गडकरी पर भड़के राज ठाकरे, राम मंदिर विवाद पर घमासान, अखिलेश ने लगाई लंका!
बीजेपी के एक सांसद ने कहा कि राम मंदिर में चोरी हुई, लेकिन बाकी किसी ने कुछ नहीं कहा. 15 ट्रस्टियों में से 12 की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है और वे 12 लोग आरएसएस और बीजेपी से जुड़े हैं.''

4पीएम न्यूज नेटवर्क: भाजपा राज में जो हो जाये वही कम है। जिस मंदिर के नाम पर सत्ता में आये आज उसी में चंदा चोरी जैसी घटना हो रही है। और सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई है।
लेकिन विपक्ष इस मामले को लेकर लगातार सवाल उठा रहा है और जमकर घेर रहा है। न सिर्फ यूपी में बल्कि हर राज्य में इस मामले को लेकर लोगों में आक्रोश है। इसी बीच महाराष्ट्र में विपक्षी नेता भी आगबबूला नजर आ रहे हैं। इसी कड़ी में MNS प्रमुख ने राम मंदिर में दान चोरी के मामले का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा, ”राम मंदिर के मुद्दे पर कहा जाता है कि धर्म का अपमान हुआ.
अगर 14 करोड़ रुपये की चोरी होती है, श्रद्धालुओं द्वारा श्रद्धा से दिया गया धन चोरी हो जाता है, तो उस पर बात नहीं करनी चाहिए क्या? क्या यह देश धर्म विरोधी है? बीजेपी के एक सांसद ने कहा कि राम मंदिर में चोरी हुई, लेकिन बाकी किसी ने कुछ नहीं कहा. 15 ट्रस्टियों में से 12 की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है और वे 12 लोग आरएसएस और बीजेपी से जुड़े हैं.”
राज ठाकरे ने आगे कहा, ”1400 करोड़ रुपये का आंकड़ा सामने आया है, लेकिन वास्तव में कितनी चोरी हुई, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है. अगर किसी दूसरे दल की सरकार होती और यह चोरी होती, तो बीजेपी और आरएसएस क्या करते? आंदोलन करते, मोर्चे निकालते, लेकिन अब आपकी सरकार है, इसलिए कहा जाता है कि इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए.
इतना ही इथनोल पर चल रहे बवाल पर उन्होंने कहा ”सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी इथेनॉल को पेट्रोल में मिलाने के फायदे बता रहे हैं, जबकि इस विषय पर पेट्रोलियम मंत्री को बोलना चाहिए. लेकिन वे इस पर कुछ नहीं कहते. किसका काम कौन कर रहा है, यह समझ में नहीं आता. जिसकी सरकार होगी, उससे सवाल पूछे जाएंगे. आज बीजेपी की सरकार है, इसलिए अगर गलती होगी तो हम जरूर बोलेंगे.
भाजपा सरकार कई मुद्दों को लेकर सवालों के घेरे में है। चढ़ावा चोरी का मामला यूपी में भी खूब गर्म है। इस मामले को लेकर समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने अयोध्या राम मंदिर में दान चोरी के मुद्दे पर एक बार फिर बीजेपी पर हमला बोला है.
उन्होंने कहा कि सजा सिर्फ घोड़े या लगाम को नहीं, कोचवान को भी मिलनी चाहिए. चंपत राय का बिना नाम लिए सपा प्रमुख ने कहा कि इस्तीफा बच निकलने का रास्ता नहीं बनना चाहिए. इस्तीफे की लीपा-पोती से काम नहीं चलेगा. इसके साथ ही उन्होंने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को भंग किए जाने की भी मांग की.
अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ”ये कैसी पाबंदी है कि आरोपियों का स्वागत पुलिस दरवाजा खोलके कर रही है. ड्राइवर फँसता तो मालिक भी फँसता है. जिसका नाम अंतरिम रिपोर्ट में नहीं है, उसका अंतिम में कैसे होगा. जिसके ऊपर फोड़ा ‘ठीकरा’, वो तो रिपोर्ट के हिसाब से काफ़ी ठीक रहा.”
उन्होंने आगे कहा, ”अगर CDR निकाली जाए तो पता चलेगा सबसे ज्यादा फोन भाजपा के लोगों के ही आए हैं जो भाजपा छोड़कर इधर आना चाहते हैं. जनता ने भाजपाइयों की नाकाबंदी कर दी है. जो लोग दूर से बैठकर आरोप लगा रहे हैं, लगता है उनकी भी इस महाकांड में हिस्सेदारी है. उनकी आमदनी की नहर बंद हो गई है, इसीलिए छटपटा रहे हैं.”
अखिलेश यादव ने आगे कहा, ”सिर्फ खांचा नहीं पूरा ढांचा बदलना चाहिए. पूरा ट्रस्ट भंग होना चाहिए. सजा सिर्फ घोड़े या लगाम को नहीं, कोचवान को भी मिलनी चाहिए. जिम्मेदारी सिर्फ उसकी नहीं जिसको दी गई, बल्कि जिसने जिम्मेदारी दी उसकी भी तय होनी चाहिए. केवल इस्तीफे की लीपा-पोती से काम नहीं चलेगा. जो लोग हटे हैं, उनके हस्ताक्षर से हुए सभी भू-सौदों और अन्य कार्यों के लिए न्यायिक जांच बैठाई जाए.” उन्होंने कहा “इस्तीफा बच निकलने का रास्ता नहीं बनना चाहिए.
