हाथ में इलायची, मुंह में कैंसर, अर्थ का अनर्थ करता ब्रांडिंग बाजार

  • शाहरूख, अजय देवगन और टाइगर श्राफ को एफडीए का नोटिस 
  • महाराष्ट्र एफडीए के नोटिस से दिल्ली हाई कोर्ट तक पहुंचा मामला
  • क्या दूसरे उत्पाद के नाम से उसी ब्रांड की पहचान को घर-घर पहुंचाया जा रहा है? 
  • छह साल पहले कोरोना काल में पान मसाला पर 4PM संपादक संजय शर्मा की पीआईएल वाला सवाल फिर सामने
  • 4PM संपादक संजय शर्मा की पीआईएल वाला सवाल फिर सामने
  • शाहरुख अजय और टाइगर के विज्ञापन पर सवाल
4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। विज्ञापन इलायची का ब्रांडिग पान मसाले की, विज्ञापन कपड़ों का ब्रांडिंग सिगरेट की, विज्ञापन ताकत का ब्रांडिग सेक्स प्रोडक्ट की। अर्थ का अनर्थ करते विज्ञापन बाजार ने समाज को ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां से हर रास्ता बर्बादी और बीमारी की तरफ जाता दिखाई दे रहा है। 4PM संपादक संजय शर्मा ने वर्ष 2020 में एक पीआईएल दाखिल कर ज्वलंत सवालों को पब्लिक प्लेटफार्म पर लेकर आये थे।
स्क्रीन पर शाहरुख खान हैं अजय देवगन हैं टाइगर श्रॉफ हैं और उनके हाथ में है इलायची का विज्ञापन। विज्ञापन कहता है कि इलायची लेकिन जिस नाम को लेकर यह लोग इलायची कह रहे हैं वह नाम सीधे उपभोक्ता को पान मसाले की दुनिया में पहुचा रहा है। मौजूदा सूरते हाल में सवाल यह है कि क्या किसी ऐसे ब्रांड की पहचान जिस पर सीधे प्रचार को लेकर सवाल उठते रहे हैं दूसरे उत्पाद के नाम के रास्ते उसी ताकत से लोगों तक पहुंचाई जा सकती है?

अगर यह सिर्फ इलायची है तो इलायची बेचिए

इलायची की खुशबू बताइए उसका स्वाद बताइए उसकी गुणवत्ता बताइए उसके किसानों की कहानी बताइए लेकिन अगर सवाल यह है कि इलायची के बहाने किसी दूसरे उत्पाद से जुड़ी ब्रांड पहचान को जिंदा रखा जा रहा है तो सवाल पूछा जाएगा। क्योंकि विज्ञापन सिर्फ उत्पाद नहीं बेचता विज्ञापन याददाश्त बेचता है पहचान बेचता है चेहरा बेचता है भरोसा बेचता है। और जब सामने देश के सबसे बड़े सुपरस्टार हों तब उस विज्ञापन का असर भी सवालों से बाहर नहीं रह सकता।

पैसा कितना ताकतवर है?

छह साल बाद नाम बदल गए चेहरे बदल गए विज्ञापन का माध्यम भी बदल गया है लेकिन सवाल की शक्ल वही अपनी पुरानी जगह है। क्या करोड़ों का विज्ञापन किसी ब्रांड की वह पहचान मिटा सकता है जिस पर सवाल उठते रहे हैं? क्या इलायची का पैकेट सामने रखकर उस नाम को करोड़ों घरों तक पहुंचाया जा सकता है जिसे उपभोक्ता किसी दूसरे उत्पाद से जोड़ता है। और अगर ऐसा है तो फिर कानून की सीमा कहां है। कंपनियां कारोबार करें पैसा कमाएं रोजगार दें टैक्स दें देश की अर्थव्यवस्था में योगदान दें राहत कोष में पैसा दें किसी को इससे शिकायत नहीं होनी चाहिए लेकिन दूसरी तरफ सवाल भी उतना ही साफ है कि दान का स्वागत हो सकता है मगर क्या दान सवाल पूछने के अधिकार को खरीद सकता है?

