अभिषेक उपाध्याय की बहादुरी ने छुड़ाये यूपी सरकार के पसीने!

  • रोड रेज के मामले में पत्रकार का डिजिटल रिकॉर्ड क्यों खंगाल रही पुलिस?
  • सुप्रीम कोर्ट के सवालों से बेहाल यूपी पुलिस, मांगा जवाब
  • राम मंदिर में दान अनियमितताओं का मुद्दा उठाने वाले पत्रकार की याचिका पर सुनवाई

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली। एक रोड रेज के मामले की जांच के लिए किसी पत्रकार के सोशल मीडिया और डिजिटल फुटप्रिंट की जरूरत आखिर क्यों पड़ रही है? सुप्रीम कोर्ट ने इसी सवाल पर उत्तर प्रदेश की गाजियाबाद पुलिस से जवाब मांगा है। मामला लखनऊ के पत्रकार अभिषेक उपाध्याय से जुड़ा है जिन्होंने अयोध्या के राम मंदिर में दान से संबंधित अनियमितताओं को लेकर खबरें की थीं। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ अभिषेक उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहन भी शामिल थे।
उपाध्याय ने गाजियाबाद पुलिस की ओर से 18 अगस्त की रोड रेज की घटना को लेकर दर्ज एफआईटार को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह बात आई कि गाजियाबाद पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स से पत्रकार के जून 2026 से अब तक के डिजिटल फुटप्रिंट से जुड़ी जानकारी मांगी है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से साफ तौर पर पूछा कि जब जांच रोड रेज की घटना की हो रही है तो पत्रकार के डिजिटल फुटप्रिंट की आवश्यकता क्यों है? अदालत ने गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर को यह स्पष्ट करने के लिए कहा है कि एक्स से आखिर किस तरह की जानकारी मांगी गई है और उसका रोड रेज की एफआईआर या पत्रकार के खिलाफ दर्ज किसी अन्य मामले की जांच से क्या संबंध है।

अभिषेक उपाध्याय को सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने अभिषेक उपाध्याय को राहत देते हुए साफ किया है कि 25 अगस्त को गिरफ्तारी से दी गई अंतरिम सुरक्षा अगली सुनवाई तक जारी रहेगी। इस मामले का दायरा केवल एक रोड रेज एफआईआर तक सीमित नहीं रह सकता है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से अब बड़ा सवाल यह सामने आया है कि आपराधिक जांच के नाम पर पुलिस किसी व्यक्ति के सोशल मीडिया रिकॉर्ड और डिजिटल गतिविधियों को किस सीमा तक खंगाल सकती है। खास तौर पर तब जब मामला एक पत्रकार से जुड़ा हो और वह सरकार या अन्य संस्थाओं से जुड़े संवेदनशील विषयों पर रिपोर्टिंग कर रहा हो। अदालत यदि इस मामले में डिजिटल फुटप्रिंट जुटाने को लेकर स्पष्ट मानक या दिशा-निर्देश तय करती है तो भविष्य में पुलिस जांच डिजिटल निजता और पत्रकारों के अधिकारों के लिहाज से इसका व्यापक असर पड़ सकता है।

निजता के अधिकार का मामला

सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल डेटा जुटाने के मामले में निजता के अधिकार का सवाल भी उठाया। अदालत का कहना था कि जांच एजेंसियों को जांच का अधिकार है। लेकिन इसके साथ आरोपी की निजता और पीडि़त के अधिकारों के बीच भी संतुलन जरूरी है। अदालत अब इस बात पर विचार करेगी कि किसी व्यक्ति के डिजिटल फुटप्रिंट जुटाने की सीमा और उसके लिए जरूरी मापदंड क्या होने चाहिए। अदालत ने फिलहाल यह भी निर्देश दिया है कि डिजिटल फुटप्रिंट से संबंधित जो भी जानकारी एकत्र की गई है उसे अगली सुनवाई तक सार्वजनिक नहीं किया जाए। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता शरण देव सिंह ठाकुर अदालत में पेश हुए। उन्होंने बताया कि अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ मानहानि की शिकायतों से जुड़े दो अन्य मामलों की भी जांच चल रही है।

शारीरिक सुरक्षा को लेकर फिक्रमंद है अभिषेक

सरकार की तरफ से अदालत को यह भी बताया गया कि रोड रेज मामले में एक प्रत्यक्षदर्शी का बयान है और पुलिस अभी मामले की जांच कर रही है। सरकार का कहना है कि जांच में पत्रकार के खिलाफ कोई तथ्य नहीं मिलता है तो मामला बंद कर दिया जाएगा। अभिषेक उपाध्याय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय और अधिवक्ता अनूप प्रकाश अवस्थी ने पक्ष रखा। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि ऐसे मामलों में पुलिस किस हद तक किसी व्यक्ति का डिजिटल डेटा हासिल कर सकती है इसे लेकर स्पष्ट दिशा निर्देश बनाए जाने चाहिए। उपाध्याय ने अपनी याचिका में रोड रेज मामले में दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की है। इसके साथ ही वैकल्पिक मांग की गई है कि यदि एफआईआर रद्द नहीं होती है तो मामले की जांच उत्तर प्रदेश पुलिस से लेकर सीबीआई जैसी किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी को सौंप दी जाए। याचिका में पत्रकार ने अपनी गिरफ्तारी और शारीरिक सुरक्षा को लेकर भी आशंका जताई है। उनका आरोप है कि प्रभावी न्यायिक संरक्षण मिलने से पहले उन्हें राज्य की मशीनरी से जुड़े लोगों के माध्यम से नुकसान पहुंचाया जा सकता है।

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