्री का इस्तीफा नहीं लेते तो स्वच्छ प्रशासन की बात करना उचित नहीं होगा।
दुविधा में राजनीतिक दल
कॉकरोच जनता पार्टी के इस प्रर्दशन ने विपक्षी दलों के सामने भी एक दिलचस्प राजनीतिक दुविधा खड़ी कर दी है। इसके समर्थन और विरोध के लिए बाकयदा अंदरखाने मीटिंग का दौर चल रहा है और वेट एंड वाच पालिसी पर अमल। चाहे बीजेपी हो या कांग्रेस या फिर क्षेत्रीय दल सभी पार्टिया सूरते हाल पर नजरे गढ़ाये हुए हैं और आंदोलन का रूख देख रही है कि यह तेज होता है, कमजोर होता है या फिर मध्यम गति से आगे बड़ता है जोभी देश की जमी जमाई सियास की खाई पर क्या कॉकरोच असर डाल पाएंगे यह देखना होगा। कांग्रेस के लिए यह मुद्दा स्वाभाविक रूप से सरकार को घेरने का अवसर है। पार्टी लंबे समय से बेरोजगारी, पेपर लीक और युवाओं के भविष्य को लेकर केंद्र सरकार पर हमलावर रही है। इसलिए कांग्रेस इस आंदोलन के मुद्दों का समर्थन कर सकती है, लेकिन वह नेतृत्व किसी दूसरे राजनीतिक मंच के हाथ में जाने देना भी नहीं चाहेगी। समाजवादी पार्टी की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही होगी। उत्तर प्रदेश में प्रतियोगी परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रियाओं का मुद्दा हमेशा राजनीतिक असर रखता है। सपा युवाओं के मुद्दे पर सरकार को घेरने का मौका नहीं छोड़ेगी, लेकिन वह भी आंदोलन का श्रेय किसी नए राजनीतिक समूह को नहीं देना चाहेगी। आम आदमी पार्टी, वाम दल, राष्ट्रीय जनता दल और कुछ क्षेत्रीय दल भी नैतिक समर्थन की राह चुन सकते हैं।




