1695 रुपये वाले LPG सिलेंडर पर कैसे मिलती है छूट? सरकार ने दी जानकारी

रसोई गैस (LPG) के दाम बढ़ने की खबरें अक्सर लोगों की चिंता बढ़ा देती हैं. हर महीने करोड़ों परिवारों का बजट इस बात पर निर्भर करता है कि गैस सिलेंडर कितने रुपये में मिलेगा.

4पीएम न्यूज नेटवर्क: क्या आपने कभी सोचा है कि इंटरनेशनल मार्केट में गैस महंगी होने के बावजूद घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत अचानक क्यों नहीं बढ़ती? संसद में सरकार ने बताया कि लोगों को राहत देने के लिए वह तेल कंपनियों को हजारों करोड़ रुपये की आर्थिक मदद दे रही है. इसके बावजूद कंपनियों पर 51 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का घाटा है.

रसोई गैस (LPG) के दाम बढ़ने की खबरें अक्सर लोगों की चिंता बढ़ा देती हैं. हर महीने करोड़ों परिवारों का बजट इस बात पर निर्भर करता है कि गैस सिलेंडर कितने रुपये में मिलेगा. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर इंटरनेशनल मार्केट में गैस बहुत महंगी हो जाए, तब भी भारत में घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत अचानक क्यों नहीं बढ़ती? इसका जवाब सरकार की उस आर्थिक मदद में छिपा है, जो वह सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) को देती है.

राज्यसभा में सरकार ने बताया कि देश के लोगों को सस्ती दर पर घरेलू एलपीजी उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार लगातार हजारों करोड़ रुपये खर्च कर रही है. सरकार का कहना है कि अगर यह मदद नहीं दी जाती, तो घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत मौजूदा कीमत से कहीं ज्यादा होती. यही वजह है कि बाजार में गैस महंगी होने के बावजूद उपभोक्ताओं पर उसका पूरा बोझ नहीं डाला जाता. संसद में दिए गए जवाब के मुताबिक, सरकार ने साल 2022-23 में तेल कंपनियों को 22 हजार करोड़ रुपये का मुआवजा दिया था. वहीं साल 2025-26 और 2026-27 के लिए 30-30 हजार करोड़ रुपये देने का प्रावधान किया गया है.

सरकारी तेल कंपनियों को कितना घाटा?
सरकार ने यह भी बताया कि केवल मुआवजा देने से ही तेल कंपनियों का पूरा नुकसान नहीं भर पाया है. 30 जून 2026 तक सरकारी तेल कंपनियों को घरेलू एलपीजी बेचने पर 51 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का कुल घाटा (अंडर-रिकवरी) हो चुका था. जून 2026 में इंटरनेशनल मार्केट के हिसाब से 14.2 किलो वाले घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत 1,695 रुपये तक पहुंच गई थी, लेकिन लोगों को यही सिलेंडर 942 रुपये में दिया गया.

उज्ज्वला योजना वालों को और सस्ता सिलेंडर
यानी एक सिलेंडर पर 700 रुपये से ज्यादा का बोझ सरकार और तेल कंपनियों ने उठाया. जुलाई 2026 में भी प्रति सिलेंडर 500 रुपये से ज्यादा की अंडर-रिकवरी बनी रही. सरकार ने यह भी बताया कि उज्ज्वला योजना के 10.5 करोड़ से ज्यादा लाभार्थियों को 300 रुपये की अतिरिक्त सब्सिडी मिलने के बाद दिल्ली में गैस सिलेंडर की प्रभावी कीमत सिर्फ 642 रुपये रह गई. सरकार का कहना है कि उसका मकसद हर घर तक गैस की नियमित और सस्ती आपूर्ति बनाए रखना है.

2022-23 में सरकार ने OMCs को 22,000 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया.
2025-26 और 2026-27 में 30-30 हजार करोड़ रुपये देने का प्रावधान किया गया है.
30 जून 2026 तक घरेलू LPG पर तेल कंपनियों का 51 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का घाटा हो चुका था.