वहीं इसको लेकर कांग्रेस नेता सुरेंद्र राजपूत ने दावा किया कि मंदिर में श्रद्धालुओं की तरफ से दिए गए दान में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुई हैं और इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. राजपूत ने आरोप लगाया कि दान में गड़बड़ी केवल वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं, बल्कि सनातन धर्म की आस्था से जुड़ा विषय है.
सुरेंद्र राजपूत ने बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि ट्रस्ट की तरफ से 84 करोड़ रुपये में मंदिर से लगभग आठ किलोमीटर दूर जमीन खरीदने पर भी सवाल उठाए. उन्होंने पूछा कि जब मंदिर की अपनी कोई गौशाला नहीं है, तो उस जमीन पर उगाए जा रहे चारे का उपयोग किसके लिए किया जा रहा है.
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि राम मंदिर ट्रस्ट को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखा गया है. उनका कहना था कि यदि ट्रस्ट पूरी तरह धार्मिक संस्था है, तो उसमें बीजेपी से जुड़े लोगों को प्रमुख पदों पर क्यों नियुक्त किया गया?
राजपूत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने मंदिर का भूमिपूजन किया. ट्रस्ट का गठन कराया और शीर्ष स्तर की नियुक्तियां भी हुईं. ऐसे में यदि दान में कथित अनियमितता हुई है, तो सरकार जवाबदेही से बच नहीं सकती. उन्होंने दावा किया कि राम मंदिर ट्रस्ट के अनुसार कुंभ के दौरान लगभग 16 करोड़ श्रद्धालुओं ने अयोध्या का दौरा किया था. उनके अनुसार, इतने बड़े स्तर पर प्राप्त दान को देखते हुए कथित वित्तीय गड़बड़ी की निष्पक्ष जांच आवश्यक है.
वहीं, एसआईटी जांच पर सवाल उठाते हुए राजपूत ने आरोप लगाया कि जांच समिति के प्रमुख वीबी पंत के खिलाफ पहले से एफआईआर दर्ज है. उन्होंने पूछा कि जिस व्यक्ति पर स्वयं आरोप हों, उसे जांच की जिम्मेदारी कैसे सौंपी जा सकती है. उन्होंने पूर्व पुजारी महंत लाल दास का भी उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने राम मंदिर के राजनीतिकरण का विरोध किया था. उनके अनुसार, दानपात्र से 10 रुपये नहीं रखने के आरोप में उन्हें पद से हटा दिया गया था और बाद में उनकी हत्या कर दी गई. राजपूत ने इस पूरे घटनाक्रम की भी निष्पक्ष जांच की मांग की.
उन्होंने यह भी दावा किया कि राजस्थान के उद्योगपति राकेश सिंह ने मंदिर निर्माण के लिए मुफ्त पत्थर देने की घोषणा की थी, इसके बावजूद पत्थरों की खरीद की गई. साथ ही उन्होंने कहा कि L&T ने एक रुपये में मंदिर निर्माण करने की बात कही थी, लेकिन निर्माण पर लगभग 2,100 करोड़ रुपये खर्च किए गए.
यह विवाद चरम पर है। लेकिन यह विवाद तब और बढ़ गया जब कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक दलों ने दान राशि के उपयोग, लेखा-जोखा और ऑडिट प्रक्रिया पर सवाल उठाने शुरू किए।
उनका कहना था कि जब करोड़ों श्रद्धालु अपनी आस्था के साथ दान देते हैं तो उसके उपयोग की पूरी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। दूसरी तरफ ट्रस्ट से जुड़े लोगों का कहना था कि मंदिर निर्माण और संचालन से जुड़ी सभी प्रक्रियाएं तय नियमों के अनुसार चल रही हैं और आरोप केवल राजनीतिक उद्देश्य से लगाए जा रहे हैं।
सरकार की भूमिका को लेकर भी कई सवाल उठे। आलोचकों का कहना है कि यदि किसी भी प्रकार के आरोप सामने आते हैं तो सरकार और संबंधित एजेंसियों को तुरंत पारदर्शी जांच करानी चाहिए ताकि लोगों के मन में कोई संदेह न रहे।
उनका आरोप है कि मामले पर स्पष्ट और विस्तृत जानकारी समय पर सामने नहीं आई, जिससे अफवाहों और विवादों को बढ़ावा मिला। कुछ लोगों का मानना है कि प्रशासन को शुरुआत से ही दान राशि, खर्च और ऑडिट रिपोर्ट को सार्वजनिक मंचों पर उपलब्ध कराना चाहिए था, जिससे विवाद की गुंजाइश कम रहती।
हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि चोरी या वित्तीय गड़बड़ी के आरोप तभी साबित माने जाते हैं जब जांच एजेंसियां या अदालतें उन्हें प्रमाणित करें। अब तक सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर कई आरोप राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं, लेकिन अंतिम सत्य जांच और आधिकारिक रिपोर्टों से ही सामने आ सकता है। इसलिए इस पूरे मामले को केवल आरोपों के आधार पर नहीं बल्कि तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर देखना चाहिए।
इस विवाद ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है कि देश के बड़े धार्मिक संस्थानों में आने वाले दान के प्रबंधन को और अधिक पारदर्शी कैसे बनाया जाए। श्रद्धालु चाहते हैं कि उनकी आस्था से जुड़ा हर रुपया सही जगह खर्च हो और उसका स्पष्ट हिसाब जनता के सामने रखा जाए।
ऐसे मामलों में सरकार, ट्रस्ट और प्रशासन की जिम्मेदारी होती है कि वे समय-समय पर जानकारी साझा करें, स्वतंत्र ऑडिट कराएं और किसी भी शिकायत की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करें। यदि ऐसा किया जाए तो न केवल विवाद कम होंगे बल्कि लोगों का विश्वास भी और मजबूत होगा।