सवाल जो पीछा नहीं छोड़ेंगे

  • सवाल नम्बर एक —  इलायची बिक रही है या ब्रांड की पहचान?
  • सामने इलायची है लेकिन क्या उपभोक्ता के दिमाग में उसी ब्रांड का दूसरा उत्पाद भी पहुंच रहा है?
  •  सवाल नम्बर दो — सरोगेट विज्ञापन की सीमा आखिर कहां है?
  • अगर सीधे प्रचार पर सवाल उठता है तो क्या दूसरे उत्पाद के नाम से वही ब्रांडिंग जारी रखी जा सकती है?
  • सवाल नम्बर तीन — सुपरस्टार का चेहरा सिर्फ चेहरा है?
  • अगर करोड़ों रुपये इसलिए दिए जाते हैं कि स्टार की लोकप्रियता उत्पाद को बेच सके तो क्या उसी लोकप्रियता के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी नहीं आती?
  • सवाल नम्बर चार — 10 करोड़ रूपयों का दान और स्वास्थ्य का सवाल क्या दोनों अलग नहीं होने चाहिए?
  • 2020 की पीआईएल में पीएम केयर्स फंड में 10 करोड़ रूपयों के योगदान का कंपनी की ओर से अदालत में उल्लेख हुआ था। क्या किसी राहत कोष में दिया गया योगदान उत्पाद से जुड़े स्वास्थ्य सवालों का जवाब हो सकता है?
  • सवाल नम्बर पांच —  सरकार किसके प्रति जवाबदेह है? ब्रांड के प्रति या जनता के प्रति?
  • कंपनी कितनी भी बड़ी हो विज्ञापन में कितने भी बड़े चेहरे हों अगर सार्वजनिक स्वास्थ्य का सवाल है तो क्या नियामक को उसी कठोरता से जांच नहीं करनी चाहिए?

अभी तो कहानी शुरू हुयी है

थोड़ा सा फ्लैशबैक में चलते हैं याद कीजिए देश कोरोना की चपेट में था। लॉकडाउन था लोग घरों में कैद थे सरकार लोगों से कह रही थी कि मास्क लगाइए दूरी रखिए हाथ साफ रखिए और सार्वजनिक जगहों पर मत थूकिए। उसी दौर में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से राज्यों को पान मसाला, सुपारी और बिना धुएं वाले तंबाकू के इस्तेमाल से ज्यादा लार बनने और सार्वजनिक स्थानों पर थूकने से संक्रमण के खतरे की चिंता बताई गई थी। उत्तर प्रदेश सरकार ने 25 मार्च 2020 को पान मसाला पर रोक लगा दी थी। फिर कुछ सप्ताह बाद 6 मई को पान मसाला बनाने और बेचने की अनुमति दोबारा दे दी गई थी। यहीं से सवाल उठता है कि जब संक्रमण का खतरा था तो रोक क्यों? और जब संक्रमण फैल रहा था तो अनुमति क्यों? यह सवाल पूछने वाले व्यक्ति पत्रकार संजय शर्मा कैमरे से निकलकर अदालत की चौखट तक पहुंचते हैं उन्होंने जनहित में इलाहाबाद हाई कोर्ट में जनहित याचिका Civil Miscellaneous Writ Petition (PIL) नो। 594 of 2020 दाखिल की । याचिका में महामारी के बीच पान मसाला के उत्पादन और बिक्री की अनुमति पर सवाल उठाया गया। फिर इस मुकदमे में एक ऐसा मोड़ आया जिसने सवाल को और बड़ा कर दिया। रजनीगंधा पान मसाला बनाने वाली कंपनी धर्मपाल सत्यपाल लि. अदालत के सामने आयी। कंपनी ने अपने एफिडेविट में पीएम केयरर्स फंड में 10 करोड़ रुपये दान दिए जाने और कोरोना काल में अन्य राहत कार्यों पर खर्च का उल्लेख किया। ऐसे में दान अपनी जगह राहत अपनी जगह है लेकिन सवाल फिर अपनी जगह खड़ा है कि क्या किसी राहत कोष में दिया गया करोड़ों का फंड किसी प्रोडक्ट से जुड़े हेल्थ संबधी सवालों को खत्म कर सकता है?

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