942 रुपये में कैसे मिल रहा है गैस सिलेंडर?
सरकार के मुताबिक, जून 2026 में इंटरनेशनल मार्केट में एलपीजी की कीमत तेजी से बढ़ गई थी. उस समय 14.2 किलो वाले घरेलू गैस सिलेंडर की बाजार आधारित कीमत (MDP) 1,695 रुपये तक पहुंच गई थी. इसके बावजूद उपभोक्ताओं से केवल 942 रुपये ही लिए गए. यानी एक सिलेंडर पर 700 रुपये से ज्यादा का अंतर सरकार और सरकारी तेल कंपनियों ने मिलकर संभाला. यही वजह है कि लोगों को बाजार भाव से काफी कम कीमत पर गैस सिलेंडर मिल रहा है.

उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को कितना फायदा?
सरकार के मुताबिक, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) के 10.5 करोड़ से ज्यादा परिवारों को रसोई गैस सस्ती दर पर उपलब्ध कराने के लिए विशेष राहत दी जा रही है. इन लाभार्थियों को सामान्य उपभोक्ताओं के मुकाबले हर 14.2 किलोग्राम के LPG सिलेंडर पर 300 रुपये की अतिरिक्त सब्सिडी मिल रही है. इसके अलावा, इंटरनेशनल मार्केट में LPG की बढ़ी हुई कीमत का बड़ा हिस्सा भी सरकार और सरकारी तेल कंपनियां खुद वहन कर रही हैं.

यही वजह है कि जहां घरेलू गैस सिलेंडर की वास्तविक लागत काफी अधिक है, वहीं दिल्ली में उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को एक सिलेंडर सिर्फ 642 रुपये में मिल रहा है. सरकार का कहना है कि इस व्यवस्था से महंगाई के दौर में गरीब और कम आय वाले करोड़ों परिवारों पर रसोई गैस का आर्थिक बोझ कम हुआ है और उन्हें राहत मिली है.

तेल कंपनियों को इतना नुकसान क्यों हो रहा है?
सरकार के अनुसार, घरेलू एलपीजी की कीमत इंटरनेशनल मार्केट से जुड़ी होती है. वर्ष 2026 में पश्चिम एशिया संकट के कारण एलपीजी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई. लेकिन सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं पर इसका पूरा असर नहीं पड़ने दिया. इसी वजह से सरकारी तेल कंपनियों को कम कीमत पर सिलेंडर बेचना पड़ा और उन्हें भारी अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ा. 30 जून 2026 तक यह घाटा 51 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुका था.

पश्चिम एशिया संकट का क्या असर पड़ा?
सरकार ने संसद में बताया कि भारत अपनी एलपीजी जरूरत का करीब 60% आयात करता था और उसमें से लगभग 90% सप्लाई होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आती थी. पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने के बाद इस रास्ते से आपूर्ति प्रभावित हुई. इसके बाद सरकार ने देश में एलपीजी उत्पादन बढ़ाया, दूसरे देशों से आयात शुरू किया, स्टॉक बढ़ाया और राज्यों के बीच आपूर्ति का बेहतर प्रबंधन किया. सरकार का दावा है कि संकट के बावजूद देश में कहीं भी घरेलू गैस की सप्लाई नहीं रुकी. मार्च से जून 2026 के बीच 56 करोड़ से ज्यादा घरेलू गैस सिलेंडर वितरित किए गए, जिनमें 12 करोड़ से ज्यादा सिलेंडर उज्ज्वला परिवारों को मिले.

कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव
सरकार ने बताया कि इंटरनेशनल मार्केट में ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें लगातार बदल रही हैं. 30 अप्रैल 2026 को एक बैरल ब्रेंट क्रूड की कीमत 122.86 डॉलर थी, जो 2 जुलाई 2026 तक घटकर 68.17 डॉलर रह गई. हालांकि, यह राहत ज्यादा दिन नहीं रही और 22 जुलाई 2026 को कीमत फिर बढ़कर 94.17 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई. सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस तरह के उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारत पर पड़ता है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का करीब 88% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. इसलिए वैश्विक कीमतों में बदलाव से पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की लागत भी प्रभावित होती है.

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