प्रदर्शन रोकने चली मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट की फटकार

खुल गयी घेराबंदी की पोल

  • मेट्रो-रेल, इंटरनेट और आम लोगों की आवाजाही सामान्य रखने के निर्देश
  • बड़ा सवाल राजधानी को पाबंदियों के हवाले क्यो किया गया
  • बड़ा सवाल राजधानी को पाबंदियों के हवाले क्यो किया गया
  • छुट्टी वाले दिन लगी अदालत दिये जनहित के आदेश
  • दिल्ली को बैरक बनाने की कोशिश पर अदालत सख्त
  • सुप्रीम कोर्ट के आसपास धारा 163 के बोर्ड हटाने का निर्देश
  • वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने न्यायपालिका के प्रति जताया आभार

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। दिल्ली में प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए ऐसी घेराबंदी की गयी कि मानो राजधानी में कोई लोकतांत्रिक आंदोलन नहीं बल्कि दुश्मन की सेना घुसने वाली हो। सड़कों पर बैरिकेड मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदियां रेल यात्रियों की परेशानी इंटरनेट पर रोक और प्रदर्शन के लिए निकले लोगों की धरपकड़। सवाल यह है कि आखिर एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन से सरकार इतनी घबराई हुयी क्यों थी क्या कुछ लोग अपनी आवाज उठाने के लिए राजधानी आ रहे थे या देश की सुरक्षा पर कोई ऐसा संकट खड़ा हो गया था जिससे निपटने के लिए दिल्ली की रफ्तार ही रोकनी जरूरी हो गई। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से जुड़े सवालों को लेकर सीजेपी के प्रदर्शन के बीच दिल्ली में जो कुछ हुआ उसने सरकार की मंशा और प्रशासन के तौर तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदर्शन को नियंत्रित करने के नाम पर आम लोगों की आवाजाही और सार्वजनिक परिवहन पर व्यापक पाबंदियां लगाई गयीं। मेट्रो और रेल सेवाओं को लेकर पैदा हुई स्थिति ने उन लाखों लोगों को भी परेशानी में डाल दिया जिनका आंदोलन से कोई लेना देना नहीं था। प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिश में राजधानी के आम नागरिकों को आखिर किस बात की सजा दी जा रही थी।

कपिल सिब्बल ने न्यायपालिका के प्रति जताया आभार

सुनवाई के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इस आदेश से देश के लोगों और पेशेवरों का न्याय व्यवस्था में भरोसा फिर से कायम हुआ है। सिब्बल ने कहा कि वह न्यायपालिका के प्रति आभारी हैं। उनका कहना था कि अदालत के आदेश के बाद नागरिकों और पेशेवरों के अधिकारों की रक्षा से जुड़ी उम्मीद मजबूत हुई है। यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई जब दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान लगाए गए प्रतिबंधों और लोगों को हिरासत में लिए जाने को लेकर राजनीतिक तथा कानूनी बहस तेज है। इस पूरे प्रकरण में अदालत की भूमिका इसलिए अहम है क्योंकि मामला केवल एक संगठन के प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। इसमें सार्वजनिक परिवहन नागरिकों की स्वतंत्र आवाजाही इंटरनेट और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार जैसे कई मुद्दे जुड़े हैं।

सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद केंद्र सरकार और दिल्ली के संबंधित प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती है। पहली कानून व्यवस्था बनाए रखना। दूसरी यह सुनिश्चित करना कि सुरक्षा के नाम पर नागरिकों को अनावश्यक परेशानी न हो और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के अधिकारों का सम्मान किया जाए। किसी भी सरकार के लिए सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है। लेकिन लोकतंत्र में सरकार की ताकत केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि वह कितनी सख्ती कर सकती है। उसकी असली परीक्षा इस बात से होती है कि वह असहमति के बीच भी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कितनी जिम्मेदारी से करती है। दिल्ली में प्रदर्शन की आशंका के बीच अपनाई गई रणनीति ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या प्रशासन ने सुरक्षा के नाम पर जरूरत से ज्यादा व्यापक कदम उठाए? यदि किसी खास इलाके में व्यवस्था बनाए रखना संभव था, तो क्या पूरे शहर के परिवहन और संचार पर पाबंदियां जरूरी थीं यदि प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करना था तो क्या आम यात्रियों को भी उसी व्यवस्था का बोझ उठाना चाहिए था।

सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत क्या सबक लेगी मोदी सरकार

मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो अदालत ने भी सार्वजनिक परिवहन पर पूरी तरह रोक लगाने और लोगों की आवाजाही बाधित होने पर सवाल उठाए। नौ अक्टूबर को ही शीर्ष अदालत ने मेट्रो और रेल सेवाओं को पूरी तरह बंद करने के बजाय नियंत्रित ढंग से चलाने की बात कही थी। इसके बावजूद पाबंदियों और आदेश उल्लंघन को लेकर नई याचिका पहुंची और रविवार 11 अक्टूबर को अदालत को विशेष सुनवाई करनी पड़ी। इस सुनवाई में बैरिकेड हटाने मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रखने इंटरनेट बहाल करने तथा शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में न लेने के निर्देश दिए गए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आसपास धारा 163 लागू होने से संबंधित बोर्ड हटाने का निर्देश भी दिया।

Related Articles

Back to top button